किसानों के लिए क्यों जरूरी है एमएसपी की गारंटी

भारत में तीन कृषि कानूनों को रद्द करने की लेकर एक तरफ ऐतिहासिक किसान आंदोलन चल रहा है वहीं एमएसपी पर खरीफ फसलों की खरीद भी जारी है। यह किसान आंदोलन का ही असर है कि खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय और कृषि मंत्रालय रोज धान और अन्य फसलों की खरीद के आंकड़े जारी करते हुए एक जताने का दावा कर रहा है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य यानि एमएसपी पर खरीद के प्रति कितनी गंभीर है।  

खैर तीनों कानूनों के लागू होने के बाद सरकार खरीफ 2020-21 में रिकार्ड खरीद का दावा कर रही है। किसान आंदोलन का यह असर है कि मौजूदा खरीद के आंकड़े रोज सरकार जारी कर रही है। एमएसपी पर धान 23 राज्यों में और गेहूं 10 राज्यों में खरीदा जाता है। इस बार सरकारी मंशा 156 लाख से अधिक किसानों से 738 लाख टन तक धान खरीदने की है जिस पर 1.40 लाख करोड़ रुपए व्यय होगे। पिछले साल 627 लाख टन धान खरीदी हुई थी। इस बार 125 लाख गांठ कपास की खरीद का लक्ष्य भी सरकार ने रखा है जिस पर 35,500 करोड़ रुपए व्यय होगा। धान खरीदी के लिए इस बार देश भर में करीब 40 हजार केंद्र खोले गए हैं। फिर भी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की बुरी दशा है जहां पखवारे तक भाग दौड़ के बाद भी तमाम किसान अपना धान नहीं बेंच पा रहे हैं और मजबूरी में एक हजार से 1200 रुपए में व्यापारियों को बेच रहे हैं। जबकि धान का एमएसपी 1868 रुपए कामन और 1888 रुपए प्रति कुंतल ए ग्रेड का है। 

सरकार एमएसपी पर देश भर में 15 दिसंबर तक करीब 391 लाख टन धान की खरीदी कर चुकी है। यह पिछले साल इसी अवधि की गयी 319 लाख टन से 22.41 फीसदी ज्यादा है। खरीद में भी सबसे अधिक 202 लाख टन से अधिक का योजना पंजाब का है जो करीब 52 फीसदी का बैठता है। 22 नवंबर तक पंजाब का योगदान करीब 70 फीसदी तक था। अब तक खरीफ में 73,781 करोड़ रुपये से अधिक का धान किसानों से खरीदा गया है और इससे 44.32 लाख किसान लाभान्वित हुए हैं। वही 52.40 करोड़ रुपये एमएसपी मूल्य पर 5089 टन खोपरा खरीद से कर्नाटक और तमिलनाडु के 3,961 किसानों को फायदा हुआ। धान के बाद सबसे अधिक 10.01 लाख किसानों को एमएसपी पर कपास बेचने से हुआ। कपास खरीद पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और कर्नाटक राज्यों में जारी है और अब तक 14,894 करोड़ रुपये से अधिक दाम पर 5179479  गांठ कपास खरीदी गयी है। 

पंजाब में सबसे अधिक खरीद की वजह व्यवस्थित तैयारी और मंडियां भी हैं। लेकिन इसी साल देश मे पंजाब से भी अधिक और 129.42 लाख टन गेहूं मध्य प्रदेश ने खरीदा, जबकि उत्तर प्रदेश केवल 35.77 लाख टन खरीदी के साथ चौथे नंबर पर रहा। एमएसपी पर खरीद को लेकर कई राज्यों में दिक्कतें हैं। इसी साल के आरंभ में आंध्र प्रदेश में धान किसानों की समस्याओं को लेकर उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडु को कृषि मंत्री और खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री से हस्तक्षेप करना पड़ा था। बाद में 2 मार्च 2020 को खाद्य मंत्रालय और एफसीआई के अधिकारियों ने उपराष्ट्रपति से मुलाकात कर धान किसानों से समय पर खरीदारी न होने और समय पर भुगतान के मसले पर सफाई दी और समाधान के लिए जल्दी कार्रवाई करने औऱ राज्य सरकार को बकाया राशि का तुरन्‍त भुगतान करने की बात कही।

इस समय चल रहा देशव्यापी किसान आंदोलन तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने के साथ एमएसपी पर खरीद की कानूनी गारंटी भी मांग रहा है। किसानों की एमएसपी की मांग को राष्ट्रव्यापी समर्थन मिलते देख भारत सरकार के कई मंत्री एक स्वर में एमएसपी पर खरीद जारी रखने की बात किसान संगठनों को लिख कर देने को तैयार है। लेकिन किसान चाहते हैं कि सरकार ऐसा कानून बनाए जिससे कोई भी उनके उत्पाद को एमएसपी से नीचे न खरीद सके। उसके लिए दंड की व्यवस्था हो। अभी एमएसपी पर खरीद दो दर्जन फसलों तक सीमित है। लेकिन गेहूं औऱ धान को छोड़ दें तो अधिकतर फसलों की खरीद दयनीय दशा में है। और ऐसा नहीं है कि मौजूदा किसान आंदोंलन में ही एमएसपी पर खरीद की चर्चा हो रही है। बीती एक सदी से किसान आंदोलनों के केंद्र में कृषि मूल्य नीति या वाजिब दाम शामिल रहा है। 

भारतीय किसान यूनियन के नेता स्व. महेंद्र सिंह टिकैत अपने जीवनकाल में कृषि उत्पादों के मूल्य 1967 को आधार वर्ष पर तय करने की मांग करते रहे। सारे प्रमुख किसान संगठन भी इस मांग से सहमत थे। अस्सी के दशक के बाद कोई ऐसा  किसान आंदोलन नहीं हुआ जिसमें फसलों का वाजिब दाम न शामिल रहा हो। खुद संसद, संसदीय समितियों और विधान सभाओं में इस पर व्यापक चर्चाएं हुई हैं। किसान संगठन चाहते हैं कि उनका उत्पाद सरकार खरीदे या निजी क्षेत्र लेकिन सही दाम मिलेगा तो उनके जीवन स्तर पर असर पड़ेगा और देश की अर्थव्यवस्था पर भी।

भारत के किसानों ने कठिन चुनौतियों और अपनी मेहनत से कम उत्पादकता के बावजूद भारत को चीन के बाद सबसे बडा फल औऱ सब्जी उत्पादक बना दिया है। चीन और अमेरिका के बाद सबसे बड़ा खाद्यान्न उत्पादक देश भारत ही है। पांच दशको में हमारा गेहूं उत्पादन 9 गुना और धान उत्पादन पांच गुणा से ज्यादा बढ़ा है। लेकिन खेती की लागत भी लगातार बढी है, जबकि उनके उत्पादों के दाम नहीं मिलते। जैसे ही किसान की फसल कटने वाली होती है, दाम गिरने लगते हैं। मौजूदा तीन कृषि कानूनो के बाद अगर एमएसपी की गारंटी बिना किसान बाजार के हवाले हो गया तो बड़े कारोबारी किसानों और उपभोक्ताओं दोनों की क्या दशा करेंगे, यह बात किसान समझ रहा है। 

सरकारी स्तर पर यह दावा हो रहा है कि पीएम-किसान सम्मान निधि जैसी योजना जो सरकार शुरू कर सकती है वह किसानों का अहित कैसे कर सकती है। भूमि जोतों के आधार पर साढे 14 करोड़ किसानों को किसान सम्मान निधि के दायरे में लाने की बात सरकार ने की थी लेकिन अब तक 10 करोड़ किसानों के खाते में सरकार ने एक लाख करोड़ रूपये पहुंचाया है। किसानों के इस आंकड़े के हिसाब से एमएसपी पर सरकारी खरीद को देखेंगे तो पता चलेगा कि कितने कम किसानो से एमएसपी पर उनकी उपज खरीदी जाती है। सरकारी एकाधिकार के दौर में अगर एमएसपी पर खरीद चंद राज्यों और दो फसलों तक सीमित है तो निजी क्षेत्र के दबदबे के बाद बिना गारंटी के किसान की क्या हालत होगी। 

