कृषि कानूनों के विरोध में अभय चौटाला का इस्तीफा, स्पीकर ने मंजूर किया

तीन कृषि कानूनों के विरोध में इनेलो नेता और ऐलनाबाद से विधायक अभय सिंह चौटाला आज अपना इस्तीफा दे दिया हैं। इस्तीफे को लेकर आज 11 बजे प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक बुलाई गई थी। बैठक होने के बाद अभय चौटाला  हरियाणा विधानसभा भवन पहुंचे जहां उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को अपना इस्तीफा दिया, जिसे स्पीकर ज्ञानचंद गुप्ता ने स्वीकार भी कर लिया है। 

इससे पहले अभय चौटाला अपना सशर्त इस्तीफा विधानसभा स्पीकर को भेज चुके हैं, जिसको लेकर अभय चौटाला ने कहा था कि एसवाइएल को लेकर हुए आंदोलन के दौरान भी चौधरी देवीलाल और डा. मंगलसेन ने इसी तर्ज पर विधानसभा से इस्तीफे स्पीकर को भेजे थे। तब उन्हें स्वीकार कर लिया गया था। फिर मौजूदा स्पीकर को इस्तीफा स्वीकार करने में क्या हर्ज है। उन्होंने कहा था कि इस्तीफा मंजूर नहीं होने की स्थिति में वह 27 जनवरी को ट्रैक्टर पर सवार होकर विधानसभा जाएंगे और स्पीकर से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात करेंगे।

अभय चौटाला ने कहा कि वह प्रदेश भर में कृषि कानूनों और भाजपा सरकार की नीतियों के खिलाफ गांव-गांव जाकर जागरूकता अभियान चलाएंगे। कानूनों को बनाने से पहले केंद्र सरकार ने किसान संगठनों से राय लेना जरूरी नहीं समझा। अभय चौटाला ने कहा कि सरकार पूँजीपतियों को लाभ पहुंचने के लिए जीएसटी में संशोधन कर सकती है, लेकिन किसानों की मांग होने के बावजूद कृषि कानूनों को निरस्त नहीं किया जा रहा है। सरकार किसानों के साथ गलत कर रही है और मैं इसके खिलाफ हूं।

करीब दो साल पहले इनेलो से टूट कर अभय चौटाला के भाई अजय चौटाला और उनके बेटे दुष्यंत चौटाला ने अपनी अलग पार्टी जननायक जनता पार्टी(जजपा) बना ली थी। 2019 के विधानसभा चुनाव में जजपा के खाते में 10 सीटें आई जबकि इनेलो एक सीट पर सिमट कर रह गई। 2014 के विधानसभा चुनाव में 20 सीटें जीतकर विपक्ष के नेता की भूमिका में रहे अभय चौटाला अब हरियाणा विधानसभा में इनेलो के अकेले विधायक हैं जबकि जजपा भाजपा के साथ गठबंधन में सरकारी की प्रमुख भागीदार है।

दिल्ली घेरने पर क्यों मजबूर हुआ किसान?

जब से किसान आंदोलन शुरू हुआ है देश में खेती-किसानी को लेकर खूब चर्चा हो रही है। शहरों में लोग कृषि के प्रति क्या नजरिया रखते हैं यह भी पता चल रहा है। कुछ लोग किसान आंदोलन को विपक्ष की चाल, खालिस्तानी, नक्सली और अंतरराष्ट्रीय साजिश करार दे चुके हैं। जो यह सब नहीं कहते वो भी इतना तो कह दी देते हैं कि किसानों को विपक्ष ने भड़का दिया है। शहरी समाज में यह गलतफहमी भी हाल के वर्षों में काफी ज्यादा फैलायी गई है कि किसानों को जरूरत से ज्यादा सब्सिडी और छूट मिलती हैं। बिजली, पानी, खाद, सब फ्री मिलता है।

कुछ लोग तो यहां तक कुतर्क करते हैं कि अगर किसानों को खेती में नुकसान हो रहा है तो कोई दूसरा काम क्यों नहीं कर लेते? अन्न उगाकर किसान कोई अहसान नहीं कर रहे हैं। हालांकि, बहुत से किसान खेती छोड़कर मजदूर बन चुके हैं। कुछ ने इस अपमान से बचने की लिए जिंदगी का ही साथ छोड़ दिया। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की सालाना रिपोर्टों के अनुसार 1995 से 2012 के बीच करीब 3 लाख किसानों ने आत्महत्या कर चुके हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, साल 2019 में देश में 10,281 किसानों ने खुदकुशी कर ली यानी प्रतिदिन औसतन 28 किसान आत्महत्या करते हैं।  

क्या आप जानते हैं कि किसान कितना कमाता है? किसान का घर कैसे चलता है? किसान के बेटे को खेती करने में शर्म क्यों आती है? किसान के बच्चे पलायन करने पर क्यों मजबूर हैं? किसान की बेटी क्यों नौकरीवाले से ही शादी करना पसंद करती है, खेती वाले से नहीं? और सबसे बड़ा सवाल, किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? इन्ही सब सवालों का जवाब मुझे मिला, जब मैंने खेती का रुख किया।

