किसानों को मिलकर रहेगा ब्याज समेत गन्ना भुगतान

कोविड-19 दुनिया भर के लिए मुसीबत का सबब है और उत्तर प्रदेश के गन्ना उत्पादक किसान इसके अपवाद नहीं हैं। करीब 80 फीसदी ग्रामीण अर्थव्यवस्था रोजमर्रा का खर्च चलाने के लिए दूध की बिक्री पर निर्भर है। लेकिन कोरोना संकट के कारण दूध की कीमत घटने से उन किसानों की दिक्कतें बढ़ गई हैं जिन्हें छह से बारह महीनों में गन्ना भुगतान मिलता है। यही नहीं, किसानों पर अपने किसान क्रेडिट कार्ड के कर्ज को ब्याज और जुर्माने के साथ लौटाने का दबाव है, बच्चों के स्कूल और कॉलेज की फीस जमा करने के साथ उन्हें अपना घर भी चलाना है। इससे उन पर भारी बोझ पड़ रहा है और कई किसानों ने आत्महत्या कर ली है।

ऐसे में किसान केंद्र सरकार द्वारा आगामी वर्ष के लिए घोषित गन्ने के उचित लाभकारी मूल्य (एफआरपी) में केवल 10 रुपये की वृद्धि से नाखुश हैं। कई किसानों का कहना है कि उनके सामने खुदकुशी करने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा है। लेकिन मैं गन्ने के बकाया भुगतान की समस्या के बारे में बात करते हुए किसानों को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि आने वाले दिनों में हालत बेहतर हो सकते हैं। यह सर्वज्ञात तथ्य है कि साल 1995-96 तक चीनी मिलें किसानों से गन्ना लेकर भुगतान करने में वर्षों लगा देती थीं। लेकिन 1997 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद जब चीनी मिलों को गन्ना किसानों के 29 करोड़ रुपये ब्याज समेत चुकाने का निर्देश दिया गया तब चीनी मिलों ने जल्द भुगतान करना शुरू कर दिया था क्योंकि उन्हें पता 14 दिनों के बाद ब्याज भी देना पड़ेगा।

निर्देश के बावजूद अगौता चीनी मिल ने 25 करोड़ रुपये से ज्यादा का गन्ना भुगतान तो किया लेकिन ब्याज नहीं दिया। चूंकि तब 80 सहकारी या सरकारी चीनी मिलों का नियंत्रण राज्य सरकार के पास था, इसलिए राज्य सरकार ने ब्याज समेत गन्ना भुगतान में दिलचस्पी नहीं ली और आदेशों का पालन नहीं कराया। जबकि अदालत के आदेशों के तहत ब्याज की धनराशि के बराबर चीनी का स्टॉक डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट की कस्टडी में था। इसलिए 1997 में मुझे गन्ना आयुक्त और चीनी मिल मालिक के खिलाफ अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी। लगभग 12 वर्षों के संघर्ष के बाद आखिरकार चीनी मिल के निदेशक को जेल भेजा गया और अगौता चीनी मिल के किसानों को 2009 में ब्याज का भुगतान मिला।

किसानों को याद दिलाना चाहुंगा कि गन्ना सीजन 1996-97 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) को अवैध करार देते हुए केंद्र द्वारा निर्धारित एसएमपी पर गन्ना भुगतान का निर्देश दिया था जो एसएपी से एक तिहाई कम था। इस मामले पर जब सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की याचिका खारिज हो गई तो 1997 में मैंने हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच में याचिका दायर की जिसमें अदालत ने 1999 में एसएपी को समझौता मूल्य के रूप में कायम रखने और गन्ना आयुक्त को 14 दिनों के भीतर ब्याज समेत भुगतान सुनिश्चित कराने का निर्देश दिया। तब भी ब्याज का भुगतान नहीं किया गया तो मैंने 1997 से ब्याज का भुगतान करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की जो अभी तक लंबित है। जब अगौता चीन मिल ने किसानों को ब्याज का भुगतान किया तो मैंने ब्याज समेत गन्ना भुगतान के लिए एक नई याचिका दायर की।