संसद के मानसून सत्र में भी यह विषय उठा था तो कृषि मंत्री नरेन्द्र  सिंह तोमर ने दावा किया था कि अब किसानों को उपज बेचने के प्रतिबंधों से मुक्ति के साथ अधिक विकल्प मिलेगा। कृषि मंडियों के बाहर एमएसपी से ऊंचे दामों पर खरीद होगी। उसी दौरान सांसदों ने मांग की थी कि विधेयक में यह गारंटी शामिल की जाये कि जो कारोबारी मंडियों से बाहर एमएसपी से कम दाम पर खरीदेगा वह दंडित होगा। लेकिन सरकार ने इसे नजरंदाज किया। जिससे किसानों के मन में संदेह का और बीजारोपण हुआ। यही नहीं हाल में हरियाणा और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने राज्यों में अनाज बिक्री के लिए आने वाले दूसरे राज्यों के किसानों को रोकने और दंडित करने की बात तक की। अगर किसान अपनी मर्जी का मालिक है तो ऐसे बंधन क्यों। 

सरकार ने इसी साल खरीफ में मूल्य समर्थन योजना  के तहत 48.11 लाख टन दलहन और तिलहन की खरीद को मंजूरी दी। लेकिन 15 दिसंबर 2020 तक 1.72 लाख टन से अधिक दलहन खरीद हुई जिसका एमएसपी मूल्य 924.06 करोड़ रुपये है। इस खरीद से तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा और राजस्थान के 96,028 किसानों को लाभ मिला। दलहन और तिलहन खरीद को बढ़ावा देने के लिए 2018 में प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान के तहत खास तवज्जो दी गयी। लेकिन इसके दिशानिर्देशों में उत्पादित 75 फीसदी फसल खरीद के दायरे से बाहर कर दी गयी। 2020-21 में राजस्थान में कुल 22.07 चना की खरीद हुई जबकि उपचुनावों के नाते मध्य प्रदेश में 27 फीसदी तक चना खरीदी हुई। मूंग खरीद न होने के कारण राजस्थान के किसानों को करीब 98 करोड़ का घाटा उठाना पड़ा। इसे लेकर किसानों ने आंदोलन भी किया और किसान महापंचायत के अध्यक्ष रामपाल जाट ने केंद्र सरकार को पत्र लिख कर गुहार भी लगायी लेकिन हालत नहीं सुधरी। 

कोरोना संकट में खाद्य सुरक्षा के हित में किसानों ने खरीफ बुवाई का क्षेत्र 316 लाख हेक्टेयर तक पहुंचा दिया जो पिछले पांच सालों के दौरान औसतन 187 लाख हेक्टेयर था। लेकिन एमएसपी में आशाजनक बढोत्तरी नहीं की गयी। भारतीय किसान यूनियन ने खरीफ एमएसपी घोषणा के साथ ही यह कहते हुए विरोध जताया था कि पिछले पांच वर्षों में इसकी सबसे कम मूल्य वृद्धि रही। धान का एमएससी 2016-17 में 4.3 फीसदी, 2017-18 में 5.4, 2018-19 में 12.9 और 2019-20 में 3.71 फीसदी बढ़ा था जबकि 2020-21 में सबसे कम 2.92 फीसदी बढ़ा। 

कृषि मूल्य नीति और मंडियो को लेकर किसानों को तमाम शिकायतें है।  मोदी सरकार ने स्वामिनाथन आयोग की सिफारिश के तहत एमएसपी तय करने का वादा किया था। लेकिन इसे आधा अधूरा माना गया। तमाम कमजोरियों के बाद भी सरकारी मंडियां बाजार की तुलना में किसानों के हितों की अधिक रक्षा करती हैं। अगर यह व्यवस्था भी अर्थहीन हो गयीं तो उत्तर भारत का किसान अपना गेहूं या चावल हैदराबाद या भुवनेश्वर के बाजार में बेचने कैसे जाएगा। यह काम बड़ा कारोबारी ही करेगा। बेशक किसान के पास कई विकल्प होने चाहिए। लेकिन यह छोटे किसानों के संदर्भ में 22 हजार ग्रामीण मंडियों या हाट बाजार के विकास से निकल सकते हैं। अधिकतर छोटे किसान अपने गांव में ही छोटे व्यापारियों को उपज बेचते हैं, जिस पर कोई रोक नहीं है। रोक इस पर लगनी चाहिए कि सरकार जो एमएसपी घोषित करती है बाजार में इससे कम में कोई कारोबारी न खरीदे। औद्योगिक औऱ दूसरे उत्पादों को अधिकतम कीमत वसूलने का लाइसेंस देने वाली सरकार किसानों को न्यूनतम मूल्य की गारंटी क्यों नहीं दे सकती।

राज्य सभा में 19 जुलाई, 2019 को गैर-सरकारी सदस्यों के संकल्प के तहत सांसद और भाजपा किसान मोर्चा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय पाल सिंह तोमर ने किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए संवैधानिक दर्जे वाले एक राष्ट्रीय किसान आयोग की स्थापना की मांग की थी जिसे व्यापक समर्थन मिला। उनका कहना था कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि फसलों को सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर खरीदा या बेचा न जाए और इसका उल्लंघन करने पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए। लेकिन अब यह मांग किसान आंदोलन की व्यापक मांग बन गयी है। जमीनी हकीकत यही है कि अगर इस व्यवस्था में किसानो के लिए एमएसपी पर खरीद की कानूनी गारंटी नहीं दी गयी तो सुधार किसानों को गहरी खाई में धकेल देंगे।

पंजाब में कृषि संकट और किसान आंदोलन का उभार

पंजाब के किसान सितंबर माह में पारित नए कृषि कानूनों के खिलाफ झुकने को तैयार नहीं हैं। लगातार उनका विरोध प्रदर्शन सुर्खियों में बना हुआ है, जिसके कई रचनात्मक और सांस्कृतिक रंग गजब की दिलचस्पी पैदा कर रहे हैं। केंद्र सरकार भी अडिय़ल बनी हुई है और वह कानूनों को ज्यों का त्यों बनाए रखने की जिद पर अड़ी हुई है। हालांकि किसानों के राजनीतिक दबाव के कारण पंजाब सरकार को केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ, सांकेतिक ही सही, विधेयक पारित करने पड़े हैं। पिछले कुछ हफ्तों में किसानों और सरकार के बीच तीखे टकराव देखने को मिले हैं। पहले पंजाब में किसानों के जत्थे जगह-जगह रेलवे ट्रैक पर बैठ गए, कई दिनों तक पंजाब में रेल संवाएं ठप रहीं, राज्य की बिजलीघरों में कोयले का संकट खड़ा हो गया। फिर किसानों ने इन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली कूच किया। हजारों किसानों के इस मार्च को जगह-जगह पुलिस की घेराबंदी, वाटर कैनन और आंसू गैस के गोले झेलने पड़े।

कृषि कानूनों के खिलाफ व्यापक माहौल में केंद्र सरकार सुधार के पक्ष में कई तरह की दलीलों की आड़ ले रही है। सरकार ने किसान आंदोलन को यह कहकर बदनाम करने की कोशिश की कि उसके पीछे शोषण करने वाले बिचौलियों का हाथ है और यह भी कि इन कानूनों से छोटे और सीमांत किसान खुश हैं। ऐसी फिजा बनाई जा रही है कि इन कानूनों का विरोध बड़े, समृद्ध और राजनैतिक रूप से ताकतवर किसान कर रहे हैं, जिनका पंजाब के किसान यूनियनों में दबदबा है और जो पुरानी व्यवस्था से सबसे ज्यादा मुनाफा कमाते रहे हैं।  