तीन साल पहले मैंने खेती में हाथ आजमाने का इरादा किया तो एक नयी उमंग के साथ मैं अपने उन सभी रिश्तेदारों से मिलने गई जो अभी भी गांव में रहकर खेती करते हैं। लेकिन यह उमंग जल्द ही निराशा में बदल गई, जब देखा कि कई बीघा जमीन के मालिक भी खेती से मायूस हैं। खेती के काम में कोई गरिमा नहीं रही और गुजारा करना भी मुश्किल है। किसान पुत्र अब खेती छोड़कर रोजगार की तलाश में शहरों में भटक रहे हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश दोआबा का सिंचित क्षेत्र है जो दुनिया का बेहतरीन कृषि भूभाग माना जाता था। यहां गन्ना, गेहूं, धान, दलहन, तिलहन की खूब खेती होती थी। किसानों को मौसम की मार और बाजार की अनिश्चितता से जूझना पड़ता था, लेकिन कभी नहीं सुना था कि पश्चिमी यूपी का किसान आत्महत्या कर रहा है। बल्कि इस इलाके ने तो किसान राजनीति को राष्ट्रीय फलक पर लाने पर चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत जैसे नेता दिये। इसके किसानों की आत्मनिर्भरता और खेती से जुड़े आत्मसम्मान की ताकत थी।

साठ के दशक में आई हरित क्रांति ने किसानों को उपज बढ़ाने और देश का खाद्य सुरक्षा का रास्ता दिखाया। लेकिन महंगे उर्वरक, कीटनाशक, संकर बीज और मशीनीकरण ने खेती की लागत इतनी बढ़ा दी कि उचित दाम न मिले तो खेती घाटे का सौदा हो जाए। देखते ही देखते किसानों को बेची जाने वाली चीजों का विशाल बाजार खड़ा हो गया, जिसके लिए किसानों को सस्ता कर्ज भी मिलने लगा। इसी की नई कड़ी है प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना। जिसमें प्राइवेट कंपनियों को एकमुश्त हजारों करोड़ रुपये का कारोबार मिल गया। मतलब, कृषि से जुड़े बिजनेस फायदे का सौदा बनते गये, लेकिन खेती घाटे का सौदा।

पिछले कुछ दशकों में जिस रफ्तार से खेती की लागत बढ़ी है, खेती का मुनाफा या फसलों के दाम उस गति से नहीं बढ़े। इस तथ्य को कृषि नीति के विशेषज्ञ देविंदर शर्मा पूरे आंकड़ों के साथ समझा चुके हैं। स्थिति यह है कि पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ को छोड़कर बाकी राज्यों में सरकारी खरीद कम होती है। इसमें से भी अधिकांश खरीद सिर्फ दो फसलों गेहूं और धान की होती है। वर्ष 2020-21 के खरीफ सीजन में देश भर से हुई धान की कुल खरीद में करीब 45 फीसदी हिस्सेदारी पंजाब और हरियाणा की रही। सरकारी खरीद के इस सिस्टम को बचाने की चिंता ही इन राज्यों के किसानों को आंदोलन करने पर विवश कर रही है।

जिन राज्यों में सरकारी मंडी और खरीद का सिस्टम नहीं है, वहां के किसानों न्यूनतम समर्थन मूल्य से आधे दाम पर उपज बेचने को मजबूर हैं। पंजाब में कृषक परिवारों की सालाना आय 2.16 लाख रुपये है जबकि बिहार में किसानों की सालाना आय देश में सबसे कम 42,684 रुपये है। इस आमदनी के मुकाबले किसानों पर कर्ज का बोझ ज्यादा है। अखिल भारतीय ऋण और निवेश सर्वेक्षण (AIDIS) के अनुसार 2014 में 46 प्रतिशत कृषक परिवार कर्ज में डूबे थे और उन पर औसत कर्ज  70,580 रुपये का है। चूंकि कई बार ये ऋण बैंकों से ना लेकर अनौपचारिक क्षेत्र से लिया जाता है तो ब्याज दर भी बहुत ज़्यादा होती है। कर्ज के दुष्चक्र में फंसा किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है या फिर उसे अपनी जमीन से हाथ धोना पड़ता है।

देश में किसान आंदोलन पिछले तीन-चार साल से लगातार चल रहे हैं। लेकिन आप वही देख पाते हैं जो ज्यादातर मीडिया दिखाता है। अप्रैल 2017 में तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनोखा विरोध-प्रदर्शन किया था। ये किसान तमिलनाड़ु के भीषण अकाल की ओर सरकार का ध्यान खींचना चाहते थे। सरकार ने ना केवल उनकी उपेक्षा की, बल्कि कोई बातचीत करने भी नहीं आया। किसानों को निराश होकर लौटना पड़ा। मार्च 2018 में दोबारा तमिलनाड़ु के किसान दिल्ली में धरने पर बैठे। करीब डेढ़ महीने बाद उन्हें भी ख़ाली हाथ लौटना पड़ा। 

2018 में ही किसान कई बार दिल्ली के दरवाजे खटखटाने आए, लेकिन किसी को फर्क नहीं पड़ा। इसके बाद नासिक से मुंबई तक किसान मार्च निकाला गया तो चर्चा जरूर हुई लेकिन किसानों को झूठे आश्वासन देकर वापस भेज दिया गया। अक्टूबर 2018 में भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के नेतृत्व में किसान यात्रा दिल्ली पहुंची तो यूपी बॉर्डर पर ही रोक दिया। तब भी किसानों को मायूस होकर वापस लौटना पड़ा था। इससे पहले 2017 में मंदसौर में उचित मूल्य की मांग कर रहे किसानों पर पुलिस ने गोली चला दी थी।