साल 2014-15 में हाईकोर्ट ने गन्ना आयुक्त को साल 2011 से 2015 तक करीब 2000 करोड़ रुपये के ब्याज का भुगतान सुनिश्चित कराने को कहा लेकिन उस समय की समाजवादी पार्टी सरकार ने 2015 और 2016 में कैबिनेट फैसलों के जरिए चीनी मिलों द्वारा किसानों को दिया जाने वाला भुगतान तीन साल के लिए माफ कर दिया। हाईकोर्ट ने इस निर्णय को रद कर दिया है और योगी सरकार के गन्ना आयुक्त को चार महीनों नए सिरे से मामले पर निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

लेकिन जब गन्ना आयुक्त ने ब्याज भुगतान के मुद्दे पर लगभग दो साल तक कोई निर्णय नहीं लिया तो मुझे अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी। पहले तो गन्ना आयुक्त ने अदालत के निर्देशों को टालने की कोशिश की लेकिन जब उन्हें गिरफ्तार किए जाने की चेतावनी दी गई, तो उन्होंने 2019 में एक हलफनामा दायर किया कि 2012-13, 2013-14 और 2014-15 में लाभ कमाने वाली चीनी मिलें किसानों को प्रतिवर्ष 12 फीसदी और घाटे में चल रही मिलें 7 फीसदी ब्याज का भुगतान करेंगी। इसमें भुगतान माफ किए जाने या 2011-12 के ब्याज भुगतान का कोई जिक्र नहीं है जबकि इसका भुगतान भी अदालत के आदेश के अनुसार होना चाहिए।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आपत्ति जताई कि ब्याज का भुगतान कानूनन 15 फीसदी की दर से होना चाहिए। मैंने गन्ना किसानों को मिलने वाला ब्याज खत्म करने के लिए राज्य सरकार और गन्ना आयुक्त के अधिकार को भी चुनौती दी। जब गन्ना आयुक्त ने ब्याज के भुगतान के बारे में हलफनामा दायर कर दिया, तब धनराशि का भुगतान तुरंत होना चाहिए था, लेकिन राज्य और चीनी मिलों ने लंबी हड़ताल और बाद में महामारी के कारण अदालत न चलने का फायदा उठाया।

लेकिन अदालतें कुछ दिनों में काम करना शुरू कर देंगी और तब गन्ना आयुक्त को ब्याज के भुगतान में देरी का कारण बताना होगा। एक बार जब सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दे दिया कि गन्ना आयुक्त के पास ब्याज राशि को माफ करने या कम करने का अधिकार नहीं है, तो मिल मालिक या राज्य 14 दिनों के बाद भुगतान में एक दिन की भी देरी नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें 15 फीसदी ब्याज देना होगा, जबकि उन्हें कॉरपोरेट कर्ज 10 से 12 फीसदी ब्याज पर मिलता है। ये तथ्य बताते हैं कि किसानों को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। निश्चित रूप से उन्हें ब्याज का भुगतान मिलेगा।

मैं गन्ना किसानों को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि बुरा वक्त बीत चुका है और अब बकाया भुगतान मिलना तय है। अगर 1996 से 15 फीसदी सालाना की दर से ब्याज का भुगतान किया जाता है, तो उन्हें प्रति एकड़ एक लाख रुपये मिलेंगे और यदि 2011-12 से 2019-2020 तक भुगतान किया जाता है, तो भी उन्हें प्रति एकड़ 50 हजार रुपये से कम नहीं मिलेंगे।

कर्ज अदा न करने पाने वाले गन्ना किसानों के खिलाफ रिकवरी नोटिस जारी होने को लेकर उनकी परेशानी समझी जा सकती है। लेकिन हर किसान को पता होना चाहिए कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच के 2012 के आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि जब तक चीनी मिलों से ब्याज समेत गन्ना भुगतान न हो जाए, तब तक राज्य किसानों के खिलाफ सरकार रिकवरी नोटिस जारी नहीं कर सकती है। यही वजह है कि पिछले सात सालों में रिकवरी नोटिस जारी नहीं हुए और किसानों को कम से कम 10 फीसदी कलेक्शन चार्ज की बचत हुई है। लेकिन इस साल स्टे ऑर्डर लागू होने के बावजूद रिकवरी नोटिस जारी हुए हैं। राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन ऐसे रिकवरी नोटिस को वापस कराने के प्रयास कर रहा है।