फिर भी हकीकत यही है कि इन प्रदर्शनों को बड़े पैमाने पर सामाजिक समर्थन मिल रहा है। ये व्यापक विरोध प्रदर्शन हरित क्रांति के बाद पंजाब की राजनीति और राजनैतिक अर्थव्यवस्था का आईना है। हाल के वर्षों में किसान अपने अंतर्निहित विरोधाभासों और उभरती संभावनाओं के मद्देनजर वर्ग, जाति और स्त्री-पुरुष भेदभाव की दीवारें तोडक़र लामबंद हुए हैं। पंजाब की कृषि पर पिछले सात वर्षों के अपने शोध के आधार पर मैं कह सकती हूं कि राज्य की किसान राजनीति के हालात पहले के मुकाबले काफी बदल गए हैं। पंजाब में किसानों के आंदोलन को पुराने चश्मे से देखना नाइंसाफी हो सकती है।

मंडी व्यवस्था का बचाव

पंजाब और हरियाणा के किसान हरित क्रांति के मुख्य लाभार्थियों में रहे हैं, जब 1960 के दशक के आखिरी वर्षों में देशभर में गेहूं और धान की अधिक उपज वाली किस्मों की बुआई शुरू हुई। अंग्रेजी राज के आखिरी दौर से ही शुरू हुए भूमि सुधार और चकबंदी की बदौलत दोनों राज्यों की किसानों के पास सुरक्षित पट्टेदारी थी। इस कारण यहाँ के किसानों को नई किस्म के फसलों के लिए जरूरी महंगे रासायनिक खाद और सिंचाई में निवेश करने में सहूलियत हुई।

शायद अधिक पैदावार वाली नई फसलों की तरफ किसानों के झुकाव की अहम वजह इस क्षेत्र में लाई गई कृषि विपणन व्यवस्था यानी मंडी प्रणाली थी जो नए कृषि कानून के तहत कमजोर कर दी जाएगी। यह गेहूं और धान के लिए एक खुली खरीद योजना थी जिसके तहत सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी पर तय किस्म की कितनी भी मात्रा में मंडी से खरीदती थी। इस वजह से किसान आश्वस्त रहते थे कि खेती में उनका निवेश व्यर्थ नहीं जाएगा और उपज के अच्छे दाम मिल जाएंगे।

कई विशेषज्ञों और 2015 में शांता कुमार समिति की रिपोर्ट में भी यह तर्क दिया गया कि मंडी प्रणाली का लाभ छोटे किसानों के मुकाबले बड़े किसान उठा रहे हैं। एक नजर में देखें तो इस तर्क में कुछ दम लगता है क्योंकि बड़े किसान ज्यादा मात्रा में उपज बाजार में लाते हैं (अलबत्ता आज बड़े किसान भी संकट में हैं)। हालांकि न्यूनतम समर्थन मूल्य की सुरक्षा के कारण छोटे किसान भी इसका लाभ उठाते हैं। एमएसपी से किसानों को अपनी कमाई का अंदाजा हो जाता है जिससे घरेलू खपत और कर्ज चुकाने जैसी खर्चों का हिसाब लगा लिया जाता है। इसलिए मंडी व्यवस्था में हर वर्ग के किसान का साझा हित है, जो मौजूदा किसान गोलबंदी में भी साफ दिख रहा है।

मंडी व्यवस्था में कमीशन एजेंटों या आढ़तिया की भूमिका महत्वपूर्ण है, जो भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) जैसी सरकारी एजेंसियों को कृषि उपज की बिक्री में सहूलियत मुहैया कराते हैं। आढ़तिया किसानों को लगातार अग्रिम भुगतान कर देते हैं, चाहे सरकारी खरीद एजेंसियों से बिक्री का भुगतान मिलने में देर हो। इससे किसानों को अगली फसल लगाने और दूसरी जरूरतों के लिए पैसा मिल जाता है। छोटे किसान तो खासकर ऐसे कर्ज के लिए आढ़तियों पर निर्भर होते हैं। ऐसे कर्ज पर ब्याज दर ऊंची होती है, फिर भी अधिकतर किसान आढ़तियों को ‘मजबूरी का बैंकर’ कहते हैं। किसानों इलाज, पढ़ाई से लेकर विभिन्न आयोजनों और विदेश जाने जैसे खर्चों के लिए आढ़तियों ही सहारा बनते हैं।

पंजाब में आढ़तिया कारोबार लंबे समय से बणिक जातियों या महाजनों के हाथों में रहा है और इनका अपने ग्राहक किसानों से पीढिय़ों का नाता है, जो ज्यादातर सिख जाट समुदाय से हैं। हालांकि अब संपन्न जाट भी आढ़तिया बन चुके हैं। यह कोई छिपी बात नहीं है कि प्रदेश के कई किसान संगठनों और दो बड़ी पार्टियों-शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस-के कई बड़े नेता आढ़तिया कारोबार से जुड़े हैं। (मैंने पहले के लेख में भी यह दलील रखी है कि इस कारण से आढ़तियों का तबका मजबूत हुआ है)।  

इस तरह किसानों का आढ़तियों से कई तरह का सामाजिक नाता है, जिससे उन्हें ऋण की किस्ते चुकाने और समय-सीमा में रियायत मिलती है। जब फसल की लागत लगातार बढ़ रही है और खेती से होने वाले आय में लगातार कमी आ रही है, कर्ज हासिल करने की औपचारिक व्यवस्था अपर्याप्त तथा गैर-बराबर है,  आढ़तिया एक ‘जरूरी बुराई’ की तरह बने हुए हैं। किसानों के लिए ये जाने-पहचाने और वक्त-जरूरत पर काम आने वाले हैं, जबकि ताकतवर तथा अनाम चेहरे वाले कारपोरेट उनकी पहुंच से बाहर होंगे, जिन्हें नया कानून इस धंधे में प्रवेश दिलाने का खतरा पैदा कर रहे हैं। इन वजहों और संपन्न तथा राजनीतिक रसूख रखने वाले जाट सिख कमीशन एजेंटों के बढ़ते दबदबे से आढ़तियों के खिलाफ किसान यूनियनों की पहले की शिकायतें दब-सी गई हैं। कई ऐसे किसान संगठन जो पहले आढ़तियों के ख़िलाफ़ थे, अब उन्होंने खुद को आढ़तियों के विरोध से किनारे कर लिया है। यह सब कहने का मतलब यह कतई नहीं है कि बिचौलिये के तौर पर आढ़तिया शोषण नहीं करते हैं। लेकिन, इन सामाजिक और आर्थिक रिश्तों से समझा जा सकता है कि आढ़ती ग्रामीण पंजाब की सामाजिक संरचना का किस कदर हिस्सा हैं और क्यों किसान नए कानूनों का विरोध कर रहे हैं, जो आढ़तियों के दबदबे वाली मंडी व्यवस्था के अलावा कुछ और विकल्प मुहैया कराता है।