मंदसौर की घटना के बाद ही किसानों ने ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति (AIKSCC) का गठन किया गया था। इसकी शुरुआत मुट्ठी भर किसान संगठनों को एक मंच पर लाने से हुई। अब इसमें देश भर के सैकड़ों संगठन जुड़ चुके हैं। कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन को व्यापक बनाने के लिए AIKSCC और कई दूसरे संगठनों ने मिलकर संयुक्त किसान मोर्चे का गठन हुआ जो किसानों की एकजुटता का प्रतीक बना चुका है। करीब दो महीने से दिल्ली की घेराबंदी के बाद आज यह किसान आंदोलन अपने शांतिपूर्ण तरीके, अनुशासन, प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने के हौसले और किसी दबाव के आगे न झुकने के कारण कृषि कानूनों का स्थगित करवा चुका है और इन्हें रद्द कराने की मांग पर अडिग है। आंदोलन का सामूूूूूहिक नेतृत्व और एकजुटता इस आंदोलन की बड़ी ताकत है, जिसका अहसास सरकार को भी कहीं ना कहीं हो रहा है।

फसल बीमा के लिए 6 महीने से जारी किसान की बेटी का संघर्ष

पिछले सप्ताह केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के 5 साल पूरे होने का जश्न बड़े जोरशोर से मनाया। लाखों करोड़ रुपये की योजना है। किसानों को आपदा से बचाने का बड़ा दावा है तो जश्न भी बड़ा ही मनना चाहिए। मना भी। लेकिन इस शोरगुल के बीच फसल बीमा का क्लेम पाने के लिए भटक रहे किसानों पीड़ा अनसुनी रह गई। इसलिए असलीभारत.कॉम ने उन किसानों की सुध लेने का बीड़ा उठाया है जो फसल बीमा के लिए बैंक, बीमा कंपनियों और कृषि विभाग के चक्कर काटने का मजबूर हैं। इस श्रृंखला की पहली कड़ी में पेश है राजस्थान के एक कृषक परिवार की आपबीती जो फसल बीमा योजना की पेचीदगियों को उजागर करती है और शिकायत निवारण की व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाती है 

– संपादक

मैं एक किसान परिवार से ताल्लुक रखती हूं और खेती ही हमारा मुख्य व्यवसाय है। साल 2019 में अतिवृष्टि के कारण राजस्थान के कई जिलों में किसानों की फसलें खराब हुई थीं। हमारी भी हुई। चूंकि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत पंजीकरण करवा रखा था, इसलिए उम्मीद थी कि नुकसान की कुछ न कुछ भरपाई हो जाएगी। इसी आस में पिता जी ने बीमा क्लेम के लिए आवेदन भी किया।

पिछले साल जुलाई महीने की बात है। मेरे पास पिताजी का गांव (राजस्थान के चित्तौड़गढ़ के निम्बाहेडा ब्लॉक में भावलियां गांव) से फोन आया कि बीमा कंपनी के नंबर 0141-4042999 पर लगातार फोन कर रहे हैं, लेकिन कोई उठाता ही नहीं है। एक बार तुम भी इस नंबर पर बात करने की कोशिश करना। यह नंबर जयपुर का है और तुम जयपुर में हो तो बीमा कंपनी के ऑफिस जाकर पता करना कि 2019 में बर्बाद हुई खरीफ फसलों का बीमा क्लेम हमें क्यों नहीं मिला है। बैंक से पूछने पर मुझे जवाब मिला कि बीमा कंपनी से बात करो, हमें कोई जानकारी नहीं है। बीमा कंपनी कौन-सी है? उससे कैसे बात होगी? यह पूछने पर बैंक अधिकारी ने कहा कि हमें बीमा कंपनी के बारे में भी कोई जानकारी नहीं है। आपने आप पता करो! बैंक का यह रवैया बहुत हैरान और हताश करने वाला था।

इसके बाद मैंने बीमा कंपनी को गूगल पर सर्च किया तब कही जा कर मुझे एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया के जयपुर क्षेत्रीय प्रबंधक का मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी मिला। मैंने सभी बैंक खातों का विवरण देते हुए एक लंबा मेल अंग्रेजी में लिखा और पूछा कि एक साल बाद भी बीमा क्लेम क्यों नहीं मिला है। मैंने बीमा कंपनी के क्षेत्रीय प्रबंधक को फोन किया और अंग्रेजी में बात करते हुए पूरा मामला बताया। यहां ये बताना जरुरी है कि अगर यह बातचीत और ईमेल अंग्रेजी में नहीं होते शायद मेरी बात सुनी भी नहीं जाती।