एफआरपी में दस रुपये की वृद्धि से भी किसानों को उदास होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हम सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले के अनुसार एसएपी के हकदार हैं, जिसने मेरे मामले में हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। राज्य को एसएपी तय करने का अधिकार है, जो एक वैध मूल्य है। उम्मीद है कि अक्तूबर में जो एसएपी तय किया जाएगा, वह प्रधानमंत्री के वादे के मुताबिक उत्पादन लागत पर 50 फीसदी लाभ के फार्मूले के अनुसार कम से कम 450 रुपये प्रति क्विंटल होगा। एक बार जब 15 फीसदी की दर से किसानों को ब्याज का भुगतान किया जाएगा तो अगली बार गन्ना भुगतान खुद ही समय से होगा। इससे नोटबंदी और महामारी के दौरान नौकरी गंवा चुकी युवा पीढ़ी के लिए खेती की तरफ लौटने का अच्छा अवसर मौका मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा।

(लेखक किसान नेता और राष्ट्रीय मजदूर किसान संगठन के संयोजक हैं)

बंजर होती कृषि भूमि और खाद्य सुरक्षा की चुनौती

प्रत्येक जीवित प्राणी का एक सामान्य लक्ष्य होता है इस दुनिया में एक नई ज़िंदगी को लाना। इससे जीवन और क्रमागत उन्नति का चक्र चलता रहता है। लेकिन जीवित रहने के लिए और इस चक्र के चलते रहने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है भोजन की उपलब्धता। केवल भोजन नहीं, उच्च गुणवत्ता और पोषण वाला भोजन।

वर्ष 2020 ने हमें कई महत्वपूर्ण सबक सिखाए हैं। आपने यह भी महसूस किया होगा कि यह वर्ष कितनी तेजी से बीतता जा रहा है। फिलहाल भारत की आबादी 1.38 अरब (138 करोड़) से ऊपर है और तेजी से बढ़ती जा रही है। द वायर में कबीर अग्रवाल द्वारा लिखे लेख के अनुसार, साल 2036 में भारत की आबादी 1.52 अरब (152 करोड़) हो जाएगी। यह आज से सिर्फ 16 वर्ष बाद होने वाला है। बस सोलह साल! इसमें अगर आप 14 साल और जोड़ दें तो 2050 में हमारी आबादी 1.7 अरब (170 करोड़) से बस कुछ ही कम होगी और भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश होगा।

साल 2050 में धरती पर 10 अरब लोग होंगे (जेनेट रंगनाथन और अन्य 2018)। वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (WRI) की एक रिपोर्ट के अनुसार 10 अरब लोगों को लगातार भोजन उपलब्ध करवाने के लिए हमें इन तीन अंतरों को भरना होगा –

  1. वर्ष 2010 में उत्पादित फसलों की कैलोरी और 2050 में अनुमानित आवश्यक कैलोरी के बीच 56% के अंतर को भरना
  2. वर्ष 2010 के मुकाबले वर्ष 2050 में 59.3 करोड़ हेक्टेयर (भारत से लगभग दुगना क्षेत्र) क्षेत्र के विस्तार की आवश्यकता पड़ेगी
  3. अगर जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों से बचना है तो 2050 तक कृषि द्वारा 11 गीगाटन ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को कम करना होगा ताकि वैश्विक तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस के भीतर सीमित रखा जाए।

इस रिपोर्ट के अनुसार, हमें कृषि भूमि का विस्तार किए बिना ही खाद्य उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है। भारत में शहरों के तेजी से विस्तार और घटते कृषि भूमि क्षेत्र को देखते हुए हमें ऐसी जमीन को सुधारना होगा जो बंजर हो चुकी है और जिसे फिर से खेती के इस्तेमाल में लाया जा सकता है। हमें अपना भविष्य बचान है तो अपनी मिट्टी को बचाना ही पड़ेगा।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, साल 2050 तक सतत रूप से खाद्य उत्पादन को दोगुना करने की जरूरत है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का पेट भरने के लिए भारत के सामने बढ़ती खाद्य मांग को पूरा करने में सर्वाधिक योगदान के अलावा कोई रास्ता नहीं है। लेकिन भूमि अवक्रमण की मौजूदा समस्या को देखते हुए इस लक्ष्य को हासिल करना और भी कठिन है। भूमि अवक्रमण की स्थिति चिंताजनक है, लेकिन हमारे पास अभी भी वक्त है कि हम अपनी प्राथमिकताओं को पुनर्व्यास्थित करें।