उभरती वर्ग-जाति गोलबंदी

नए कानूनों के विरोध प्रदर्शनों की ज्यादातर रिपोर्टिंग और टिप्पणियों में पंजाब किसान आंदोलन में खेतिहर मजदूर यूनियनों की सक्रिय शिरकत को नजरअंदाज कर दिया गया है। कई प्रदर्शनों और मंचों से ‘मजदूर-किसान एकता जिंदाबाद’ के नारे गूंजते हैं। इन यूनियनोंं में पेंडु मजदूर यूनियन, क्रांतिकारी पेंडु मजदूर यूनियन, पंजाब खेत मजदूर यूनियन और दलितों के लिए जमीन के हक के संघर्ष में जुटे जमीन प्राप्ति संघर्ष कमिटी (जेडपीएससी) शामिल हैं। मजदूर संगठनों का किसानों को सर्मथन कोई छोटी बात नहीं है। हमें याद रखना चाहिए कि जाट सिख किसानों और कृषि मजदूरों, खासकर भूमिहीन दलितों, के बीच संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है।

पंजाब की किसान यूनियनों ने 1970 और1980 के बाद शुरू हुए नए किसान आंदोलन के समय से ही सिर्फ बड़े किसानों के हितों का ही ध्यान रखा है। हालांकि ये यूनियनें छोटे किसानों को भी साथ लाने में कामयाब रही हैं। इसकी वजह है कि हरित क्रांति ने सभी किसानों को व्यावसायीकरण की ताकतों के आगे कमजोर किया है। छोटे और बड़े किसान साझा धार्मिक और जातीय पहचान वाले भी हैं। किसान यूनियनों ने जाट सिख किसानों को दलित खेतीहर मजदूरों के खिलाफ लामबंद किया।

लेकिन, साल दर साल जैसे-जैसे हरित क्रांति का उत्साह खत्म होता गया, यह परंपरागत विरोध भी कई मायनों में धीमा पड़ता गया है। खेतों की उर्वरकता घट गई है, मिट्टी और जल की स्थिति बदतर हो गई है और लागत खर्च में लगातार इजाफा हुआ है। छोटे किसान और कृषि मजदूर सभी को खेती के माध्यम से अपना जीवन यापन करने में कठिनाई हो रही है। कर्ज के जाल में फंसकर ये लोग कृषि छोड़ रहे हैं या फिर ड्रग्स के आदी हो रहे हैं या आत्महत्या जैसा कदम उठा रहे हैं (ढेसी और सिंह 2008)। इन्हीं परिस्थितियों के कारण राज्य के किसान और मजदूर एक मंच पर गोलबंद दिख रहे हैं।

क्रांतिकारी पेंडु मजदूर यूनियन के एक नेता की दलील है, ‘‘ऐसा प्रोपगैंडा फैलाया जा रहा है कि यह सिर्फ किसानों का मुद्दा है। लेकिन दरअसल यह मजदूरों, दुकानदारों, आढ़तियों, छात्रों, कामगारों और युवा लडक़े और लड़कियों का भी मुद्दा है क्योंकि हम सब जानते हैं कि हमारा पेट खेती के कारण ही भरता है।’’ आगे उनका कहना है कि मंडियों के जगह पर कॉरपोरेट खरीद केंद्रों को लाने से मजदूरों की जगह मशीनें ले लेंगी और मजदूर ठेकेदारों की भी रोजी-रोटी छिन जाएगी।

किसानों और मजदूरों की यह नई एकता राज्य की सबसे बड़ी किसान यूनियन बीकेयू (एकता उग्राहाँ) के प्रयासों की देन है। हरे और पीले झंडे से पहचाने जाने वाले इस संगठन ने अन्य किसान संगठनों जैसे कि बीकेयू (दकौंडा), कीर्ति किसान यूनियन और पंजाब किसान यूनियन को साथ लाने में कामयाबी हासिल की है। बीकेयू (एकता उग्राहाँ) के मुख्य नेता  जोगिंदर सिंह ने मुझसे बातचीत में कहा था कि किसानों और मजदूरों के बीच जाति और वर्ग विभाजन के कारण इन यूनियनों को साथ लाना जागरूक और प्रतिबद्धता से भरा काम है। 2004 में जोगिंदर सिंह के संगठन ने लुधियाना जिले में किसानों के एक आंदोलन को समर्थन देने का फैसला किया। उनके संगठन ने मजदूरों को चाय पिलाया और प्रदर्शनकारियों के जूठे बर्तनों को साफ किया। मजदूर दलित थे इसलिए बीकेयू (एकता उग्राहाँ) के इस प्रयास ने जाति की दीवारें तोडऩे और सबको साथ लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यूनियन ने तबसे कृषि मजदूरों के मुद्दों को सक्रियता के साथ उठाया है और लगातार समर्थन दे रहे हैं। अन्य किसान और कृषि मजदूर यूनियनों के साथ मिलकर बीकेयू (एकता उग्राहाँ) ने 2010 में मनसा जिले में दलितों के एक प्रदर्शन को तब समर्थन दिया था जब उनकी जमीन का अधिग्रहण पावर प्लांट के लिए किया गया था लेकिन बदले में कोई मुआवजा नहीं दिया गया था। इसी प्रकार 2015-16 में इन किसान यूनियनों ने कपास की नष्ट हुई फसल के लिए कृषि मजदूरों को सरकार के मुआवजा पैकिज में शामिल कराने के लिए भी सफल आंदोलन किया था। कपास चुनने का काम अमूमन दलित परिवारों की औरतें करती हैं और यह उनकी आजीविका का महत्वपूर्ण स्रोत है। हालांकि मुआवजे का वितरण भी असमान रूप से किया गया, फिर भी इसमें मजदूरों को शामिल करवाना एक बड़ी उपलब्धि थी। बीकेयू (एकता उग्राहाँ) ने जमीन प्राप्ति संघर्ष समिति का भी समर्थन किया है। यह संगठन दलितों के लिए भूमि अधिकारों की मांग करती है। बीकेयू (एकता उग्राहाँ) ने इस संगठन को आर्थिक मदद के साथ ही दबंग जाटों के हमले से भी बचाया है।

इन संगठनों के नेता और कार्यकर्ता जोर देकर कहते हैं कि इस तरह का साथ आना सिर्फ किसानों और भूमिहीनों खासकर दलितों की साझी समस्या और हितों के बारे में जागरूकता लाने के कारण ही संभव हो पाया है। उदाहरण के लिए, पंजाब खेत मजदूर यूनियन के लक्ष्मण सिंह सेववाला का कहना है कि छोटे किसान कम जोत, वित्तीय और संरचनात्मक स्रोतों की असमान पहुंच और कर्ज के कारण बहुत मुसीबत में हैं। यही समस्या पंजाब के गांवों के भूमिहीन दलितों की भी है। ऐसे कुछ नेता और कार्यकर्ता इस बात पर भी एकजुट दिखते हैं कि किसी भी सार्थक बदलाव के लिए जाति और वर्ग से साथ जूझना होगा। इसके अलावा, इन संगठनों के संयुक्त मोर्चा स्वास्थ्य, शिक्षा और बेरोजगारी जैसे साझा मुद्दों पर भी संघर्ष कर रहे हैं क्योंकि इन समस्याओं ने जाति और वर्ग की लीक से हटकर सबको प्रभावित किया है। बीकेयू (एकता उग्राहाँ) के जोगिन्दर सिंह के मुताबिक ऐसे साझा संघर्ष एक दूसरे से जूझने और लडऩे-झगडऩे का समय और स्थान देते हैं लेकिन साथ ही इनके कारण एक दूसरे को समझने का मौका मिलता है।

