जैव-विविधता बचाने के लिए साल 2019 का संदेश

वर्ष 1993 में यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली की दूसरी बैठक में विश्व के सभी देशों में जैव-विविधता के प्रति समाज को सचेत करने के लिए तय किया गया कि वर्ष में एक ऐसा भी दिन होना चाहिए जिस दिन पूरी दुनिया जैव-विविधता के संबंध में चिंतन करे और उसको बचाने के उपायों को अमल में लाने का कार्य करे। इसी चर्चा के के तहत तय किया गया कि प्रत्येक वर्ष 22 मई को विश्व जैव-विविधता दिवस मनाया जाएगा और वर्ष 2002 से लगातार यह दिवस मनाया भी जा रहा है। जिसमें कि प्रत्येक वर्ष जैव-विविधता से संबंधित एक अलग विषय रखा जाता रहा है। यूनाइटेड नेशंस के जैव-विविधता गुडविल दूत एडवर्ड नोरटन के अनुसार आज विश्व के मानव की विभिन्न पर्यावरण विरोधी गतिविधियों के कारण जंगल कम होते जा रहे हैं। ऐसे में वर्ष 2019 हमें यही संदेश देता है कि हमें अपने जंगलों पर भी ध्यान देना चाहिए।

कृषि के संदर्भ में अगर देखें तो किसानों द्वारा दलहन व तिलहन की पैदावार बहुत कम कर दी गई है। यही कारण है कि दालों व तेलों का आयात दूसरे देशों से किया जा रहा है। जंगलों में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियां या तो समाप्त हो गई हैं या फिर उनको पहचानने वाले नहीं बचे हैं, जिस कारण से पुरातन ज्ञान भी समाज से विलुप्त हो रहा है। पहले गांव कस्बे के नीम-हकीम जंगल से अपने ज्ञान के आधार पर औषधीय पौधे चुनकर लाते थे तथा गांव-देहात के समाज को होने वाली बीमारियों का इलाज उनसे करते थे। पशुओं को जंगल में चराने ले जाया जाता था तो पशुओं द्वारा चरी गई घास से पशुओं की स्वयं की बीमारियां ठीक हो जाया करती थीं। गाय के दूध में औषधीय गुणकारी तत्व मिलते थे, लेकिन अब न तो इतने पशु बचे हैं कि उनको चराने के लिए ले जाया जाए और न ही चराने वाले।आज बेढंगे रहन-सहन के कारण सम्पूर्ण जैव-विविधता खतरे में आ गई है।

जैव-विविधता चक्र चरमराता दिख रहा है। आज जिस प्रकार डायनासोर के बारे में हम कहते हैं कि कभी ऐसा कोई जीव भी पृथ्वी पर रहा होगा। शायद इसी प्रकार आज मौजूद जीव-जन्तुओं के बारे में भी भविष्य की पीढ़ियां कहा करेंगी। गिद्ध, मोर, शेर, गुरशल, छोटी चिड़िया, कव्वे, कोयल, बगुले, तोता व और न जाने कितने छोटे-बड़े कीट-पतंगे व जीव-जन्तु बहुत-से इलाकों से लुप्त हो चुके हैं या फिर लुप्त होने के कगार पर हैं। खेतों से किसान मित्र केंचुए लगभग गायब हो चुके हैं तथा जंगलों में जानवर कम हो रहे हैं। शायद ही कोई ऐसी सड़क होगी जिस पर प्रतिदिन एक या उससे अधिक जंगली जानवर  (कुत्ता, बिल्ली, गीदड़, भेडिया व लोमड़ी आदि) वाहनों से कुचरकर न मरते हों। कृषि में मशीनों के चलते खेतों की जुताई हेतु बैल तो किसी ही विरले किसान के पास मिलते हैं। देश भर के विभिन्न सुरक्षित जंगलों में आने वाले प्रवासी पक्षियों के आवागमन में कमी आई है।

कुछ अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययनों की मानें तो अंटार्कटिका में रहने वाले भालू व पेंगविन भी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रहे हैं। जंगल का राजा शेर जंगलों में मानव की बढ़ती अवैध दखल के कारण अपना अस्तित्व बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहा है। देश के अनेक वन क्षेत्रों से शेर समाप्त हो चुके हैं। यह दुःखद ही है कि जिन जंगलों में शेरों का राज होता था वहां शेर बाहर से लाकर छोड़े जा रहे हैं। हस्तिनापुर  के जंगल में विभिन्न दुर्लभ प्रजातियों चंदन आदि के पेड़ हुआ करते थे, लेकिन आज इस पूरे करीब 400 वर्ग किलोमीटर के जंगल में एक भी चंदन का पेड़ नहीं बचा है। सब अधिकारियों की मिली भगत के चलते लालच की भेट चढ़ चुके हैं।

यह सब इसलिए अधिक हो रहा है क्योंकि जिस बकरी को शेर का भोजन बताया जाता है उसे मनुष्य खा रहा है। यही नहीं मनुष्य की जीभ का स्वाद बनने से शायद ही कोई जीव-जन्तु बचा हो। ऐसे में जैव-विविधता को बचाने की आखिर कल्पना कैसे की जा सकती है? समाज द्वारा प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते हुएं एक घोर पाप यह किया जा रहा है कि गाय से उसके बगैर बियाहे ही दूध निकालने की व्यवस्था की जा रही है। ऐसा पशुओं के चिकित्सकों द्वारा अपनी कथित पढ़ाई व कुछ दवाईयों के दम पर किया जा रहा है।