बहरहाल, दो दिन बाद बीमा कंपनी का एक मेल आता है कि आपके तीन खातों में से दो खातों की कोई जानकारी हमें राष्ट्रीय बीमा पोर्टल पर प्राप्त नहीं हुई है। एक खाते की जानकारी मिली है, जिसका क्लेम मंजूर हो गया है और क्लेम की राशि एक सप्ताह में आपके बैंक खाते में पहुंच जाएगी। बाकी दो खातों की जानकारी मांगने पर बीमा कंपनी के क्षेत्रीय प्रबंधक ने बताया कि बैंक ने आधार विवरण भारत सरकार के नेशनल क्रॉप इंश्योरेंस पोर्टल पर अपलोड ही नहीं किया होगा, इसलिए हमारे पास इन खातों की सूचना नहीं पहुंची है। जब कोई विवरण ही नहीं आया है तो बीमा भी नहीं हुआ और इस वजह से क्लेम राशि भी नहीं मिल सकती है। तब तक नेशनल क्रॉप इंश्योरेंस पोर्टल वर्ष 2019 के लिये बंद हो चुका था। इस बीच पोर्टल को पुनः खोला गया था लेकिन फिर भी बैंकों ने ये त्रुटियां नहीं सुधारी।

हमने सम्बंधित बैंक शाखा (स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया, निम्बाहेडा, चित्तोड़गढ़, शाखा कोड-31238) से वापस संपर्क किया तो बैंक ने स्वीकार किया कि आधार विवरण पोर्टल पर अपलोड नहीं हो पाया, इसलिए बीमा नहीं हो पाया। इसके बाद मैंने राजस्थान के कृषि मंत्री, कृषि आयुक्त, कृषि विभाग के क्षेत्रीय निदेशकों और बीमा कंपनी को मेल भेजकर पूरे मामले से अवगत कराया। इनमें से सिर्फ बीमा कंपनी का जवाब आया, जिसमें कहा गया था कि अगर राष्ट्रीय बीमा पोर्टल पर किसानों का डाटा अपलोड नहीं हुआ है तो उनका बीमा भी नहीं हुआ है। और किसी भी माध्यम से किसानों के बारे में कोई जानकारी नहीं ली जाएगी। योजना के दिशानिर्देशों के अनुसार, सिर्फ वित्तीय संस्था यानी बैंक ही किसानों का विवरण राष्ट्रीय बीमा पोर्टल पर अपलोड कर सकता है।

इस मुद्दे को लेकर मैं पिछले 6 महीनों में कृषि विभाग, बैंक और बीमा कंपनियों से गुहार लगा रही हूं। बैंक ने मौखिक रूप से अपनी लापरवाही स्वीकार की है लेकिन लिखकर यह दिया है कि किसानों का आधार डेटा अपलोड नहीं होने और आधार व बैंक खातों में नाम मिस-मैच होने की वजह से विवरण अपलोड नहीं हो पाया। जबकि बैंक बिना आधार के ना तो आजकल खाते खोलता है और ना ही ऋण देता है। ये सभी कृषक क्रेडिट कार्ड योजना के ऋणी किसान हैं। इसलिए ऐसा होना भी मुश्किल है कि बिना आधार ये खाते संचालित हो रहे हो। अगर हो भी रहा है तब भी इस प्रकार की विसंगतियां दूर करना बैंकों और बीमा कंपनियों की जिम्मेदारी है।  

मतलब, किसानों से आधार विवरण लेने के बाद भी यदि बैंक वो विवरण पोर्टल पर अपलोड नहीं करता है तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी? किसानों पर यह दोहरी मार है। पहले मौसम की मार और फिर सिस्टम की खामियों या लापरवाही की मार! इस मामले को लेकर राजस्थान सरकार के कृषि विभाग को भी ईमेल भेजा गया पर किसी का कोई जवाब नहीं आया था। कृषि उपनिदेशक, चित्तौड़गढ़ को कई बार फोन किया था, लेकिन जैसे ही उन्हें यह पता चला कि अमुक केस से सम्बंधित फोन है तो उन्होंने फोन उठाना ही बंद कर दिया। ऐसी परिस्थितियों में किसान कहां जाए? किससे मदद की उम्मीद करे?

बीमा पंजीकरण कराने और प्रीमियम की राशि कटने के बाद भी बैंक, बीमा कंपनी और कृषि विभाग के चक्कर काटने पर क्यों मजबूर होना पड़ रहा है। इस बीच, इस मुद्दे को ‘असलीभारत.कॉम’ नाम ने उठाया। इसी दौरान मैंने इस मामले पर संसदीय समिति और रिजर्व बैंक को भी लिखा। रिजर्व बैंक से यह मुद्दा बैंकिंग लोकपाल तक भी पहुंच गया था। संभवत: इसी तरह के प्रयासों का ही परिणाम था कि भारत सरकार ने सिर्फ राजस्थान के लिए राष्ट्रीय बीमा पोर्टल को 2 से 7 नवंबर, 2020 के मध्य पुनः खोल कर बैंकों से डेटा अपलोड करने को कहा। बैंकों ने अपनी भूल सुधारते हुए ये कर भी दिया।

कई बीमा कंपनियां किसानों को बकाया क्लेम राशि वितरित कर भी चुकी हैं। परंतु राज्य के 13 जिलों (हनुमानगढ़, चित्तौड़गढ़, बाड़मेर, अलवर, बारां, बीकानेर, धौलपुर, झालावाड़, झुंझुनूं, करोली, सिरोही, गंगानगर, उदयपुर) में फसल बीमा करने वाली बीमा एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया ने किसानों को क्लेम राशि देने से साफ इंकार कर दिया है। अभी कुछ दिनों पूर्व कृषि आयुक्त से बात करने पर पता चला कि अब यह मामला भारत सरकार के पास विचाराधीन है।