यहाँ स्पष्ट करना जरूरी है कि इन यूनियनों की पहुंच पंजाब के कुछ ही जिलों खासकर मालवा क्षेत्र तक सीमित है जहां उग्र ग्रामीण लामबंदियों (जैसे कि मुजारा, या पट्टेदार आंदोलन) का इतिहास रहा है। अन्य क्षेत्रों में ज़्यादातर यथास्थितिवादी संगठनों का दबदबा है जिस कारण नया आंदोलन विस्तार नहीं ले पाता। जाट छोटे किसान दलितों के संघर्ष (जिसमें जमीन की लड़ाई भी शामिल है) में साथ देने से कतराते हैं क्योंकि उन्हें अपने जाति के आधार पर मिले कमोबेश विशेषाधिकारों और जमीन के स्वामित्व को खोने का डर रहता है। पंजाब में अपने शोध के दौरान मैंने छोटे किसानों को भी लगातार दलितों के ऊपर आलसी होने, कृषि कार्य न करने और ऊंचे मेहनाताना की मांग करने का आरोप लगाते सुना है। लेकिन वास्तविकता यह है कि मजदूर मौजूदा मेहनताने में मुश्किल से ही गुजारा कर पाते हैं। जैसे-जैसे खेती में मशीनीकरण का जोर बढ़ा है, कृषि मजदूरों के लिए काम के अवसरों में लगातार गिरावट देखी गई है। इसलिए दलित समुदाय के लोग यह विश्वास नहीं कर सकते कि जाट किसान संयुक्त आंदोलन में उनके हितों को बराबर महत्व देंगे।

जमीन का सवाल

छोटी जोत या जमीन न होना ही सबसे बड़ा मुद्दा है जिसकी वजह से छोटे किसानों, भूमिहीनों, जाट और दलितों की गोलबंदी दिख रही है। यूनियनों का कहना है कि 1972 में एक व्यक्ति के लिए कानूनी रूप से निर्धारित की गई भूमि की अधिकतम सीमा आवश्यकता से अधिक है क्योंकि तब से आज तक भूमि की उर्वरकता में वृद्धि हुई है। इसलिए उनकी मांग है कि इस अधिकतम सीमा को कम किया जाए और जो भी जमीन अतिरिक्त बचती है उसे भूमिहीनों या कम जमीन वाले लोगों के बीच बांटा जाए। वे चाहते हैं कि छोटे किसानों और भूमिहीन मजदूरों को राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था से मदद दी जाए, जो न सिर्फ ऋण और सिंचाई में मदद दे, बल्कि महंगे बीज, रसायन और मशीनों को खरीदने पर मजबूर न करे।

इसी कारण से पंजाब के खेत-खलिहानों में सरकारी शह से कॉरपोरेट के कब्जे के काले साए की बातें गूंज रही हैं। नेताओं और कार्यकर्ताओं के भाषणों में यही प्रमुखता से सुनने को मिल रही है। नए कृषि कानूनों के विरोध में किसान नेताओं ने बार-बार यह बात उठाई है कि राज्य को ‘अडानी और अंबानी’ के हाथों में सौंपा जा रहा है और बाद में ये लोग अमरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के गुलाम बन जाएंगे। इन भाषणों का परिणाम हमने टोल प्लाजा और रिलायंस के पेट्रोल पंपों पर हमले तथा दशहरा पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुकेश अंबानी और गौतम अडानी के पुतला दहन के रूप में देखा।

यकीनन, यूनियनों की स्वघोषित समाजवादी तथा कॉरपोरेट और साम्राज्यवाद विरोधी नजरिए और छोटी जोत के जरिए व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देने का अंतरविरोध पूरी तरह सुलझा नहीं है। व्यावसायिक खेती, चाहे छोटी जोत में ही क्यों न हो, वर्ग और पूंजीचादी रिश्तों की खाई गहरी करती है। इतना ही नहीं कुछ हालिया अध्ययन का सुझाव है कि समकालीन भारतीय कृषि में बड़ी जोत और ज्यादा उपज मुनाफे के लिए जरूरी है। कृषि राजनीतिक अर्थव्यवस्था के भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के दक्षिणी गोलाद्र्ध के तमाम विद्वानों का मानना है कि भूमि सुधारों का मुद्दा अब पहले की तरह प्रासंगिक नहीं रह गया है। अगर भूमि सुधार को जमींदारी खत्म करने और कृषि पूंजीवाद को बढ़ावा देने का साधन मानें तो उसे इस तर्क में दम नजर आता है।

लेकिन, इन संगठनों के लिए भूमि सुधार एक दीर्घावधिक इंकलाबी लक्ष्य है। यह सामाजिक न्याय और समानता का प्रश्न है। जमीन पर हक सिर्फ आय और आजीविका का प्रश्न नहीं है बल्कि यह भूमिहीन दलितों और गैर-दलित परिवारों और खासकर महिलाओं (विस्तार से नीचे देखें) के लिए गरिमा का सवाल भी है। इतना ही नहीं, ऐसे देश में जहां अधिकांश किसान खेती की आय के अलावा अनियमित मजदूरी से जुड़े हों, छोटी-सी जमीन का मालिकाना हक भी आय की कुछ सुरक्षा दे सकता है। यह उल्लेखनीय है कि जिन कुछ गांवों में जेडपीएससी दलितों के लिए पंचायत की जमीन दिलाने में सफल रही है, वहां परिवारों ने धान और गेहूं और/या चारे (जिसे सरकार अब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदती है) की उपज के लिए समूह बनाए हैं। हालांकि इन उपजों से होने वाली आय कम है, लेकिन सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह काफी महत्वपूर्ण है।

महिलाओं की मुख्य भूमिका

जहां मौजूदा प्रदर्शनों में कृषि मजदूरों की उपस्थिति को नजरअंदाज किया गया है वहीं महिलाओं की बढ़-चढक़र हिस्सेदारी को प्रत्यक्ष तौर पर लोगों ने देखा है। इस वीडियो में बीकेयू (एकता उग्राहाँ) से जुड़ी एक महिला को गाते हुए सुना जा सकता है:

…मंडी बोर्ड हमारा है, मोदी/ हम इसे लेकर रहेंगे;

दिवाली पास है/ पर इसे कोई खयाल नहीं;

उसने पूरी दुनिया को जमीन पर धकेला है/ हम भी तुझे सबक सिखाएंगे।।

झंडा थामे महिलाएं हमारे जत्थे में हैं/ हम छाप लगाकर जाएंगे।।

मोदी चुप्पी साधे रहा/ बिबा, मैंने गलती की/ हम उससे ये कहलवाएंगे।।।

महिलाओं के इस गायन को उनके लगातार जुटाव से समझने की जरूरत है। कई किसान यूनियन 2000 के दशक से ही महिलाओं को गोलबंद कर रहे हैं और अब उनमें महिलाओं की एक अलग इकाई भी है। पिता, भाई और बेटों की आत्महत्या ने कई किसान और कृषि मजदूर परिवारों को कमाऊ पुरुष सदस्य के बगैर कर दिया है और महिलाओं पर तमाम प्रकार की सामाजिक और आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति की ज़िम्मेदारी आ गई। हालिया साल में कर्ज में डूबे परिवारों के महिला सदस्यों की आत्महत्या की खबर भी सामने आई है। महिलाओं के ऊपर कृषि संकट के प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभावों के कारण कुछ संगठन भूमि और कृषि के मुद्दे पर अब महिलाओं को भी साथ ला रहे हैं।

नवशरण सिंह ने पंजाब के प्रगतिशील आंदोलनों में जाति और वर्ग एकजुटताओं को मजबूत करने में दलित महिलाओं, जिनमें युवतियां भी शामिल हैं, की महत्वपूर्ण भूमिका का विश्लेषण किया है। मनसा जिले में भूमि अधिग्रहण के मामले में दलित महिलाओं ने ही सबसे कड़ा विरोध किया, सडक़ जाम किया, पुलिस की मार झेलती रहीं और आदमियों की गिरफ्तारी के बाद भी धरने पर बैठी रहीं। इनके संघर्ष के कुछ दिन गुजर जाने के बाद ही किसान और कुछ अन्य संगठनों ने साथ दिया। अभी के प्रदर्शन में दलित महिलाओं का आगे आना ऐसे घटनाओं की वजह से ही संभव हो पाया है। उदाहरण के लिए किसान यूनियनों ने जाटों द्वारा महिलाओं के यौन उत्पीडऩ के मामले को उठाया है। संगठनों ने मवेशियों के लिए चारे की कमी का मुद्दा भी उठाया है, मवेशी भूमिहीन दलितों के जीवनयापन का एक महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं।