अगर यह सिलसिला इसी प्रकार चलता रहा तो वर्तमान में चरमरा चुका जैव-विविधता चक्र भविष्य में पूरी तरह से टूट जाएगा। जैव-विविधता को बनाए रखना इसलिए आवश्यक है क्योंकि हम किसी एक चीज पर निर्भर नहीं रह सकते। हमारे चारों ओर के वातावरण में जो मौजूद विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु व पेड़-पौधे उतने ही आवश्यक हैं जितना कि हमारा दोनों समय भोजन करना और पानी पीना। लेकिन शायद हम भूल बैठे हैं कि जिन तत्वों पर हमारा जीवन टिका है, जब वे ही नहीं होंगे तो जीवन भी नहीं होगा।

(लेखक नैचुरल एन्वायरन्मेंटल एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक हैं)

 

 

 

क्यों नाकाम हुई मोदी सरकार की TOP स्कीम?

चौधरी पुष्पेंद्र सिंह

कई शहरों में प्याज की खुदरा कीमतें अब भी 120 रुपये प्रति किलोग्राम के ऊपर चल रही हैं। सरकार ने प्याज की जमाखोरी पर अंकुश लगाने के लिए व्यापारियों पर छापेमारी के अलावा, थोक व्यापारियों की भंडारण सीमा (स्टॉक लिमिट) 500 से घटाकर 250 क्विंटल और खुदरा विक्रेताओं की सीमा 100 से घटाकर 20 क्विंटल कर दी है। पिछले दिनों केंद्रीय खाद्य मंत्री ने प्याज की बढ़ी कीमतों को काबू करने में विवशता भी जाहिर की थी।

केंद्रीय कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में प्याज उत्पादक राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ इस विषय पर चर्चा कर निर्णय लिए जा रहे हैं। केंद्र सरकार ने कीमतों को काबू करने के लिए 1.2 लाख टन प्याज आयात करने का निर्णय लिया है। इसमें से मिस्र, तुर्की आदि देशों से लगभग 50 हजार टन प्याज आयात के सौदे किए जा चुके हैं। यह प्याज धीरे-धीरे देश में आ रही है, परन्तु देश की लगभग 60 हजार टन प्रति दिन की मांग के सापेक्ष यह बहुत कम है। प्याज की कम आवक, जरूरत से कम आयात और इसमें देरी के कारण प्याज के दाम बेकाबू हैं। इस विषय में कृषि मंत्री ने भी संसद को बताया कि देश में खरीफ की प्याज का उत्पादन आशा से लगभग 16 लाख टन कम रहा हैं।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष नवंबर में खुदरा महंगाई दर 5.54 प्रतिशत पर पहुंच गई जो पिछले 40 महीनों का सबसे उच्चतम स्तर है। इसका मूल कारण खाद्य पदार्थों विशेषकर सब्ज़ियों की महंगाई दर बढ़ना बताया गया है। इसी साल कुछ माह पहले इन सब्जियों को किसान कम कीमत मिलने के कारण सड़कों पर फेंकने की लिए मजबूर हुए थे।

प्याज उत्पादक राज्यों में विलंब से आये मानसून और फिर अत्यधिक बारिश के कारण देश में खरीफ की प्याज का रकबा भी पिछले साल के लगभग तीन लाख हेक्टेयर के मुकाबले इस साल लगभग 2.60 लाख हेक्टेयर रह गया। खरीफ की प्याज का उत्पादन भी पिछले साल के 70 लाख टन के मुकाबले 53 लाख टन रहने का अनुमान है। देश में सबसे ज्यादा, लगभग एक-तिहाई प्याज का उत्पादन करने वाले राज्य महाराष्ट्र में नवंबर में प्याज की आवक पिछले साल के 41 लाख टन के मुकाबले घटकर 24 लाख टन रह गई। इस कारण अब प्याज की कीमतें नई फसल आने पर जनवरी में ही कुछ कम हो पाएंगी।

तमाम कोशिशों के बावजूद आखिर सरकार सब्जियों की कीमतों को नियंत्रित रखने और उपभोक्ताओं के साथ-साथ किसानों के हितों की रक्षा करने में बार-बार नाकाम क्यों होती है? 2018-19 में देश में 18.6 करोड़ टन सब्जी उत्पादन हुआ है। 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के मोदी सरकार के लक्ष्य में बागवानी फसलों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इन फसलों को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने अपने बजट में भी कई योजनाएं शुरू की हैं। सब्जियों में मात्रा के लिहाज से आधा उत्पादन आलू, प्याज और टमाटर का ही होता है और ये सबसे ज़्यादा उपयोग की जाने वाली सब्ज़ियाँ हैं। सब्ज़ियों में आलू सबसे बड़ी फसल है, जिसका 2108-19 में 530 लाख टन उत्पादन हुआ। इसी तरह प्याज का उत्पादन इस वर्ष 235 लाख टन और टमाटर का उत्पादन 194 लाख टन रहा।

