मंगलवार, 07 फ़रवरी 2023
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अगर टीवी न्यूज एंकर, हेट स्पीच के प्रचार का हिस्सा बनते हैं, तो उन्हें ऑफ एयर क्यों नहीं किया जाता: सुप्रीम कोर्ट



देश भर में हेट स्पीच की घटनाओं पर अंकुश लगाने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे जस्टिस केएम जोसेफ और बीवी नागरत्ना की एक पीठ ने कहा, "हेट स्पीच एक खतरा बन गया है. इसे रोकना होगा."

सुप्रीन कोर्ट ने हेट स्पीच यानी फरत फैलाने वाले भाषण को लेकर टिप्पणी करते हुए इसे एक खतरा बताया है. सुप्रीम कोर्ट ने टीवी समाचार चैनलों पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों पर कहा कि वह ‘भारत में स्वतंत्र और संतुलित प्रेस’ चाहता है.

शीर्ष अदालत ने कहा कि आजकल सब कुछ टीआरपी (टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट) से संचालित होता है और चैनल एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं और समाज में विभाजन पैदा कर रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा अगर टीवी न्यूज एंकर, नफरत फैलाने वाले भाषण के प्रचार का हिस्सा बनते हैं, तो उन्हें ऑफ एयर क्यों नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने आगे कहा कि प्रिंट मीडिया के विपरीत, समाचार चैनलों के लिए कोई प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया नहीं है, और कहा कि हम फ्री स्पीच चाहते हैं, लेकिन किस कीमत पर.

देश भर में हेट स्पीच की घटनाओं पर अंकुश लगाने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही जस्टिस केएम जोसेफ और बीवी नागरत्ना की एक पीठ ने कहा, “हेट स्पीच एक खतरा बन गया है. इसे रोकना होगा.”

कोर्ट ने मीडिया ट्रायल पर चिंता जताते हुए कहा कि टीवी चैनल एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं क्योंकि समाचार कवरेज टीआरपी से संचालित होता है. उन्होंने कहा, “वे हर चीज को सनसनीखेज बनाते हैं और समाज में विभाजन पैदा करते हैं. अखबार के विपरीत, दृश्य माध्यम आपको बहुत अधिक प्रभावित कर सकता है और दुर्भाग्य से दर्शक इस तरह की सामग्री को देखने के लिए पर्याप्त परिपक्व नहीं हैं.”

उन्होंने कहा कि लाइव डिबेट के दौरान कई बार एंकर समस्या का हिस्सा बन जाते हैं क्योंकि वे या तो पैनल में बैठे व्यक्ति की आवाज को म्यूट कर देते हैं या उन्हें काउंटर व्यू पेश करने की अनुमति नहीं देते हैं. न्यायमूर्ति नागरत्न ने कहा कि अगर टीवी चैनल हेट स्पीच के प्रचार में शामिल होकर कार्यक्रम संहिता का उल्लंघन करते पाए जाते हैं, तो उनके प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है. उन्होंने कहा, “हम भारत में स्वतंत्र और संतुलित प्रेस चाहते हैं.”

वहीं न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने दावा किया कि पिछले एक साल में हजारों शिकायतें मिली हैं और चैनलों के खिलाफ कार्रवाई की गई है.

“एक लाइव कार्यक्रम में, कार्यक्रम की निष्पक्षता की कुंजी एंकर के पास होती है। यदि एंकर निष्पक्ष नहीं है, तो वह स्पीकर को म्यूट करके या दूसरी तरफ से सवाल न पूछकर काउंटर व्यू नहीं आने देगा. यह पक्षपात का प्रतीक है. मीडिया के लोगों को यह सीखना चाहिए कि वे बड़ी ताकत के पदों पर काबिज हैं और समाज पर उनका प्रभाव है. वे समस्या का हिस्सा नहीं हो सकते हैं और जिस तरह से वे चाहते हैं अपने मन की बात कह सकते हैं.”

जस्टिस जोसेफ ने कहा कि अगर न्यूज एंकर या उनके प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की जाती है, तो सभी लाइन में आ जाएंगे. अदालत ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज से कहा कि भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक बहुत ही महत्वपूर्ण और नाजुक चीज है और सरकार को वास्तव में इसमें हस्तक्षेप किए बिना कुछ कार्रवाई करनी होगी.

वहीं इसके जवाब में जनरल केएम नटराज ने कहा कि केंद्र इस समस्या से अवगत है और नफरत भरे भाषणों की समस्या से निपटने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) में संशोधन लाने पर विचार कर रहा है.

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, “टीवी अब दशकों से भारत में है लेकिन अभी भी इसका कोई नियम नहीं है और यह सभी के लिए स्वतंत्र हो गया है. आपके पास समाचार पत्रों जैसे चैनलों के लिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया जैसा कुछ नहीं है.”

उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने वाली अतिरिक्त महाधिवक्ता गरिमा प्रसाद ने कहा कि 500 से अधिक ऐसे मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें 160 स्वत: संज्ञान मामले शामिल हैं, जहां कार्रवाई की गई है और लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

पिछले साल 21 अक्टूबर को, शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली को नफरत फैलाने वाले भाषण देने वालों पर कड़ी कार्रवाई करने के लिए कहा था, “हम धर्म के नाम पर कहां पहुंच गए हैं, हमने धर्म को क्या कम कर दिया है, यह दुखद है”

यह मानते हुए कि भारत का संविधान एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की परिकल्पना करता है, अदालत ने तीनों राज्यों को निर्देश दिया था कि शिकायत दर्ज किए जाने की प्रतीक्षा किए बिना अपराधियों के खिलाफ तुरंत आपराधिक मामले दर्ज किए जाएं.

शीर्ष अदालत ने चेतावनी दी कि प्रशासन की ओर से इस “बेहद गंभीर मुद्दे” पर कार्रवाई करने में किसी भी तरह की देरी अदालत की अवमानना को आमंत्रित करेगी.