कहा जा रहा है कि भारत सरकार जब तक बीमा कंपनी को पाबंद नहीं करेगी, तब तक 2019 के बीमा क्लेम से वंचित राजस्थान के इन किसानों को उनका हक नहीं मिल सकेगा। देखना है अभी और कितना इंतजार और कितना संघर्ष बाकी है। जिस योजना के 5 साल पूरे होने को उत्सव की तरह मनाया गया, अगर इतना ही ध्यान इसकी कमियों को दूर करने और शिकायत निवारण व्यवस्था को मजबूत करने पर दिया जाता तो मेरी जैसी किसान की बेटी को इतना जद्दाेजहद ना करनी पड़ती।

जयंत चौधरी का ऐलान “धरने के रजिस्टर में नाम नहीं तो टिकट नहीं”

उत्तर प्रदेश के बड़ौत में कृषि कानूनों के खिलाफ महीने भर से चल रहे धरने में मंगलवार किसान महापंचायत का आयोजन किया गया। इस मौके पर राष्ट्रीय लोकदल के उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने आंदोलनकारी किसानों को एक रजिस्टर देते हुए कहा कि चुनाव में टिकट देते समय इस रजिस्टर को देखा जाएगा। यह रजिस्टर और किसान आंदोलन में भागीदारी ही रालोद के लिए चयन का पैमान होगा। मंगलवार को जयंत चौधरी मेरठ के करनावल में भी किसानों के धरने में पहुंचे थे।

रोहित वेमुला का आखरी खत: ‘मनुष्य को कभी एक मस्तिष्क की तरह बरता ही नहीं गया’

रोहित वेमुला के आखिरी ख़त का अनुवाद –

जब आप यह ख़त पढ़ेंगे, उस वक़्त मैं यहां नहीं रहूंगा। मुझ पर नाराज़ न हों। मुझे पता है कि आप में से कुछ लोग वाकई मेरी परवाह करते हैं, मुझ से प्यार करते हैं और हमेशा मुझसे अच्छा बर्ताव किया। मुझे किसी से कोई शिकायत है भी नहीं। मुझे हमेशा, ख़ुद से ही शिकायतें थी। मैं अपने जिस्म और अपनी रूह के बीच एक बढ़ती खाई को महसूस कर रहा हूं। मैं एक दैत्य बन गया हूं। मैं हमेशा एक लेखक बनना चाहता था। कार्ल सेगन की तरह, विज्ञान का लेखक। अंततः यह वह अंतिम रचना है, जो मुझे लिखने को मिली है…

यह जाने बिना कि लोग प्रकृति से अर्सा पहले सम्बंध विच्छेद कर चुके हैं, मैं विज्ञान, नक्षत्र और कुदरत से प्यार करता रहा। हमारी भावनाएं उधार की हैं। हमारी मोहब्बतें बनावटी हैं। हमारे विश्वास रंगे हुए हैं। हमारी असलियत, नकली कलाकृतियों से साबित होती है। बिना चोट खाए, मोहब्बत करना वाकई मुश्किल हो चला है।

एक इंसान की कीमत, उसकी हालिया पहचान और भविष्य की संभावनाओं तक सीमित कर दी गई है। एक वोट, एक संख्या या किसी एक चीज़ तक। मनुष्य को कभी एक मस्तिष्क की तरह बरता ही नहीं गया, एक ऐसी चीज़ जो वाकई अनमोल हो। यह हर जगह हुआ, तालीम में, सड़कों पर, राजनीति में, मौत में और ज़िंदगी में भी।

मैं इस तरह की चिट्ठी पहली बार लिख रहा हूं। पहली बार, एक आखिरी चिट्ठी। अगर मेरी बातें समझ न आएं, तो मुझे माफ़ कीजिएगा।

हो सकता है कि मैं हमेशा ही, दुनिया को समझने में ग़लत था। मैं इश्क, दर्द, ज़िंदगी और मौत को समझने में ग़लत था। किसी तरह की जल्दी भी नहीं थी, लेकिन मैं हमेशा ही बेसब्र रहा हूं। हमेशा मैं नई ज़िंदगी शुरु करने को लेकर उतावला रहा हूं। हमेशा ही कुछ लोगों के लिए, ज़िंदगी, अपने आप में एक बद्दुआ होती है। मेरी पैदाइश, मेरे जीवन का सबसे बड़ा हादसा था। मैं अपने बचपन के अकेलेपन से कभी उबर नहीं सका। मेरे अतीत का, उपेक्षित बच्चा।

मैं इस समय आहत नहीं हूं। मैं दुखी भी नहीं हूं। मैं बस खाली हो चुका हूं। अपने बारे में किसी तरह की परवाह नहीं बची है। यह वाकई बहुत बुरा है और इसीलिए मैं ऐसा कर रहा हूं।

लोग मुझे कायर कह सकते हैं। मेरे जाने के बाद मुझे मतलबी या बेवकूफ भी कह सकते हैं। मुझे परवाह नहीं कि मुझे क्या कहा जाता है। मैं ज़िंदगी के बाद की कहानियों, भूतों या रूहों में भी यक़ीन नहीं रखता हूं। अगर किसी बात में मेरा भरोसा है, तो वह यह है कि मैं तारों की सैर कर सकता हूं और दूसरी दुनिया के बारे में जान सकता हूं।