भारत में भूमि अवक्रमण, जल भराव और खारेपन की समस्या

भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्र 32.87 करोड़ हेक्टेयर है, जिसमें 26.45 करोड़ हेक्टेयर का उपयोग कृषि, वानिकी, चारागाह और बायोमास उत्पादन के लिए किया जाता है। मृदा सर्वेक्षण और भूमि उपयोग योजना के राष्ट्रीय ब्यूरो के अनुसार, लगभग 14.68 करोड़ हेक्टेयर जमीन का अवक्रमण हो चुका है। (रंजन भट्टचार्य और अन्य 2015)। यह भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का करीब 45 फीसदी है।

मिट्टी की लवणता और जलभराव भूमि अवक्रमण करने वाली रासायनिक और भौतिक प्रक्रियाओं का हिस्सा हैं। ये दोनों प्रक्रियाएं प्राकृतिक या भौगोलिक कारणों से भी होती हैं, लेकिन खारेपन और जलभराव की मुख्य वजह मानव की गतिविधियां और हस्तक्षेप हैं। आंकड़ों के मुताबिक, भारत में करीब 67.3 लाख हेक्टेयर जमीन खारेपन से प्रभावित (लवणीय और क्षारीय) है। यह क्षेत्र श्रीलंका के कुल भौगोलिक क्षेत्र के बराबर है।
सीएसएसआरआई, करनाल के अनुसार, हर साल जलभराव और खारेपन की वजह से भारत को सालाना 8 हजार करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचता है। साल दर साल ये दोनों समस्याएं बढ़ती जा रही हैं क्योंकि भूमि में सुधार की गति काफी धीमी है।

इसमें कोई दोराय नहीं है कि हरित क्रांति के कई लाभ हुए हैं, लेकिन हमें इस तथ्य को भी स्वीकार करना होगा कि हरित क्रांति के कई नुकसान भी हुए हैं। उर्वरकों और कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल मिट्टी को नुकसान पहुंचाता है। जरुरत से ज्यादा सिंचाई, पानी की बर्बादी और सिंचाई की वजह से होने वाले भूमि अवक्रमण से निपटने में दूरदर्शिता की कमी हमें हरित क्रांति के साथ आई है। अब बढ़ते तापमान और अप्रत्याशित बारिश के चलते अत्यधिक जलभराव, मिट्टी का कटाव और शुष्क व अर्धशुष्क क्षेत्रों में तेजी से वाष्पीकरण के कारण मिट्टी की उपजाऊ पर्रतों में नमक का जमाव बढ़ रहा है। इससे खेत की पैदावार घटती है, जमीन बंजर होने लगती और अंत में जमीन खेती लायक नहीं रहती।

समय की मांग

जब तक हम कृषि भूमि के अवक्रमण और सुधार के बीच संतुलन नहीं बनाएंगे, तब तक हमारी खाद्य सुरक्षा पर खतरा बना रहेगा। इस मुददे को लेकर जागरूकता बढ़ाना आज के समय की सबसे बुनियादी मांग है। किसान और उपभोक्ताओं दोनों को इस बात की जानकरी होनी चाहिए कि समस्या क्या है और उसका क्या समाधान है।

क्षेत्रीय स्तर पर डेटा संग्रह और डेटा बैंक के निर्माण की जरूरत है। इस काम के लिए गैर-सरकारी और निजी क्षेत्र को आगे आना होगा। इसका लाभ यह होगा कि जब सरकार भूमि अवक्रमण से प्रभावित क्षेत्र में किसी बड़ी परियोजना को लागू करेगी तो डेटा संग्रह में खर्च होने वाला समय बचेगा और बेहतर तरीके से नीति का क्रियान्वयन होगा।