निर्णायक संघर्ष

नए कृषि कानून पंजाब के कृषि कार्यों खासकर सामाजिक और सांस्थानिक पहलुओं की उन भूमिकाओं में मौलिक परिवर्तन करेंगे जो पिछले पचास साल में मंडी व्यवस्था से संचालित हैं। इसी बीच इन कृषि क़ानूनों का विरोध ग्रामीण क्षेत्र में राजनीतिक गोलबंदी के नए स्वरूप का भी इजहार करते हैं। इन सभी परिवर्तनों और घटनाओं का दूरगामी परिणाम दिखना अभी शेष है।

वर्ग, जाति और स्त्री-पुरुष विरोधाभास भारत में किसी भी प्रगतिशील कृषि राजनीति को कमजोर करने के लिए जाने जाते हैं। इसलिए कुछ कृषि मजदूर यूनियन के समर्थन के बावजूद भी यह आश्चर्य की बात नहीं है कि पंजाब का मौजूदा प्रदर्शन सिर्फ किसानों का प्रदर्शन ही लगता है। पिछले कुछ महीनों में सामने आए कुछ लोकप्रिय गीतों में भी इसी की झलक दिखती है। ग़ैर-दलित जातियों की महिलाओं को साथ लाने की कोशिश भी अधूरी दिखती है क्योंकि अभी तक बीकेयू (एकता उग्राहाँ) जैसे किसान संगठन ही इस लक्ष्य को पाने की कोशिश करते हुए दिखते हैं। पंजाब की नई और उभरती गोलबंदी को अभी जाति और वर्ग के मामले से जूझना जारी रखना होगा।

बहरहाल, किसानों, कृषि मजदूर संघों और उनके संगठनों के प्रयास भी उत्साहित करने वाले हैं। तमाम संगठन अब समझ रहे हैं कि इस प्रयास का विस्तार करना और इसे जारी रखने के लिए जमीन पर निरंतर राजनीतिक कार्य के साथ-साथ समाज के दूसरे वर्गों को जोडऩे की भी जरूरत है। इसकी झलक इन संगठनों द्वारा अन्य छात्र संगठन, शिक्षक संगठन, तर्कशील सोसाइटी और लोक मोर्चा पंजाब जैसे प्रगतिशील संगठनों के साथ किए गए गठबंधन में भी देखी जा सकता है। ये सारे संगठन भी मौजूदा प्रदर्शन में अपना योगदान दे रहे हैं। तमाम बाधाओं के बीच इन लोगों की एकजुटता न सिर्फ पंजाब बल्कि राज्य से बाहर भी प्रगतिशील बदलाव के लिए सबक है।

श्रेया सिन्हा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग में पोस्ट डॉक्टरल रिसर्चर हैं। उनका अध्ययन भारत में विकास और कृषि परिवर्तन के राजनीतिक अर्थशास्त्र पर है। यह लेख सबसे पहले द इंडिया फ़ोरम पर अंग्रेज़ी में प्रकाशित हुआ था।

अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद रश्मि गर्ग द्वारा

सरकारी खरीद और मंडी सिस्टम से आगे सोचना क्यों जरूरी?

आज सभी मानते हैं कि कृषि के क्षेत्र में सुधार के लिए खेत से बाजार और बाजार से उपभोक्ता तक एक नई प्रणाली और तंत्र बनना बहुत जरूरी है। सारे देश में, मुख्य तौर पर कृषि आधारित पिछड़े राज्य जैसे बिहार में नई व्यवस्था की जरूरत है। इसके लिए पंजाब, हरियाणा जैसे जिन राज्यों में मंडी सिस्टम मजबूत है उसे बरकरार रखते हुए भी आगे बढ़ा जा सकता है। देखा जाए तो पंजाब और हरियाणा में अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी और मंडी प्रणाली को बचाये रखने के लिए भी खेती से जुड़े ये नए कानून जरूरी हैं।

इस बात को समझने के लिए हमें देखना होगा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य, मंडी प्रणाली और सरकारी खरीद किस तंत्र पर टिकी है। आज से करीब पांच दशक पहले सरकारी मंडी और एमएसपी सिस्टम की शुरुआत देश को भुखमरी से बचाने के लिए हुई थी। इस सिस्टम के तहत सरकार ने शुरुआत में पंजाब और हरियाणा, और बाद में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के किसानों को खूब गेहूं और धान उगाने के लिए प्रोत्साहित किया। इसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य का भरोसा अज्ञैर खरीद की गारंटी मुख्य प्रोत्साहन हैं। फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया अनाज उत्पादक राज्यों से एमएसपी पर अनाज खरीदकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये अन्य राज्यों तक पहुंचाती है। मतलब, हरियाणा-पंजाब का किसान बिहार, झारखंड और अन्य राज्यों के लिए अनाज उगाता है। पीडीएस के राशन की सस्ती दरों का असर इन राज्यों के अनाज बाजार और मार्केट दरों पर भी पड़ता है, जिसका नुकसान वहां के किसान उठाते हैं।

अक्सर हमें यह सुनने को मिलता है कि बिहार में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद क्यों नहीं होती है? बिहार में हरियाणा-पंजाब की तरह मंडी सिस्टम क्यों नहीं है? मान लीजिए कि बिहार भी न्यूनतम समर्थन मूल्य वाली मंडी प्रणाली लागू कर देता है। इससे क्या होगा? फूड कॉरपोरेशन को पंजाब और हरियाणा से कम अनाज खरीदना पड़ेगा। क्योंकि तब बिहार को दूसरे राज्यों से अनाज मंगाने की उतनी जरूरत नहीं रहेगी। इसीलिए भी फूड कॉरपोरेशन बिहार में अनाज की खरीद नहीं करता, ताकि हरियाणा-पंजाब में अनाज की सरकारी खरीद जारी रख सके।

फूड कॉरपोरेशन की समस्या यह है कि उसके पास हर साल जरूरत से ज्यादा अनाज जमा होता है, क्योंकि साल दर साल अनाज का उत्पाद और सरकारी खरीद बढ़ती गई। हम अनाज की कमी से अनाज के सरप्लस की स्थिति में आ पहुंचे हैं। अब सरकार चाहे भी तो पूरे देश के किसानों से सारा अनाज एमएसपी पर नहीं खरीद सकती है। एक तो सरकार के पास इतना पैसा नहीं है और दूसरा पीडीएस की खपत की एक सीमा है। फिर सरकारी खरीद के लिए हरियाणा-पंजाब, यूपी, मध्यप्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में भंडारण आदि की व्यवस्थाएं भी नहीं है। इसलिए एमएसपी पर सरकारी खरीद कुछ ही फसलों और कुछ ही राज्यों तक सीमित है।  