आप जो इस ख़त को पढ़ रहे हैं, अगर मेरे लिए कुछ कर सकते हैं, तो मेरी बकाया 7 महीने की फेलोशिप मेरे परिवार को दिलवा दें। मुझे रामजी को 40 हज़ार रुपए देने हैं। हालांकि उन्होंने कभी मुझसे पैसे नहीं मांगे। लेकिन उस राशि में से उनको पैसे चुका दें।

मेरा अंतिम संस्कार, शांतिपूर्ण और सुचारू ढंग से होने दें। ऐसे बर्ताव करें, जैसे मैं बस आया और चला गया। मेरे लिए आंसू न बहाएं। यह समझें कि मैं ज़िंदा रहने से ज़्यादा खुश, मर कर हूं।

“साये से सितारों की ओर..”

उमा अन्ना, आपके कमरे को इस काम के लिए इस्तेमाल करने के लिए मुझे माफ़ कीजिएगा।

अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन परिवार से, मैं उनको निराश करने के लिए माफ़ी चाहता हूं। मैं उनके भविष्य की शुभकामनाएं करता हूं।

एक अंतिम बार,
जय भीम

मैं औपचारिकताएं लिखना भूल गया। अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने के मेरे इस फैसले के लिए कोई और ज़िम्मेदार नहीं है। मुझे किसी ने उकसाया भी नहीं है, न ही अपने लफ़्ज़ों से और न ही हरक़तों से। यह मेरा फैसला है और इसके लिए पूरी तरह से मैं ज़िम्मेदार हूं। मेरे दोस्तों और दुश्मनों को, मेरे जाने के बाद परेशान न किया जाए।

कृषि कानूनों पर स्टे के बावजूद क्यों पीछे हटने को तैयार नहीं किसान?

कृषि कानूनों और इनके विरोध में चल रहे किसान आंदोलन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया। सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कृषि कानूनों के अमल पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। इसके अलावा कृषि कानूनों पर किसानों और सरकार का पक्ष जानने के लिए चार सदस्यों की एक समिति भी गठित की है।

इस समिति में अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी, पीके जोशी, किसान नेता भूपेंद्र सिंह मान और अनिल घनवट को शामिल किया गया है। ये नाम सुप्रीम कोर्ट के पास कहां से आये? यह तो मालूम नहीं है, लेकिन ये चारों कृषि कानूनों का समर्थन करते हैं। ऐसे सदस्यों के चयन से आंदोलनकारी किसानों और सरकार के बीच विश्वास का संकट और ज्यादा गहरा गया है। यही वजह है कि कृषि कानूनों पर स्टे को भी वे संदेह की नजर से देख रहे हैं और आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया है।

अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी. रामारामासुब्रमण्यम की पीठ ने कहा कि हम एक शांतिपूर्ण आंदोलन को दबाना नहीं चाहेंगे। हमें लगता हैं कि कृषि कानूनों के अमल पर रोक के आदेश को आंदोलन की उपलब्धि के तौर पर देखा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई है कि इस आदेश के बाद किसान यूनियनें अपने लोगों को वापस जाने के लिए समझाएंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। किसान यूनियनों ने कृषि कानूनों के अमल पर रोक के आदेश पर संतोष तो जाहिर किया है, लेकिन इसे अपनी जीत मानने और पीछे हटने से साफ इंकार कर दिया है।

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने असलीभारत.कॉम को बताया कि वे सुप्रीम कोर्ट का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन किसान आंदोलन की दो ही प्रमुख मांगें हैं। तीनों कृषि कानूनों की वापसी और एमएसपी की कानूनी गारंटी। इन मांगों के पूरा किये बगैर किसान घर वापस नहीं जाएंगे।

राकेश टिकैत ने सरकार पर सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए कहा कि जो अशोक गुलाटी कृषि कानून बनवाने वाली समिति में शामिल थे, वे क्या सुनवाई करेंगे। इस ‘सरकारी’ समिति से बात करने से अच्छा है, सरकार से ही बात की जाये। टिकैत ने ऐसे किसान नेताओं को समिति में शामिल करने पर भी निराशा जताई, जिसका किसान आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एमएसपी की व्यवस्था को कायम रखने और कृषि कानूनों के जरिये किसानों को जमीन से बेदखल नहीं करने का भी आदेश दिया है। साथ ही किसान आंदोलन पर भी किसी तरह की कोई रोक नहीं लगाई है। फिर भी आंदोलनकारी किसान इसे अपनी जीत नहीं मान रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह कृषि कानूनों पर बनी समिति और विश्वास का संकट है। इसके अलावा जिस तरह यह मामला आंदोलनकारी किसान यूनियनों की मर्ज़ी के विपरीत सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, उसे लेकर भी किसान नेता आशंकित हैं।