इस कार्य में नागरिकों, गैर-सरकारी संगठनों, निजी उद्यमों और सरकारी विभागों की भागीदारी बहुत महत्वपूर्ण है। हमारे सामने जो लक्ष्य है वह बहुत बड़ा है और इसे केवल एक संस्था के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। सार्वजनिक मांग किसी नीति के कार्यान्वयन का मुख्य चालक है और यदि नागरिकों को यह ही नहीं पता होगा कि भविष्य में क्या दांव पर लगा है तो कुछ भी नहीं किया जा सकता है।

नागरिक भागीदारी और शिक्षा

भारत की मध्य आयु लगभग 29 वर्ष है अर्थात हमारे देश की आधी आबादी 29 वर्ष की आयु से कम है। 2050 में 2020 में जन्म लेने वाले 30 वर्ष के होंगे और जो आज 29 वर्ष के हैं वे 59 के होंगे। यदि खाद्य सुरक्षा के मुद्दों को प्राथमिकता नहीं दी गई तो ये लोग पौष्टिक और भरपेट आहार के लिए संघर्ष कर रहे होंगे। वह बहुत भयावह स्थिति होगी।

आर्थिक और पर्यावरण दोनों की दृष्टि से समाज के समग्र विकास के लिए युवा पीढ़ी की शिक्षा बहुत मायने रखती है। विकास का कोई अंत नहीं है लेकिन हमारे पर्यावरण का अंत जरूर हो सकता है! समझने की जरूरत है कि इससे हमारा जीवन जुड़ा हुआ है। हमारे समाज और शिक्षा प्रणाली को पर्यावरण प्रेमियों, टिकाऊ विकास के पैरोकारों और मानवतावादियों की जरूरत है ताकि वे संरक्षित पर्यावरण की शीतलता से अंधाधुंध विकास की आंच को संतुलित कर सकें। यदि हम डाक्टरों से ज़्यादा चाकुओं का उत्पादन करेंगे तो घावों का इलाज होना नामुमकिन है।

(लेखक वासाल्ड फाउंडेशन के निदेशक हैं)

पर्यावरण विनाश और कृषि संकट, एक सिक्के के दो पहलू

भारत की 30 प्रतिशत से अधिक भूमि अवक्रमण से प्रभावित है। इसे अंग्रेजी में Land Degradation कहा जाता है। जमीन का कटाव, अम्लीकरण, बाढ़, मृदा अपरदन या मिट्टी में बढ़ता खारापन कुछ ऐसी प्रक्रियाएं हैं जिनके कारण मिट्टी अपनी उर्वरता खो देती है और जमीन मरुस्थलीकरण की ओर अग्रसर होने लगती है।

पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली मानवीय गतिविधियां इक्कीसवी सदी में अपने चरम पर हैं। आज मनुष्य प्रकृति का अधिक से अधिक दोहन करना चाहता है। इसके अलावा पृथ्वी पर आबादी का बोझ भी बढ़ता जा रहा है। वैसे, यह अपने आप में ही एक वाद-विवाद का विषय है कि गरीबी से आबादी बढ़ रही है या आबादी बढ़ने से गरीबी बढ़ी है ! फिर भी आज का सबसे बड़ा सत्य यही है कि हम बेलगाम आर्थिक वृद्धि के लिए निरंकुश तंत्रों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

भूमि अवक्रमण
(https://india.mongabay.com/2018/10/why-land-degradation-in-india-has-increased-and-how-to-deal-with-it/)

अनुचित कृषि गतिविधियां, वनों की अंधाधुंध कटाई, औद्योगिक कचरे का अनुचित प्रबंधन, अत्याधिक चराई, वनों का लापरवाह प्रबंधन, सतह खनन और वाणिज्यिक/औद्योगिक विकास कुछ बुनियादी कारण हैं जिनकी वजह से पर्यावरण का प्राकृतिक संचालन अस्त-व्यस्त हो गया है। ऐसे में स्वाभाविक है कि मिट्टी, जल, वायु जैसे कुछ प्राकृतिक संसाधन अपनी उत्पादकता खोने लगे हैं। इसलिए खेती जैसा व्यवसाय जो इन्हीं संसाधनों पर टिका है, उस पर संकट आना स्वाभाविक है।