इसमें कोई दोराय नहीं है कि पंजाब और हरियाणा के किसानों ने देश को भुखमरी से बचाया है। इन राज्यों में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद की व्यवस्था बनी रही, इसके लिए बिहार जैसे राज्यों में गेहूं और धान की खरीद की बजाय अन्य फसलों को बढ़ावा देने की जरूरत है। इसके लिए बेहतर बाजार और खरीद तंत्र बनाने की जरूरत है। यह नई व्यवस्था प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी के बिना संभव नहीं है। और इस व्यवस्था को सिर्फ सरकारी खरीद और एमएसपी के बूते नहीं चलाया जा सकता है। क्योंकि अनाज तो पीडीएस में बंट सकता है, इसलिए सरकारी खरीद संभव है। लेकिन बाकी उपज और फल-सब्जियों को एमएसपी पर खरीदने की न तो सरकार की क्षमता है और न ही इतने संसाधन हैं। इसलिए कृषि व्यापार की ऐसी व्यवस्थाएं बनानी होंगी, जिसमें सरकारी खरीद के बगैर भी किसानों के हितों और लाभ को सुनिश्चित किया जा सके। इसमें किसान को बाजार के उतार-चढ़ाव और जोखिम से बचाना और कृषि क्षेत्र में नई तकनीक, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश लाना भी शामिल है।

आज जगह-जगह सुपर मार्केट के जरिये खाने की चीज़ें, फल, सब्जियों इत्यादि बिकने की संभावनाएं बढ़ रही हैं। इस क्षेत्र की  कंपनियों को किसान से भागीदारी करने की जरूरत है। यहां सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार का काम है कि इस भागीदारी में किसान के अधिकार और हितों को मजबूत करे। जिस तरह सरकारी खरीद में फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया अनाज के दाम और खरीद की गारंटी देता है, उसी तरह किसान के साथ कॉन्ट्रैक्ट में खरीद और दाम को सुनिश्चित करना होगा। नए कृषि  कानून उस दिशा में एक कदम हैं। लेकिन अभी उसमें किसानों के लिए और भी सुरक्षा प्रावधानों को जरूरत है।

केंद्र सरकार ने किसान और खेती के लिए जो नए कानून बनाये हैं, उनमें किसानों के अधिकारों को और भी मजबूत किया जाना चाहिए। लेकिन सरकार पर किसानों का विश्वास न होना मोदी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। इसके लिए खुद मोदी सरकार जिम्मेदार है। इसके लिए किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।

(अनूप कुमार अमेरिका की क्लीवलैंड स्टेट यूनिवर्सिटी में जनसंचार के प्रोफेसर हैं)

समझाने की बजाय किसानों पर नीतियां थोपने के दुष्परिणाम

अभी कुछ महीनों पहले मैं प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से जुडी विसंगतियों को लेकर सभी किसानों के हकों के लिए लड़ रही थी। इसके लिए मुझे मीडिया, संसदीय समिति, राज्य कृषि विभाग, केंद्रीय कृषि विभाग, बीमा कंपनी, भारतीय स्टेट बैंक, राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति, रिजर्व बैंक से होते हुए बैंकिंग लोकपाल तक जाना पड़ा, तब कहीं जाकर भारत सरकार थोडा सक्रिय हुई और बंद हो चुकी क्लेम प्रक्रिया को राजस्थान के लिये पुनः चालू करवाया। अगर यह निर्णय नहीं होता तो मैं इस प्रक्रिया को उपभोक्ता अदालत में चैलेंज करती या क़ानूनी प्रक्रिया अपनाती। मैं ऐसा इसलिए कर सकती थी क्योंकि मुझे इन सबके बारे में थोड़ी बहुत जानकारी पहले से है या फिर मैं वह जानकारी हासिल करने की स्थिति में हूँ। लेकिन किसी आम आदमी या साधारण किसान के पास न तो इतनी जानकारियां हैं और न ही इतनी जागरूरकता है कि वह सरकारी नियम-कानूनों की पेचीदगियों से जूझ सके।

जब मैंने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के बारे में कृषि विभाग के जिला स्तरीय अधिकारियों से योजना के बारे में जानकारी लेनी चाही, तब उन्हें यह भी नहीं पता नहीं था कि मैं उनसे क्या पूछ रही हूँ। जो योजना उन्हें अपने जिले में लागू करवानी थी, उसके  दस्तावेज हिंदी में भी उपलब्ध थे। मैं उन्हें हर एक क्लॉज के तहत उनकी जिम्मेदारियां और भूमिकाएँ बताती जा रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे यह सब वे पहली बार ही सुन रहे हो। मैं अपने साथ एक कॉपी ले गई थी जो उन्होंने फोटोकॉपी करवा कर अपनी फाइल में लगाई।

मैंने ऐसे प्रशासनिक अधिकारी भी देखे हैं जो कागजों को पढ़े बिना ही सिर्फ चिड़ियाँ बिठा दिया करते हैं। बहुत कम ही ऐसे होते हैं जो सब कुछ पढ़ लिख कर अपना निर्णय फाइल पर लिखते हैं। यह सन्दर्भ इसलिये रखने जरुरी है कि जब प्रक्रियाएं व तंत्र की कार्यप्रणाली ऐसी होती है तो किसानों से सरकारें ऐसी उम्मीद कैसे कर लेती है कि उन तक सारे कानून और योजनाएं पहुँच जायेगी और वे उन्हें ठीक से पढ़-समझ लेंगे।

अब कृषि कानूनों को ही देखें तो क्या देश के सभी किसानों तक ये कानून पहुंचे हैं? जब मैंने इन कानूनों को पढ़ना चाहा तो सोचा कि कृषि विभाग की वेबसाइट पर तो ये होंगे ही। वेबसाइट पर जा कर देखा तो तीन में से दो ही कानूनों की जानकारी वहां दिखाई दी और वह भी अंग्रेजी में। देश के किसानों से यह उम्मीद करना कि वे वेबसाइट का पता लगाकर कानून खोज भी लेंगे और अंग्रेजी में पढ़-समझ भी लेंगे, यह मेरी नजर में किसानों के साथ-साथ सरकार को भी अंधेरे में रखने के बराबर है। कृषि संबंधी तीसरा कानून तो किसी और ही विभाग का मामला है अतः वो उस विभाग की वेबसाइट पर जा कर खोजना पड़ेगा। कुल मिलाकर बात यह है कि लोगों तक कानूनों की कॉपी पहुंचेगी तभी तो वे उनका विश्लेषण कर अपना निर्णय ले पाएंगे।

अब रही बात कानूनों की भाषा की! अगर किसी ने प्रयास करके इन कृषि कानूनों को खोज भी लिया तो इनकी भाषा इतनी क्लिष्ट है कि समझना मुश्किल है। कोरोना संकट के काल में जब संसद चल भी नहीं पा रही थी, तब भारत सरकार इन कानूनों को अध्यादेश के रूप में लाती है और कुछ महीनों बाद संसद में ध्वनिमत से इन्हें पास कराया जाता है। इस दौरान संसदीय समिति के स्तर पर विचार-विमर्श और आम सहमति बनाने की कोशिश भी नहीं की गई। यहां तक कि संसद में बहस के दौरान विपक्षी दलों को इन बिलों पर बोलने का बहुत कम मौका मिला।  

अध्यादेश सरकार के लिए एक विशेषाधिकार है। इसकी जरूरत तब पड़ती है, जब सरकार किसी बेहद खास विषय पर कानून बनाने के लिए बिल लाना चाहे, लेकिन संसद के दोनों सदन या कोई एक सदन का सत्र न चल रहा हो। संविधान का अनुच्छेद-123 राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति देता है। संविधान कहता है कि अगर कोई ऐसा मुद्दा है, जिस पर तत्काल प्रभाव से कानून लाने की जरूरत हो, तो संसद के सत्र का इंतजार करने की बजाय सरकार अध्यादेश के जरिए उस कानून को लागू कर सकती है। लेकिन इस अनुच्छेद में यह भी स्पष्ट है कि अध्यादेश को बेहद जरूरी या आपात स्थितियों में ही लाया जाना चाहिए। जब देश और पूरी दुनियां एक भयावह महामारी से जूझ रही है तो कृषि व्यापार में बदलाव के लिए अध्यादेश लाने की क्या हड़बड़ी थी? सरकार के इस कदम से यह संदेश गया कि कृषि सुधारों पर आम सहमति बनाने की बजाय सरकार किसानों पर ये कानून थोपना चाहती है। किसानों को आंदोलन के रास्ते पर ले जाने के पीछे यह एक बड़ी वजह है।  