समिति में शामिल अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी और पीके जोशी कृषि कानूनों के पक्ष में खुलकर अपनी राय जाहिर कर चुके हैं। ये दोनों सरकारी खरीद बढ़ाने और एमएसपी की कानूनी गारंटी के खिलाफ भी लिखते रहे हैं। समिति के अन्य सदस्य बीकेयू के भूपिंदर सिंह मान और शेतकारी संगठन के अनिल घनवट भी कुछ सुधारों के साथ कृषि कानूनों को लागू करने के पक्ष में हैं। यानी समिति के चारों सदस्य कृषि कानूनों के पैरोकार हैं। समिति में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो आंदोलनकारी किसानों का प्रतिनिधित्व करता हो या निष्पक्ष माना जाये। संयुक्त किसान मोर्चा ने अफसोस जताया कि देश के सुप्रीम कोर्ट में अपनी मदद के लिए बनाई समिति में एक भी निष्पक्ष व्यक्ति नहीं रखा है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, चार सदस्यों की यह समिति कृषि कानूनों पर किसानों और सरकार का पक्ष सुनने के बाद दो महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट देगी। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने कहा कि यह समिति मध्यस्थता नहीं करेगी। हम मामले को हल करना चाहते हैं। इसलिए समिति गठित की है, ताकि हमारे सामने तस्वीर स्पष्ट हो सके। चीफ जस्टिस ने यहां तक कहा कि आप अनिश्चितकाल तक आंदोलन करना चाहता है तो कर सकते हैं। लेकिन हम यह तर्क नहीं सुनना चाहते कि किसान समिति के पास नहीं जाएंगे। जो लोग वाकई इस मसले का हल चाहते हैं, उन्हें समिति के समक्ष जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति से जुड़े योगेंद्र यादव ने रेशम का फंदा करार देते हुए संघर्ष जारी रखने का ऐलान किया है। उनका कहना है कि एक तरफ सरकार किसानों से वार्ता कर रही है और दूसरी तरफ कर रही है कि अब मामला कोर्ट में सुलझेगा। इससे संदेह पैदा होता है कि सरकार जो काम विज्ञान भवन में नहीं कर पा रही है, कहीं ये उम्मीद तो नहीं कर रही कि वो काम सुप्रीम कोर्ट कर देगा।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पहले ही संयुक्त किसान मोर्चा ने किसी प्रकार की मध्यस्थता से इंकार करते हुए समिति के समक्ष जाने से मना कर दिया था। कोर्ट के फैसले के बाद संयुक्त किसान मोर्चा नेे बयान जारी कर कहा कि हमने मामले में मध्यस्थता के लिए सुप्रीम कोर्ट से प्रार्थना नहीं की है और ऐसी किसी कमेटी से हमारा कोई संबंध नहीं है। चाहे यह कमेटी कोर्ट को तकनीकी राय देने के लिए बनी है या फिर किसानों और सरकार में मध्यस्थता के लिए।

संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि किसान आंदोलन इन तीन कानूनों के स्थगन नहीं इन्हें रद्द करने के लिए चलाया जा रहा है। इसलिए केवल इस स्टे के आधार पर अपने कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं कर सकते। किसान आंदोलन जारी रहेगा और इस साल लोहड़ी कृषि कानूनों की प्रतियां जलाकर मनाएंगे।

आज विवेकानंद को नये कट्टर हिन्दूत्व के दार्शनिक योद्धा के रूप में बदल दिया गया है

दोनों हाथों को मोड़कर छाती से सटाये और नेपोलियन की तरह टकटकी लगाकर कठोर मुद्रा बनाये स्वामी विवेकानंद हिन्दू धार्मिक प्रथाओं में दमन देखकर मानसिक वेदना के कारण विक्षिप्तता की ओर बढ़ रहे थे।विवेकानंद को निजी प्रेरणा मानने वालों में नरेंद्र मोदी अकेले व्यक्ति नहीं है। मगर कोई यह बताने सक्षम नहीं दिखता कि उनकी कौन से विचार प्रेरणा देते हैं अथवा प्रभावित करते हैं।

हिन्दू धर्म के प्रवृत्तियों को जानने के बाद बेचैन होकर स्वामी विवेकानंद ने कहा,”पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं है, जो हिन्दू धर्म की तरह इतने उन्नत भाव से मानवता की गरिमा की शिक्षा देता है और धरती पर मौजूद कोई अन्य धर्म न तो हिन्दू धर्म की तरह ग़रीबों और निम्न कोटि के लोगों की गर्दन पर पैर रखता है”। विवेकानंद के लिए आस्था का मुख्य बिंदु आध्यात्मिक आश्वासन नहीं था। उनके तर्क को नए और उग्र तर्ज पर ढेकहा गया जबकि उनके मानना था कि नैतिक शक्ति समाज की व्यवहारिक आवश्यकताओं को पूरा करने की उसकी क्षमता पर आधारित है।

1863 में एक बंगाली कायस्थ परिवार में जन्में नरेंद्र नाथ दत्त के एक भाई मार्क्सवादी क्रांतिकारी थे। अंग्रेजी बोलने वाले उनके वकील पिता तर्कवितर्कवादी और खुले विचारों वाले व्यक्ति थे। पिता के मृत्यु के बाद संपति को लेकर परिवार में हुए कलह ने उन्हें आध्यात्मिक संकट में डाल दिया। तब वे परिवार छोड़कर रामकृष्ण परमहंस के साथ समय बिताने लगे। वे इस बात से बहुत चिंतित रहते थे कि सामान्य लोग गरीबी और अज्ञान में जी रहे हैं। हिन्दू शासक शिकार कर रहे हैं। जानवरों की संभोग क्रिया देखकर मनोरंजन कर रहे हैं।