इसके अलावा 1960 के बाद आई हरित क्रान्ति के कारण कृषि क्षेत्र में ऐसी नई तकनीकें और बीज प्रौद्योगिकी आई जिनकी वजह से पानी की खपत बहुत बढ़ गई है। भारत में कुल पानी के उपयोग में से 70 प्रतिशत केवल कृषि सिंचाई में लग जाता है। तो जिस प्रकार मशीन के सतत प्रयोग से साल दर वह पुरानी पड़ती है, वैसे ही इन प्राकृतिक संसाधनों का साल दर साल ह्रास हो रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम इन्हें इनकी धारण क्षमता से अधिक प्रयोग में ला रहे हैं।

आज  कृषि विविधता भी कम होती जा रही है। पहले लोग हर तरह की साग-सब्जियां, तमाम तरह के अनाज और दालें उगाते थे जिसकी वजह से कृषि में विवधता बनी रहती थी और प्राकृतिक संतुलन भी सुरक्षित रहता था। वहीं आज की पीढ़ी के भोजन में विवधता कम हो गई है। पैकेजिंग और प्रोसेसिंग पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है जिस वजह से हम केवल कुछ ही फसलों पर जोर देते हैं। इससे कूड़ा-कचरा तो बढ़ता ही है, लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। साथ ही साथ कृषि विविधता कम होने से मिट्टी, पानी, हवा की सेहत खराब होती है जिस वजह से किसान को आर्थिक घाटा उठाना पड़ता है।

खेतों में जलभराव
(https://www.indiawaterportal.org/articles/water-woes-different-kind)

ऐसे में यह समझना आवश्यक हो जाता कि क्या सरकार की तरफ से दी गई सब्सिडी और आर्थिक मदद या फिर बाजार उदारीकरण पर्याप्त कदम हैं ? ये तो केवल आपूर्ति पक्ष को मजबूत करने के लिए कुछ कदम हैं जिनका फायदा और नुकसान अभी भी हम नहीं जानते हैं। असल में दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य से देखा जाए तो खपत पक्ष की तरफ आए हुए बदलाव भी खेती के व्यवसाय के लिए उतने ही घातक हैं जितनी सरकारी नाकामयाबी। इन्हीं परिस्थितियों के चलते कृषि संकट विकराल रूप घारण कर रहा है।

अक्सर देखा जाता है कि हम कृषि क्षेत्र में आए संकट को किसानों की अज्ञानता, निरक्षरता से जोड़ने लगते हैं। हमें लगता है कि किसान प्रौद्योगिकी नहीं समझता। हमें दरअसल खुद से सवाल करना चाहिए कि क्या हम भी विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सही अर्थ को समझ पाएं हैं! क्यों हम विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल प्रकृति से संरक्षण, संवर्धन से ज्यादा अंधाधुंध दोहन में कर रहे हैं?

(लेखिका अर्थशास्त्र और पर्यावरण विषयों की शोधार्थी हैं)

हैंडलूम, पावरलूम और हैंडीक्राफ्ट के बाद मोदी सरकार ने जूट और कॉटन बोर्ड भी खत्म किए

केंद्र सरकार का कपड़ा मंत्रालय इसके अधीन काम करने वाले बोर्ड को खत्म करता जा रहा है। इसके पीछे “न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन” का तर्क दिया जा रहा है। पिछले दिनों राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर केंद्र सरकार की हैंडलूम बोर्ड खत्म करने को लेकर काफी आलोचना हुई थी। लेकिन ऐसी आलोचनाओं की परवाह न करते हुए केंद्र सरकार ने पटसन सलाहकार बोर्ड (जेएबी) और कपास सलाहकार बोर्ड (सीएबी) को भी खत्म करने का फैसला लिया है। यह फैसला ऐसे समय लिया गया है जब बुनकर और हस्तशिल्प से जुड़े उद्यय आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं और उन्हें सरकारी मदद का इंतजार है।