इन तीनों फसलों का ही देश की घरेलू मांग से ज्यादा उत्पादन हो रहा है और हम इन फसलों के निर्यात की स्थिति में हैं। गत वर्ष प्याज का 22 लाख टन निर्यात कर हम विश्व के सबसे बड़े प्याज निर्यातक थे। तो ऐसा क्या हुआ कि अब उसी प्याज को देश मंहगे दामों पर आयात करने के लिए मजबूर है। आलू, प्याज और टमाटर की कीमतों के स्थिरकरण हेतु सरकार ने पिछले साल 500 करोड़ रुपये की ऑपरेशन ग्रीन्स टॉप’ (टोमैटो, अनियन, पोटैटो) योजना भी शुरू की थी। इसका मूल उद्देश्य एक तरफ उपभोक्ताओं को इन सब्जियों की उचित मूल्य पर साल भर आपूर्ति सुनिश्चित करना और दूसरी तरफ किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाना था।

जाहिर है कि सरकार को इसके लिए और कदम भी उठाने होंगे। सबसे पहले तो हमें इन फसलों के उचित मात्रा में खरीद, भंडारण एवं वितरण हेतु शीतगृहों तथा अन्य आधारभूत आधुनिक संरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) का इंतज़ाम करना होगा। हमारे देश में लगभग 8 हजार शीतगृह हैं, परंतु इनमें से 90 प्रतिशत में आलू का ही भंडारण किया जाता है। यही कारण है कि आलू की कीमतों में कभी भी अप्रत्याशित उछाल नहीं आता।

टमाटर का लंबे समय तक भंडारण संभव नहीं है परन्तु अच्छी मात्रा में प्रसंस्करण अवश्य हो सकता है। प्याज के भंडारण को भी बड़े पैमाने पर बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के हितों को संरक्षित किया जा सके। जब फसल आती है उस वक्त सरकार इन सब्जियों को खरीद कर एक बफर स्टॉक भी तैयार कर सकती है ताकि बाज़ार में इनकी आपूर्ति पूरे साल उचित मूल्यों पर बनाई रखी जा सके और किसान स्तर पर कीमतें अचानक ना गिरें।

केंद्र सरकार ने इस साल प्याज का 57 हजार टन का बफर स्टॉक तो बनाया था परन्तु यह स्टॉक देश की केवल एक दिन की मांग के बराबर ही था। इसमें से भी आधे से ज्यादा प्याज खराब हो गई। हर साल प्याज की आसमान छूती कीमतों की समस्या से देश जूझता है, अतः मांग के सापेक्ष हमें प्याज का कम से कम 10 लाख टन का बफर बनाना होगा।

दूसरा, इन तीनों सब्ज़ियों का बड़े पैमाने पर प्रसंस्करण करने हेतु उद्योग स्थापित करने होंगे। अभी आलू की फसल का केवल 7 प्रतिशत, प्याज का 3 प्रतिशत और टमाटर का मात्र 1 प्रतिशत प्रसंस्करण हो पा रहा है। उपभोक्ताओं और किसानों दोनों के लिए इनके मूल्यों को स्थिर रखने, ऑफ-सीजन में उपलब्धता सुनिश्चित करने और निर्यात बढ़ाने के लिए इन फसलों का कम से कम 20 प्रतिशत प्रसंस्करण करने का लक्ष्य होना चाहिए। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को प्रोत्साहित करने के लिए इनके उत्पादों पर जीएसटी का शुल्क भी कम लगना चाहिए।

तीसरा, घरेलू मांग से ज्यादा उत्पादन की सूरत में हमें एक भरोसेमंद निर्यातक देश के रूप में भी अपने आप को स्थापित करना होगा। अभी इन फसलों का लगभग 5500 करोड़ रुपये मूल्य का ही निर्यात हो पा रहा है, जिसे तीन-चार गुना बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके लिए उपरोक्त भंडारण और प्रसंस्करण संबंधी दोनों कदम काफी कारगर होंगे। बार-बार न्यूनतम निर्यात मूल्य या स्टॉक लिमिट लगाने से भी व्यापारी भंडारण, प्रसंस्करण और निर्यात की व्यवस्था में निवेश करने से पीछे हट जाते हैं। अतः इन विषयों में स्थिर सरकारी नीतियों तथा आवश्यक वस्तु अधिनियम जैसे कानूनों में सुधार करने की आवश्यकता है।

नाबार्ड के एक अध्ययन के अनुसार आलू, प्याज, टमाटर की फसलों में उपभोक्ता द्वारा चुकाए गए मूल्य का 25-30 प्रतिशत ही किसानों तक पहुंच पाता है। अतः हमें इन फसलों में अमूल मॉडल’ को लागू करना होगा, जहां दूध के उपभोक्ता-मूल्य का 75-80 प्रतिशत किसानों को मिलता है। कृषि उत्पाद बाज़ार समिति अधिनियम में सुधार कर बिचौलियों की भूमिका को भी सीमित करना होगा। ऐसी संस्थाएं स्थापित करनी होंगी जो किसानों से सीधे खरीदकर उपभोक्ताओं तक इन सब्जियों को बिचौलियों के हस्तक्षेप के बिना पहुंचाने का काम करें।

इन फसलों की खेती में लगे करोड़ों किसानों की मांग है कि इन तीनों फसलों को एमएसपी व्यवस्था के अंतर्गत लाकर इनकी उचित खरीद, भंडारण और प्रसंस्करण की व्यवस्था सरकार करे। जिससे एक तरफ इन फसलों को फेंकने की नौबत ना आये तो दूसरी तरफ आम आदमी की जेब भी ना कटे।

(लेखक कृषि मामलों के जानकार और किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं)