विवेकानंद की शिक्षा हिन्दू धर्म ग्रंथ के में संग्रहित और लिखित अधिकार से दूर व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर व्यवहारिक बनाने पर जोर देती है। यहां गुरु और उपदेशक की अनिवार्यता खत्म हो जाती है। उनका मानना था कि यहां कोई भी जरूरतमंदों और गरीबों की सेवा कर सत्य की ओर बढ़ सकता है। जो हिन्दू परंपराओं में सांस्कृतिक आत्मविश्वास और गौरव ला सकता है। विवेकानंद का मानना था कि हिन्दू धर्म की ऐतिहासिक दुर्दशा और रक्तिम संघर्ष से बचने के लिए रूढ़िवादी पुरोहितों और उनके हिन्दू धर्म की कथित पवित्र व्याख्या को नष्ट कर दिया जाये। उन्होंने शंकराचार्य के विचार को नकारते हुए कहा अश्वमेघ यज्ञ के उस अनुष्ठान को गुंडागर्दी बताया जिसमें राजा की संप्रभुता की आशा में रानी को मृत घोड़े के साथ संभोग करने का स्वांग करना होता था। विवेकानंद ने वेद का पुनर्पाठ किया और बुरी व्याख्याओं और अमानुषिक अनुष्ठानों को ख़ारिज कर दिया।

अगस्त, 1893 में न्यू इंगलैंड की सर्दी में ठिठुरते हुए और अमेरिकी चीजों की कीमतों पर चकराते हुए बत्तीस साल के विवेकानंद मैसाचुएट्स में महिलाओं के लिए बने सुधारगृह में गये। उन्हें यह देखकर बहुत हैरानी हुई कि कैसे जेलर वहां मौजूद सैकड़ों कैदियों से बहुत अच्छी तरह पेश आ रहे थे। उन जेलरों को जानबूझकर उन कैदियों के जुर्म से अनजान रखा गया था और वे उन्हें समाज में फिर से शामिल होने के लिए तैयार कर रहे थे। अपने देश में निम्न दर्जें और जाति के लोगों के साथ इस प्रकार गरिमापूर्ण व्यवहार की कल्पना भी नहीं कि जा सकती थी। वहां से उन्होंने अपने एक दोस्त को लिखा, “मेरा दिल यह सोचकर पीड़ा से भर उठता है कि भारत में हम गरीबों को कैसे देखते हैं। उनके पास कोई अवसर, बचने का कोई तरीका, ऊपर आने का कोई साधन नहीं होता… वे भूल चुके होते हैं कि वे भी मनुष्य है। इसका नतीजा है, गुलामी।” वे अमेरिका के सामाजिक खुलेपन, महिलाओं की तुलनात्मक स्वतंत्रता, अपने हितों के लिए लोगों की सामूहिक काम करने की क्षमता (उस समय श्रमिक संगठन मजबूत हो रहे थे) और सरकारी संस्थाओं द्वारा लोगों की व्यवहारिक आवश्यकताओं के अनुरूप काम करने से अभिभूत थे।

स्वामी विवेकानंद इस नतीजे पर पहुँचे कि पश्चिमी मुल्कों के लोगों के सफलता का रहस्य ‘ संगठन और संयोजन की शक्ति’ थी।उन्हें तत्काल लगा कि इस रहस्य को अपने देशवाशियों को बताया जाना चाहिए। विवेकानंद को अन्य अमेरिकी आदतों ने प्रभावित किया, जिसमें वहां के लोगों द्वारा गोमांस खाना भी शामिल था और विवेकानंद ने भारतीयों को सलाह दी थी कि स्वस्थ्य रहने तथा शरीर से मजबूत रहने के लिए ऐसा करे। उन्होंने अमेरिका के शरीर-सौष्ठव संस्कृति को अपनाया और वयायाम के तकनीकों को हिन्दू परिपाटी में शामिल किया।

जब भारतीय परिधानमंत्री नरेंद्र मोदी साल 2015 के मई महीने में लगभग 35,000 बच्चों, सैनिकों, नौकरशाहों का नेतृत्व करते हुए योगासन कर विश्व का सबसे बड़ा योग कक्षा का नाम दिया तब मुठ्ठी भर लोगों को भी पता नहीं होगा कि पश्चिमी लोगों के पास पहली बार पहुँचने वाली भारतीय दर्शन की प्रारंभिक रचनाओं में से एक आधुनिक योग, राजयोग को 1890 में अमेरिका में लिखा गया था और वह उस समय की अमेरिकी संस्कृति से प्रभावित थीं।

आज विवेकानंद को नये हिन्दू गौरव के दार्शनिक योद्धा के रूप में बदल दिया गया। आज एक ऐसी राजनीतिक विचारधारा इनके तस्वीर का दुरुपयोग करती है, जिसका लक्ष्य भारत के धार्मिक विविधता वाले समुदायों पर एकरूपता थोपना है। अब उन्हें हिन्दू संस्कृति की पुरुषत्व की आक्रामक संस्कृति का जनक के बतौर पेश करती है।