गत 4 अगस्त को जारी अधिसूचना के अनुसार, भारत सरकार ने मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिमम गवर्नेंस के दृष्टिकोण और एक न्यून सरकारी तंत्र की आवश्यकता के अनुरूप पटसन सलाहकार बोर्ड को समाप्त कर दिया है।

इससे पहले 3 अगस्त को यही कारण बताते हुए कपास सलाहकार बोर्ड को समाप्त कर दिया था। कपड़ा मंत्रालय के तहत काम करने वाली ये दोनों संस्थाएं जूट और कॉटन की खपत और उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ-साथ इनसे जुड़े उत्पादों की मार्केटिंग के लिए सरकार को सलाह देने का काम करती थीं। इनमें सरकारी प्रतिनिधियों के अलावा उद्योग जगत, कला क्षेत्र और बुनकरों के प्रतिनिधि शामिल थे।

कला क्षेत्र से जुड़ी कई हस्तियां सरकार के इस फैसले पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए सवाल उठा रही हैं। परंपरागत भारतीय शिल्प के संवर्धन में जुटी दस्तकार संस्था की लीला तैयबजी ने फेसबुक पर लिखा कि बरसों से हैंडीक्राफ्ट बोर्ड बुनकरों और शिल्प जगत के लोगों के विचारों को सरकार तक पहुंचाने का माध्यम था। कोराना काल में चुपके से अजीब चीजें घटित हो रही हैं। 70 साल पुराने हैंडीक्राफ्ट बोर्ड को खत्म करने का फैसला हैरान करने वाला है।

जूट और कॉटन एडवाइजरी बोर्ड को खत्म करने के अलावा सरकार ने टेक्सटाइल रिसर्च एसोसिएशन को संबद्ध निकाय की बजाय स्वीकृत निकाय का दर्जा दिया है। देश में कपड़ा मंत्रालय से स्वीकृत आठ टेक्सटाइल रिसर्च एसोसिएशन हैं। इनका दर्जा बदलते हुए गवर्निंग बॉडी से कपड़ा मंत्रालय के अधिकारियों को भी हटा दिया है।

अब तक तक केंद्र सरकार कपड़ा मंत्रालय से जुड़े 5 बोर्ड खत्म कर चुकी है। इनकी स्थापना टेक्सटाइल और हस्तशिल्प से जुड़े उद्योगों को बढ़ावा देने और इनसे जुड़े मुद्दों पर केंद्र सरकार को सलाह देने के लिए की गई थी। कई दशक पहले स्थापित हुए इन बोर्डों को खत्म करने को लेकर विपक्षी दल कांग्रेस के नेताओं ने भी सरकार की आलोचना की है। कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला का कहना है कि नोटबंदी और जीएसटी की मार झेल रहे बुनकरों के सामने रोजी-रोजी का संकट है। लेकिन सरकार ने आत्मनिर्भर पैकेज के जरिए उन्हें कोई राहत नहीं दी बल्कि हैंडलूम बोर्ड को ही खत्म कर दिया है।

खत्म किए गए हैंडीक्राफ्ट बोर्ड का इतिहास पंडित जवाहरलाल नेहरू से जुड़ा है, इसलिए कई लोग सरकार के फैसले को नेहरू दौर की संस्थाओं को समाप्त करने के क्रम में देख रहे हैं। हैंडीक्राफ्ट बोर्ड की स्थापना 1952 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की पहल पर हुई थी, जब उन्होंने सांस्कृतिक कार्यकर्ता पुपुल जयकर को देश में हस्तशिल्प, हथकरघा और ग्राम शिल्प को बढ़ावा देने के लिए एक नीति बनाने का जिम्मा दिया। लेकिन पिछले वर्षों में बोर्ड की गतिविधियां काफी सीमित हो गई थीं। इस आधार पर ही हैंडीक्राफ्ट बोर्ड को खत्म करने के फैसले को सही ठहराया जा रहा है।

टेक्सटाइल से जुड़ी कई संस्थाओं को एक झटके में समाप्त किए जाने के बाद सवाल उठ रहा है कि शिल्पकारों, कला और उद्याेग जगत के लोगों और सरकारी अधिकारियों के बीच समन्वय की भूमिका अब कौन निभाएगा? क्या सरकार इस जिम्मेदारी को निफ्ट और एनआईडी जैसे सरकारी संस्थानों को देगी या फिर नीति आयोग की तर्ज पर नई संस्थाओं का गठन किया जाएगा।