सूचना का अधिकार के तहत सरकारी कार्यालयों को आम जन से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में सूचना का पूर्व-प्रकटीकरण (Predisclosure) करना होता है। कृषि कानूनों के मामले में बिलों के मझौदों पर आम जनता के सुझाव/आपत्तियां भी नहीं ली गईं।

हैरानी की बात है कि नए कृषि कानूनों के तहत किसान अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ सिविल कोर्ट भी नहीं जा सकते। उन्हें सिर्फ प्रशासनिक अधिकारियों (SDM) से ही न्याय की गुहार लगानी पड़ेगी। जो सरकार पूंजीपतियों के दबाव में कृषि कानून लागू करके पीछे हटने को तैयार नहीं है तो किसी विवाद की स्थिति में SDM बड़ी कंपनियों के खिलाफ फैसले दे पाएंगे, इस पर संदेह होता है। और फिर ब्यूरोक्रेसी तक पहुंच और उसे प्रभावित करने की क्षमता किसकी ज्यादा है? किसान की या बड़ी कंपनियों की? आर्बिट्रेशन के नाम पर किसानों को अधिकारियों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे, इसकी क्या गारंटी है?

नए कृषि कानूनों के तहत व्यापार या कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिए कंपनियों के साथ होने वाले एग्रीमेंट इतने जटिल हैं कि कोई वकील या सीए ही समझ सकता है। बड़ी कंपनियां अपने साथ क़ानूनी सलाहकार ले कर चलती हैं जो किसानों के लिए संभव नहीं हैं। फसल बीमा के कानूनी दांव-पेंच में प्राइवेट कंपनियों किसानों को कैसे चक्कर कटवाती हैं, यह सबके सामने हैं।



तुम किसान नहीं हो सकते!

तुम! तुम किसान नहीं हो सकते तुम मुंशी प्रेम चंद के होरी हो सकते हो, तुम हल्कू और जबरा हो सकते हो। मगर तुम किसान नहीं हो। किसान अपनी ‘दो बीघा जमीन’ पर खुश है। तुम ‘दो बीघा जमीन’ के शम्भु हो सकते हो। वो शम्भु जो 65 रूपये के कर्ज की चक्की में पिसता रहता है। लेकिन तुम किसान नहीं हो सकते।  

अच्छा किसान कभी शिकवा शिकायत नहीं करता। वो कभी नहीं कहता कि खेती घाटे का सौदा हो गई है। नगर महानगर, दिल्ली और राज्यों की राजधानी के गिर्द फलते फूलते फार्म हाउस गवाही देते है कि खेती फायदे का धंदा है। ये यूँ ही नहीं है कि नामी गिरामी हस्तियां काश्तकार के रूप में खुद को मुतारीफ कराने को बेताब हैं। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने यूपी के बाराबंकी में कभी जमीन का एक टुकड़ा खरीदा/ताकि वे खेती कर सके। संजय लीला भंसाली ने राजस्थान के जालोर के दसपा में जमीन खरीदी। यह काश्तकारी के प्रति असीम अनुराग था कि फिल्म स्टार जितेंद्र ने बूंदी जिले में जमीन खरीदी। लिएंडर पेस टेनिस के स्टार हैं। लेकिन यह काफी नहीं था। रिपोर्टेंं है कि पेस ने राजस्थान के सिरोही के राडबर में जमीन खरीदी।  

दिल्ली के गिर्दो नवा कोई 2700 फार्म हाउसेज हैं। इनमें कोई ज्वैलर है, कोई नेता है, कोई सम्पादक है, कोई बिचौलिया है, कोई एक्टर है, कोई कांट्रेक्टर है। ये सब खून पसीने की कमाई से बने हैं। उन्हें कोई शिकायत नहीं है। वे वतन परस्त है। वे दिन में किसी को परेशान नहीं करते। खेती भी रात को करते हैं। वहां साँझ ढले खेती शुरू होती है, भोर तक चलती है। वे असली किसान हैं। लेकिन तुम किसान नहीं हो। बेशक! तुम लाल बहादुर शास्त्री के जय जवान, जय किसान नारे का हिस्सा हो सकते हो। मगर दोस्त तुम किसान नहीं हो। 

आंकड़े बोलते हैं कि भारत में हर दिन खेती किसानी पर निर्भर 28 लोग ख़ुदकुशी कर मौत को गले लगा लेते है। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है। मुंबई के एक सांसद गोपाल शेट्टी ने चार साल पहले कथित रूप से कहा “ऐसी मौतेंं एक फैशन हो गई हैं। हर मौत कोई भूख या बेकारी से नहीं होती।”

स्टालिन भी कहता था The death of one man is a tragedy, the death of millions is a statistic एक व्यक्ति की मौत त्रासदी है, लाखोंं की मौत एक आंकड़ा हो जाती है। तुम उस संख्या का हिस्सा हो सकते हो, लेकिन किसान नहीं हो सकते। 

पंजाब के बरनाला में 22 साल के लवप्रीत की जिंदगी ने 23वा बसंत नहीं देखा। उसके पिता कुलवंत सिंह किसान थे, कर्ज से परेशान हो कर जान दे दी। कुलवंत के पिता भगवान सिंह ने भी ऐसे ही मौत को गले लगा लिया था। कर्ज में लिपटी यह तीसरी पीढ़ी थी/आप ये नहीं कह सकते कि किसान को खेती करनी नहीं आती। पंजाब में प्रति एकड़ उपज किसी भी विकसित मुल्क़ के बराबर है।

आंध्र में धरती के उस टुकड़े से मलप्पा का पीढ़ियों का रिश्ता था। लेकिन एक दिन उसने हार मान ली। खेती की नाकमयाबी ने उसे तोड़ दिया।उसने किसी दुकान से  वो सब खरीदा जो दाह संस्कार में काम आता है। मलप्पा ने कफ़न, पत्नी के लिए चुडिया, एक खुद की लेमिनेटेड फोटो और अगरबत्ती खरीदी। फिर खेत पर लौटा और जान दे दी। महाराष्ट्र में जालना में शेजुल राव खेती करते थे। एक दिन सभी नाते रिश्तेदारों को खुद की शोक सभा के लिए न्योता भेजा। किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन अगले दिन शेजुल राव ने आत्म हत्या कर ली। 

उस दिन यतवमाल के शंकर चावरे का नाम भी ख़ुदकुशी करने वाले किसानो की फेहरिस्त में दर्ज हो गया / वो भी खाली हाथ गया। लेकिन चावरे देश के हाकिम के नाम चिठ्ठी छोड़ गया। कहा आपकी नीतियांं मेरी मौत के लिए जिम्मेदार है। उस दिन मुख्यमंत्री का उस इलाके में  कार्यक्रम था। मगर रद्द हो गया। क्योंकि चावरे के परिजन उनसे सवाल पूछने की तयारी कर रहे थे। चावरे की बेटी भाग्य श्री ने कहा, “हमारे नेता कायर निकले।” उनमें एक बेटी की शोकाकुल आँखों का सामना करने की हिम्मत नहीं थी। संसद के 38 % सदस्य किसान है। लेकिन इन मौतों पर कोई नहीं बोला। यूँ वे मुखर रहते हैं मगर इस मुद्दे पर जबान गूंगी हो गई। ऐसी मौतों पर भारत भी नहीं पूछता।  

गेहूं गन्ना ग़मज़दा, उदास खड़ी कपास

सियासत कहीं मशरूफ है, खेती का उपहास !