गुजरात-राजस्थान में टिड्डियों का आतंक, कीट नियंत्रण जुगाड़ भरोसे

देश के दो बड़े राज्यों में टिड्डी दलों ने आतंक मचा रखा है। पाकिस्तान से आए टिड्डी दल गुजरात और राजस्थान में किसानों की हजारों करोड़ रुपये की फसल तबाह कर चुकी हैं। दोनों राज्यों में किसान सरकार से कीट नियंत्रण की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन कीट नियंत्रण के उपाय जुगाड़ भरोसे हैं। मामले के तूल पकड़ने के बाद गुरुवार को केंद्र सरकार ने टिड्डी नियंत्रण के लिए 11 टीमें गुजरात भेजी हैं। उधर, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने टिड्डी नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार से मदद मांगी है।

किसानों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए प्रशासन भी टिड्डयों से बचाव के तरह-तरह के उपाय आजमा रहा है। खबर है कि गुजरात के बनासकांठा जिले में टिड्डियां भगाने की जिम्मेदारी शिक्षकों को दी गई है।

गुजरात और राजस्थान में पिछले कई महीनों से टिड्डी दलों के हमले जारी है, लेकिन कीट नियंत्रण के सारे प्रयास महज कागजी खानापूर्ति तक सीमित हैं। उत्तरी अफ्रीका से निकलकर सऊदी अरब और पाकिस्तान होते हुए गुजरात और राजस्थान में घुसे टिड्डी दल गुजरात के कच्छ, मेहसाणा, पाटण, और बनासकांठा तक पहुंच चुके हैं। टिड्डियों के आक्रमण की वजह से कपास, गेहूं, सरसों, जीरा समेत कई फसलों को नुकसान हुआ है।

हैरानी की बात है कि गुजरात और राजस्थान में हर साल टिड्डयों हमले में बड़े पैमाने पर फसलों को नुकसान पहुंचता है, इसके बावजूद इससे बचाव का कोई पुख्ता उपाय न तो राज्य सरकारों के पास है और ना ही केंद्र सरकार इसमें कोई खास दिलचस्पी ले रही है। मजबूरी में किसान टिड्डियों को भगाने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं। थाली, ढोल और डीजे बजाकर टिड्डीयों को भगाने की कोशिश की जा रही है।

गहलोत में मांगी केंद्र से मदद

टिड्डी दलों के बढ़ते हमले के बीच राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार से मदद मांगी है। उनका कहना है कि टिड्डी नियंत्रण का विषय मुख्यतः भारत सरकार के अधीन है। ऐसे में केन्द्र सरकार इस पर प्रभावी नियंत्रण के लिए राज्य सरकार को अतिरिक्त संसाधन एवं सहयोग उपलब्ध कराए। राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर, नागौर, चुरू, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और जालौर जिलों में  टिड्डी दलों का प्रकोप है।

केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय के फसल सुरक्षा और टिड्डी चेतावनी से जुड़े कई कार्यालय राजस्थान में होने के बावजूद सब मूकदर्शक बने हुए हैं।

 

प्याज, लहसुन के बाद क्यों बढ़ने लगे खाद्य तेलों के दाम

इस साल तिलहन की कम बुवाई और भारी बारिश से फसलों को नुकसान के चलते देश में सोयाबीन का उत्पादन 18-20 फीसदी गिरने की आशंका है। सरसों और मूंगफली की बुवाई भी पिछले साल से कम है। यही वजह है कि इस साल आयातित खाद्य तेलों पर देश की निर्भरता बढ़ गई है और महंगे आयात की वजह से खाद्य तेलों के दाम बढ़ रहे हैं। चालू सीजन में सोयाबीन का आयात बढ़कर तीन लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले फसल सीजन में 1.80 लाख टन का आयात हुआ था।

अभी तक रबी तिलहन की बुआई 71.79 लाख हेक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 73.08 लाख हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन आफ इंडिया (सोपा) के अनुसार चालू फसल सीजन में सोयाबीन का उत्पादन घटकर 89.84 लाख टन रहने का अनुमान है जो पिछले साल 109.33 लाख टन था। उत्पादन में कमी और आयात महंगा होने की वजह से खाद्य तेलों के दाम आने वाले दिनों में और बढ़ सकते हैं।

देश में घरेलू खपत के मुकाबले तिलहन का उत्पादन कम होता है, जिसकी भरपाई के लिए इंडोनेशिया, मलेशिया और दक्षिण अमेरिकी देशों से खाद्य तेलों खासकर पाम ऑयल का आयात किया जाता है। भारत दुनिया में खाद्य तेलों का सबसे बड़ा इंपोर्टर है। सरकार तिलहन फसलों को बढ़ावा और उचित दाम दे तो खाद्य तेलों के आयात पर खर्च होने वाले हजारों करोड़ रुपये किसानों की जेब में जा सकते हैं।

 

कैसे ‘शून्य’ हुए किसानों की खुदकुशी के आंकड़े

किसानों की आमदनी दोगुनी करने का दावा करने वाले केंद्र सरकार ने किसानों की खुदकुशी के आंकड़े छापने बंद कर दिए हैं। जबकि रोजाना किसी ना किसी राज्य से किसान आत्महत्या की खबर आ ही जाती है। हैरानी की बात है कि सरकार के पास 2016 के बाद देश में किसानों की खुदकुशी का आंकड़ा नहीं है। इस पर लोकसभा में उठे सवाल के जवाब में सरकार ने जो वजह बताई है, वह भी कम आश्चर्यजनक नहीं है।