चार दशक में पहली बार साल भर शून्य से नीचे रहेगी जीडीपी ग्रोथ

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर देश कई चुनौतियों से जूझ रहा है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान पूरे साल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर शून्य से नीचे यानी निगेटिव रहेगी। यह स्थिति तब है जबकि अर्थव्यवस्था को सामान्य मानसून और कृषि क्षेत्र का भरपूर साथ मिल रहा है।

गुरुवार को मौद्रिक नीति की समीक्षा के बाद आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि कोविड-19 महामारी के चलते चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही के दौरान इकनॉमी सकुंचित रहेगी। पूरे वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान भी वास्तविक जीडीपी ग्रोथ निगेटिव रहने का अनुमान है। अगर महामारी पर जल्द काबू पा लिया जाता है तो आर्थिक स्थिति सुधर सकती है लेकिन अगर महामारी और ज्यादा फैलती है या फिर मानूसन सामान्य नहीं रहता है तो अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा।

India GDP Growth Rate 1961-2020. www.macrotrends.net. Retrieved 2020-08-06.

महामारी में महंगाई का खतरा

अर्थव्यवस्था में सुस्ती के साथ-साथ महंगाई का खतरा भी बढ़ता जा रहा है जिसे देखते हुए आरबीआई ने ब्याज दरों में कोई कटौती नहीं की है। इस साल जून में वार्षिक महंगाई दर मार्च के 5.84 फीसदी के मुकाबले बढ़कर 6.09 फीसदी रह गई, जो केंद्रीय बैंक के मीडियम टर्म टारगेट से अधिक है। आरबीआई का टारगेट 2 से 6 फीसदी है।

कोरोना संकट को देखते हुए ऋणों के एक बार पुनर्गठन की छूट दे दी है। इस तरह की राहत का कॉरपोरेट जगत को बेसब्री से इंतजार था। बैंकों का कर्ज डूबने और एनपीए संकट के पीछे इस तरह के कर्ज पुनर्गठन बड़ी वजह है। हालांकि, आरबीआई ने कर्ज भुगतान में मोहलन यानी लोन मोरेटोरियम के बारे में आज कोई ऐलान नहीं किया। लोन मोरेटोरियम की अवधि 31 अगस्त को खत्म हो रही है।

साल दर साल बढ़ती आर्थिक सुस्ती

पिछले चार दशक में यह पहला मौका है जब भारत की जीडीपी ग्रोथ शून्य से नीचे रहेगी। इससे पहले सन 1979 में जनता पार्टी सरकार के वक्त जीडीपी की विकास दर शून्य से नीचे रही थी। साल 2005 से 2014 के दौरान जीडीपी की ग्रोथ रेट 7-8 फीसदी के आसपास रही है। लेकिन 2016 से जीडीपी ग्रोथ में गिरावट का सिलसिला जारी है। साल 2019-20 में देश की जीडीपी ग्रोथ 11 साल में सबसे कम 4.2 फीसदी रही थी, लेकिन इस साल तो जीडीपी में इतनी वृद्धि की उम्मीद भी नहीं है।

देश की अर्थव्यवस्था पर महामारी की मार का अंदाजा मई महीने में ही लग गया था, तभी से जीडीपी ग्रोथ निगेटिव रहने की आशंका जताई जा रही हैं। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी फिच के मुताबिक, अर्थव्यवस्था पर कोरोना वायरस का असर अगले कई वर्षों तक रहेगा। हालांकि, आरबीआई गवर्नर ने कृषि क्षेत्र से उम्मीद लगाते हुए कहा कि खरीफ की फसल अच्छी रहने से ग्रामीण क्षेत्र में मांग सुधरेगी। शून्य या इससे भी नीचे की विकास दर असर रोजगार, वेतन, मांग और बिक्री समेत अर्थव्यवस्था के हरेक हिस्से और हर व्यक्ति पर पड़ेगा।