मंगलवार को लोकसभा में किसानों की खुदकुशी पर राहुल गांधी के सवालों का जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी ने बताया कि कई राज्यों ने किसानों/खेतीहरों की खुदकुशी के ‘शून्य’ आंकडे सूचित किए हैं। यानी राज्य सरकारों की मानें तो किसानों की खुदकुशी बंद हो गई है।

राहुल गांधी ने सरकार से पिछले चार वर्षों में किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े मांगते हुए 2015 एनसीआरबी की आकस्मिक मृत्यु एवं आत्महत्या रिपोर्ट (एडीएसआई) प्रकाशित नहीं किए जाने का कारण पूछा था।

इसके लिखित जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी ने बताया कि एनसीआरबी ने राज्यों से आंकड़ों की पुष्टि होने के बाद 2016 तक की रिपोर्ट प्रकाशित की है। वर्ष 2015 और 2016 में किसानों की आत्महत्या के जो आंकड़े सरकार ने पेश किए हैं, उनमें 15 राज्यों के आंकड़े जीरो हैं।

हैरानी की बात है कि राज्य सरकारें किसानों की खुदकुशी का आंकड़ा जीरो बता रही हैं तो केंद्र सरकार ने भी से इन आंकड़ों को जुटाना जरूरी नहीं समझा। देश में कृषि संकट और किसानों की स्थिति के बारे में पुख्ता आंकड़े जुटाए बगैर ही बड़ी-बड़ी योजनाएं चलाई जा रही हैं।

राहुल गांधी ने किसानों की आत्महत्या संबंधी आंकड़ों का प्रकाशन फिर से शुरू करने की मांग करते हुए सरकारी आंकड़ों के बगैर नीति-निर्माण पर भी सवाल उठाया है।

 

आवारा पशुओं से फसलों की तबाही का सरकार को अनुमान ही नहीं

आवारा पशुओं और जंगली जानवरों से खेती को हो रहे नुकसान का केंद्र सरकार के पास कोई आंकड़ा ही नहीं है। यह बात लोकसभा में सवाल-जवाब के दौरान सामने आई।

बिहार के नालंदा से जदयू के सांसद कौशलेंद्र कुमार के सवाल के जवाब में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि आवारा और जंगली जानवर कई राज्यों में फसलों को नुकसान पहुंचते हैं, लेकिन कृषि एवं किसान कल्याण विभाग इस नुकसान का कोई आकलन या अध्ययन नहीं कराता है। इस तरह के नुकसान का इंतजाम संबंधित राज्य सरकारें करती हैं। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की संशोधित गाइडलाइन में राज्यों को छूट दी गई है कि वे जंगली जानवरों से फसलों को नुकसान को बीमा योजना के दायरे में ला सकते हैं।

ताज्जुब की बात है कि जो सरकार खेतों में पराली जलाने के मामलों की सेटेलाइट से निगरानी कर किसानों को जेल भेज सकती है, उसके पास किसानों के नुकसान की पुख्ता जानकारी नहीं है। खेती को आवारा जानवरों से बचाने की केंद्र सरकार की कोई योजना भी नहीं है।

फसलों को तबाह करते आवारा जानवर किसानों के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो रहे हैं। इनसे बचने के लिए किसानों को रात भर जगाकर खेतों की रखवाली करनी पड़ती है या फिर खेत के चारों तरह कंटीले तार लगाने पड़ते हैं, जिस पर 3-5 हजार रुपये प्रति बीघा का खर्च आता है।

देश भर के किसान संगठन आवारा पशुओं के आतंक से बचाने मांग जोरशोर से उठा रहे हैं, लेकिन सरकार आंख मूंदकर बैठी है। बेपरवाही का आलम यह है कि आवारा पशुओं से फसलों को नुकसान का सरकार ने आकलन करवाना भी जरूरी नहीं समझा है। जबकि पराली की आग का खेतवार ब्यौरा जुटाकर किसानों को जेल भेज दिया जाता है। ऐसे मामलों में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कई किसानों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हो चुके हैं, जिसे लेकर किसानों में काफी नाराजगी है।

क्या ‘धरती मां’ को जहर से बचा पाएगा नया कीटनाशक विधेयक

इस बार 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से धरती मां को रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के जहर से बचाने का आह्वान किया था। फिलहाल देश में कीटनाशकों से जुड़े नियम-कायदे 51 साल पुराने इंसेक्टीसाइड एक्ट, 1968 से तय होते हैं। वह हरित क्रांति का दौर था इसलिए पूरा जोर फसलों को बचाकर उत्पाद बढ़ाने पर रहा। क्योंकि करोड़ों लोगों का पेट भरना था।

अब पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर कीटनाशकों के दुष्परिणाम नजर आने लगे हैं। मगर नया कीटनाशक प्रबंधन विधेयक भी पर्यावरण और किसानों के बजाय बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों के ज्यादा अनुकूल दिख रहा है। इसका पूरा फोकस कीटनाशकों की गुणवत्ता, लाइसेंस, पंजीकरण जैसी प्रक्रियाओं पर है न कि कीटनाशकों के इस्तेमाल को कम करने और भोजन व पर्यावरण को इस जहर से बचाने पर।

11 साल से अटका मुद्दा 

कीटनाशक प्रबंधन विधेयक का मुद्दा संसद में साल 2008 से अटका हुआ है। मोदी सरकार भी 2017 से नया पेस्टीसाइड मैनेजमेंट बिल लाने की कोशिश कर रही है। लेकिन प्रावधानों पर सहमति नहीं बन पाई। भारत दुनिया में एग्रो-कैमिकल्स का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक है और देश में कीटनाशकों का बाजार करीब 20 हजार करोड़ रुपये का है। जाहिर है इतने बड़े कारोबार को प्रभावित करने वाला कोई भी कानून तमाम तरह के दबाव से होकर गुजरेगा। यही इसमें देरी की वजह है। अब उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही पेस्टीसाइड मैनेजमेंट बिल, 2019 संसद में पेश होगा।

नया मसौदा सार्वजनिक नहीं

कृषि, पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य और समूचे पेस्टीसाइड सेक्टर को प्रभावित करने वाले इस विधेयक का नया मसौदा अभी तक सार्वजनिक नहीं हुआ है। मतलब, जिस कानून से कीटनाशकों से जुड़े नियम-कायदों में पारदर्शिता बढ़ाने की उम्मीद की जा रही है, उसके बनने की प्रक्रिया में ही पारदर्शिता का अभाव है।

करीब दो साल पहले फरवरी, 2018 में कृषि मंत्रालय ने पेस्टीसाइड मैनेजमेंट बिल, 2017 का मसौदा जारी करते हुए इस पर सुझाव मांगे थे। विधेयक के उस मसौदे में तमाम खामियां थी, जिन पर बहुत से सवाल उठे थे।

अब कहना मुश्किल है कि लंबे विचार-विमर्श के बाद जो विधेयक संसद में पेश होने जा रहा है, उसमें कितना सुधार हुआ है और कितनी खामियां बाकी हैं। गत 27 नवंबर को कृषि मंत्रालय को लिखे एक पत्र में अलायंस फॉर सस्टेनेबल एंड हॉलिस्टिक एग्रीकल्चर (आशा) ने नए विधेयक को सार्वजनिक करने की मांग करते हुए 2017 के मसौदे पर फिर से कई सुझाव और आपत्तियां दर्ज कराई हैं। आशा की कविता कुरुघंटी ने असलीभारत.कॉम को बताया किया कि इस सत्र में पेस्टीसाइड मैनेजमेंट बिल, 2019 के पेश होने की खबरें आ रही हैं लेकिन मंत्रालय की वेबसाइट पर अभी तक 2017 का मसौदा उपलब्ध है, जिसमें भयंकर कमियां हैं।

विधेयक के मकसद पर सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि कीटनाशक प्रबंधन विधेयक पर्यावरण और किसानों की रक्षा के लिए है या बड़ी कंपनियों का हित साधने के लिए। आशा से जुड़े संगठनों की मांग है कि विधेयक का फोकस सिंथेटिक पेस्टीसाइड के दुष्प्रभावों से मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण को बचाने यानी बायो-सेफ्टी और कीटनाशकों का इस्तेमाल कम करने पर होना चाहिए। 2017 के विधेयक का मसौदा इस कसौटी पर कतई खरा नहीं उतरता है।

नया मसौदा पहले से व्यापक मगर कई खामियां    

कृषि मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, पेस्टीसाइड मैनेजमेंट बिल, 2019 का मसौदा तैयार हो चुका है। इस पर अनौपचारिक रूप से सलाह-मशविरा लिया जा रहा है। हालांकि, पुराने मसौदे की कई विसंगतियों नए ड्राफ्ट में भी मौजूद हैं।

कानून का दायर और परिभाषा

नए विधेयक की प्रस्तावना का विस्तार करते हुए इसमें कीटनाशकों के उत्पादन, आयात, निर्यात, पैकेजिंग, लेबलिंग, दाम, भंडारण, विज्ञापन, बिक्री, परिवहन, वितरण, प्रयोग और निपटान के नियमों के साथ-साथ मनुष्य और जीव-जंतुओं के प्रति जोखिम को कम करने और पारंपरिक ज्ञान पर आधारित जैविक कीटनाशकों को बढ़ावा देने के प्रयासों को शामिल किया गया है। यह परिभाषा पहले से ज्यादा व्यापक है। लेकिन इसमें पर्यावरण का जिक्र नहीं है।

किसान संगठनों ने कीटनाशकों की परिभाषा में फफूंदनाशी, खरपतवारनाशी आदि को शामिल करने की मांग करते हुए घरों और चिकित्सा में कीटनाशकों के इस्तेमाल को भी कानून के दायरे में लाने का सुझाव दिया है। मगर नए मसौदे में कीटनाशक, फफूंदीनाशक और खरपतवारनाशक आदि का भेद खत्म करते हुए सबको पेस्टीसाइड की परिभाषा में समेट लिया है।

भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोही का कहना है कि कीटनाशक विधेयक से जुड़े उनके अधिकांश सुझावों को सरकार ने मान लिया है और अब पेश होने जा रहा विधेयक काफी व्यापक और बेहतर है।

कीटनाशक निरीक्षण

मौजूदा कीटनाशक अधिनियम की तरह नए कानून को लागू कराने का बड़ा दारोमदार पेस्टीसाइड इंस्पेक्टरों पर रहेगा। 2017 के विधेयक के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना कीटनाशक इंस्पेक्टर कीटनाशक की बिक्री या वितरण पर रोक नहीं लगा सकता था। इसका काफी विरोध हुआ, जिसे देखते हुए नए मसौदे में कीटनाशक निरीक्षकों को बिक्री या वितरण पर 60 दिन से अधिक समय तक रोक लगाने का अधिकार दिया गया है। लेकिन उसे 48 घंटे के अंदर कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अनुमति लेनी होगी। कीटनाशक को जब्त करने पर भी निरीक्षकों को 14 दिन के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट को सूचित करना होगा।

कीटनाशक निरीक्षकों की शक्तियां में कुछ संशोधनों के बावजूद नया विधेयक कीटनाशकों के सुरक्षित इस्तेमाल के लिए जागरुकता बढ़ाने, कीटनाशकों के प्रयोग में कमी और पर्यावरण पर दुष्प्रभाव की निगरानी से बच रहा है। जबकि पेस्टीसाइड कंपनियां और डीलर किसान की मजबूरी का फायदा उठाकर कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग को बढ़ावा देते हैं। इसके लिए प्रचार और मार्केटिंग के हथकंडे अपनाते हैं। खेती की लागत और किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ाने में कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग का बड़ा हाथ है।

नया कीटनाशक विधेयक इस तरह के हथकंडों पर अंकुश लगाने के बजाय कीटनाशकों की गुणवत्ता, प्रभाव, पंजीकरण और लाइसेंस आदि की प्रक्रियाओं पर ज्यादा केंद्रित है। हालांकि, उचित दाम पर कीटनाशकों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के लिए केंद्र सरकार एक प्राधिकरण का गठन कर सकती है। मगर फिर भी डीलर या डिस्ट्रीब्यूटर के स्तर पर होने वाली गड़बड़ियों को रोकने में नया कानून कमजोर नजर आता है।

केंद्रीय कीटनाशी बोर्ड

देश में कीटनाशकों की गुणवत्ता, उत्पादन की पद्धति और निपटान के तरीकों के बारे में केंद्र व राज्य सरकारों को परामर्श देने के लिए नए विधेयक में केंद्रीय कीटनाशी बोर्ड की स्थापना का प्रावधान है। इसमें 5 राज्यों और 2 किसान प्रतिनिधि शामिल होंगे। किसान प्रतिनिधियों में एक महिला होगी। इतने बड़े और विविधता वाले देश के लिए सिर्फ दो किसान प्रतिनिधि पर्याप्त नहीं हैं। राज्य भी इसमें प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग कर सकते हैं।

कीटनाशकों का पंजीकरण और निषेध

कीटनाशकों के प्रभाव, आवश्यकता और जोखिम को ध्यान में रखकर उनका पंजीकरण किया जाएगा। इसके लिए एक पंजीकरण समिति का गठन होगा जो राष्ट्रीय कीटनाशक रजिस्टर तैयार करेगी। पंजीकृत कीटनाशकों की समय-समय पर समीक्षा की मांग को नए मझौदे में शामिल किया गया है। लेकिन विदेशों में प्रतिबंधित या अपंजीकृत कीटनाशकों के इस्तेमाल को रोकने का प्रत्यक्ष प्रावधान नए विधेयक में भी नहीं है।

नए विधेयक के अनुसार, केंद्र और राज्य सरकारें किसी कीटनाशक की सुरक्षा या प्रभाव की समीक्षा करवा सकती हैं या फिर उन पर एक साल के लिए रोक लगा सकती हैं। लेकिन कीटनाशकों के नियमन के मामले में यह विधेयक राज्य सरकारों को केंद्र से कमतर अधिकार देता है। जबकि किसी हादसे की स्थिति में पहली जवाबदेही राज्य सरकारों की ही बनती है।

2017 के मसौदे में निजी प्रयोगशालाओं को केंद्रीय कीटनाशी प्रयोगशाला के तौर पर काम करने की छूट देने के प्रावधान का काफी विरोध हुआ था। विधेयक के नए मसौदे में भी निजी प्रयोगशालाओं के लिए रास्ते खोले जा रहे हैं।

कीटनाशकों के दुष्प्रभाव

नए विधेयक के अनुसार, राज्य सरकार विषाक्तता के मामलों पर नजर रखेंंगी और केंद्र सरकार को तिमाही रिपोर्ट भेजेंगी। राज्य सरकारें ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए योजना भी बनाएंगी।

कृषि और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के जानकार श्रीधर राधाकृष्णन का कहना है कि कीटनाशक प्रबंधन विधेयक खुद पीएम मोदी की धरती मां को जहर मुक्त बनाने की मंशा के अनुरुप नहीं है। इसलिए बेहतर होगा कि व्यापक विचार-विमर्श कर नया विधेयक तैयार किया जाए जो मिट्टी, पर्यावरण और भोजन को जहर मुक्त बनाने की दिशा में ज्यादा कारगर हो।

अपराध और दंड

नए विधेयक में नियमों का उल्लंघन करने पर 25 हजार रुपये से 40 लाख रुपये तक जुर्माने या 3 साल तक की जेल या दोनों का प्रावधान है। कीटनाशकों के इस्तेमाल से किसी मृत्यु होने पर 10 लाख रुपये से 50 लाख रुपये तक जुर्माना या 5 साल की जेल अथवा दोनों हो सकते हैं। मौजूदा कानून में सिर्फ 500-75000 रुपये तक जुर्माने और 6 महीने से 2 साल तक जेल या दोनों का प्रावधान है।

हालांकि, किसी व्यक्ति द्वारा खुद के घरेलू इस्तेमाल या बगीचे या खेती में कीटनाशक के प्रयोग के लिए मुकदमा नहीं चलाया जाएगा। ऐसे लोग सजा भी के पात्र नहीं होंगे, जिन्होंने कीटनाशक का आयात या उत्पादन नहीं किया है। बशर्ते, उन्होंने वैध लाइसेंसधारक से कीटनाशक खरीदा हो। कीटनाशक का भंडारण सही तरीके से किया गया हो और उसे कीटनाशक के नकली या अमानक होने की जानकारी न हो।

मुआवजा कंज्यूमर कोर्ट भरोसे

हाल के वर्षों में कीटनाशकों की वजह से सैकड़ों किसानों की मौत के बावजूद नए विधेयक में कीटनाशकों के प्रत्याशित परिणाम न देने या किसी प्रकार की क्षति होने पर प्रभावित किसान या व्यक्ति उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत ही मुआवजे का दावा कर सकेंगे। यह इस कानून की सबसे कमजोर कड़ी है। बस ऐसे मामलों की शिकायत की व्यवस्था की गई है। लेकिन मुआवजा कंज्यूमर कोर्ट से ही मिलेगा। केंद्र सरकार एक निधि की व्यवस्था जरूर करेगी जिसका प्रयोग विषाक्तता की घटनाओं से प्रभावित लोगों को अनुग्रह अनुदान देने के लिए किया जाएगा।

अगर केंद्र सरकार वाकई धरती मां को कीटनाशकों के जहर से बचाना चाहती है तो वास्तव में ऐसे कानून की जरूरत है जो न सिर्फ कीटनाशकों की गुणवत्ता सुनिश्चित करे बल्कि पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर इनके दुष्प्रभावों को कम करने के साथ-साथ किसी प्रकार की क्षति की जवाबदेही भी तय करे। फिलहाल कीटनाशक विधेयक का जो मसौदा सामने है या नए मसौदे की जितनी जानकारी उपलब्ध है, उस हिसाब से नया कानून धरती मां को शायद ही जहरमुक्त बनाने में मददगार साबित हो सके।

 

 

प्याज 165 रुपये किलो! ममता नाराज, “केंद्र ने भेजा सड़ा प्याज”

प्याज की बढ़ती कीमतों के बीच इसे लेकर केंद्र और राज्यों के बीच तकरार तेज हो गई है। शुक्रवार को देश में प्याज का अधिकतम खुदरा दाम 165 रुपये किलो तक पहुंच गया। केंद्र सरकार प्याज का आयात कर दाम काबू में लाने की कोशिशों में जुटी है। लेकिन इन कोशिशों का असर दिखने में  एक से डेढ़ महीने का समय लग सकता है।

देश के ज्यादातर महानगरों में प्याज के दाम 100 रुपये किलो से ऊपर हैं। यहां तक कि महाराष्ट्र के नासिक के खुदरा बाजार में भी प्याज 75 रुपये किलो बिक रहा है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के अनुसार, शुक्रवार को देश में प्याज का सर्वाधिक खुदरा भाव गोवा के पणजी में 165 रुपये किलो रहा। दिल्ली से सटे गुडगांव में प्याज 120 रुपये किलो बिक रहा है तो ओडिशा के कटक व भुवनेश्वर में प्याज का खुदरा भाव 130 रुपये किलो तक पहुंच गया है। राजधानी दिल्ली में प्याज की कीमतें 100 रुपये किलो के आसपास हैं।

केंद्र पर निकला ममता बनर्जी का गुस्सा

कोलकाता में प्याज का दाम 140 रुपये किलो पहुंच चुका है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसके लिए केंद्र सरकार पर जमकर निशाना साधा। ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने बंगाल को 200 टन के बजाय सिर्फ 20 टन प्याज भेजा, जिसमें से 10 टन प्याज सड़ा हुआ था। इस मुद्दे पर उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को सड़कों पर उतरने को कहा है। इससे पहले दिल्ली की केजरीवाल सरकार भी प्याज आपूर्ति के मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेर चुकी है।

बारिश ने बिगाड़ा खेल

इस साल मानसून में देरी और फिर कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान में ज्यादा बारिश की वजह से प्याज का उत्पादन 26 फीसदी कम है। इस बार बुवाई भी पिछले साल से कम रकबे में हुई थी, जिसके कारण उत्पादन घटा।

इस संकट को दूर करने के लिए केंद्र सरकार प्याज का आयात करवा रही है। राज्य सभा को दी जानकारी में सरकार ने बताया कि विदेशी प्याज 20 जनवरी तक पहुंचना शुरू होगा। यानी प्याज की कीमतें कम होने में समय लगेगा। इस साल केंद्र सरकार ने 1.2 लाख टन प्याज के आयात की मंजूरी दी है। आयात की प्रक्रिया में कई तरह की रियायतें दी गई हैं।

मिस्र और तुर्की की प्याज का इंतजार

गुरुवार को खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री राम विलास पासवान ने ट्वीट किया था कि प्याज की उपलब्धता बढ़ाने के लिए 6090 टन प्याज मिस्र और 11000 टन प्याज तुर्की से मंगाया है जो 15 दिसंबर से 15 जनवरी के बीच उपलब्ध हो जाएगा। तुर्की से और 4000 टन प्याज जनवरी के मध्य तक बाजार में आ जाएगा।