प्रधानमंत्री जी, कुपोषण की समस्या भजन से नहीं भोजन से दूर होती है!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम के 92वें संस्करण में ‘मेरा बच्चा’ अभियान के संदर्भ में बात करते समय एक नई बहस को जन्म दे दिया है. कार्यक्रम के दौरान मध्य प्रदेश में सामुदायिक गतिविधि में बाल भोज के द्वारा कुपोषण में कमी की घटना पर बोलते हुए उन्होंने श्रोताओं से पूछा कि ‘क्या उन्हें पता है कि भजन, गीत और संगीत के माध्यम से कुपोषण कम किया जा सकता है?’

इस दौरान प्रधानमंत्री ने बहुत ही चतुराई से सुलभ रूप से उपलब्ध गुणात्मक खाद्य सामग्री की जगह भजन, गीत और संगीत के पहलू को ज्यादा ही महत्व दिया जो तार्किक और सैद्धांतिक रूप से कुपोषण की समस्या को सुलझाने की तकनीकी और वैज्ञानिक रणनीतियों की महत्ता को प्रत्यक्ष रूप से नकार देता है.

सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि बहुत से अंतरराष्ट्रीय विद्वानों ने कई मौकों पर प्रधानमंत्री मोदी के अवैज्ञानिक और तर्कहीन दावों के लिए अक्सर उनकी आलोचना की है. कोविड महामारी के दौरान ताली, थाली और दिवाली से शुरू होकर प्रधानमंत्री अब संगीत और भजन के प्रति अधिक आस्थावान दिखते हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से देश में बच्चों की पोषण स्थिति में सुधार के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों के महत्व को नकारने के समान है.

हालांकि, हर सांस्कृतिक और पारंपरिक सामुदायिक प्रथा में विश्वास करना हानिकारक नहीं है, लेकिन समस्या के निदान हेतु वैज्ञानिक महत्व और उनकी तकनीकी रणनीतियों को अनदेखा करना कालांतर में केवल स्थिति को खराब कर सकता है.

अपने बहुचर्चित एकालाप (मन की बात) कार्यक्रम में बोलते हुए प्रधानमंत्री जी ने जिस कहानी का उल्लेख किया उससे साफ पता चलता है कि कैसे समुदाय के सदस्यों ने बालभोज के दौरान घर में उपलब्ध अनाज का इस्तेमाल किया, जिससे कुपोषण के बोझ को कम करने में मदद मिली, लेकिन प्रधानमंत्री ने स्वदेशी भोजन संस्कृति की महत्वपूर्ण भूमिका के बजाय भजन और संगीत पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की.

भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में मुख्यतया तीन प्रकार के कुपोषण पाए जाते है. हाल ही में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) और व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण ने भारत के बच्चों, किशोरों और महिलाओं में कुपोषण से संबंधित आंकड़े जारी किए हैं. एनएफएचएस-5 के नतीजे बताते हैं कि किस तरह बीते पांच सालों में बच्चों में स्टंटिंग, वेस्टिंग और कम वजन की स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बने हुए है.

पांच वर्षों के आंकड़े बताते है कि कुपोषण में केवल मामूली गिरावट दर्ज की गई है जो अन्य देशों की तुलना में बहुत कम है. वर्तमान में, देश में 35% से अधिक बच्चे नाटेपन, 19.3% दुबलेपन, और 32.5% कम वजन की समस्या से ग्रसित हैं, जो दुनिया की कई अविकसित अर्थव्यवस्थाओं की दर से भी अधिक है.

विश्व खाद्य और कृषि संगठन और विश्व बैंक द्वारा प्रकाशित आंकड़ों से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने के बाद से अगर संयुक्त रूप से कुपोषण के आंकड़ों कमी होने के बजाय वृद्धि हुई है, जहां कुल कुपोषित आबादी का प्रतिशत 14.9 से बढ़कर 15.5% हो गया है.

अनुमानों के अनुसार, भारत में 2019 में दुनिया की एक-चौथाई से अधिक कुपोषित आबादी थी. हालांकि, 2014 से 2016 तक अल्पपोषण की दर में मामूली गिरावट गिरावट आई थी, लेकिन उसके बाद कुपोषण दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो खतरनाक है.

बच्चों में दीर्घकालिक कुपोषण पैदा करने में कई कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. सामाजिक, आर्थिक और गरीबी के अलावा मां की पोषण स्थिति, माता-पिता की शिक्षा का स्तर, स्तनपान की अवधि, गर्भधारण के बीच का अंतराल, कम उम्र में विवाह और खराब स्वच्छता प्रमुख कारकों में है. महिलाओं की लगभग 36% आबादी सामान्य से कम वजन की है और भारत में 15 से 19 वर्ष की आयु के बीच 56% महिलाएं और 56% किशोर लड़कियां आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया से पीड़ित हैं.

भारत में कुपोषण का दर बहुत अधिक है और पांच साल से कम उम्र के बच्चों में होने वाली मौतों में से लगभग आधी मौतें खराब पोषण से जुड़ी हैं. प्रारंभिक जीवन में कुपोषण का बच्चों के स्वास्थ्य, शारीरिक और संज्ञानात्मक विकास, सीखने की क्षमता पर लंबे समय तक प्रभाव पड़ता है. 0-5 से वर्ष के बच्चों में बाल कुपोषण का विश्लेषण दर्शाता है कि देश में स्वास्थ्य और पोषण पर बनाई गई नीतियां और कार्यक्रम इस समस्या को कम करने में पूर्णतया सक्षम नहीं हैं.

भारत में एकीकृत बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) ही एकमात्र ऐसा कार्यक्रम है जो पोषण कार्यक्रमों को लागू करने के लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदार है. इसमें मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य और पोषण में सुधार के लिए छह आवश्यक सेवाएं शामिल हैं. आईसीडीएस का प्राथमिक उद्देश्य पूरक पोषण कार्यक्रम के माध्यम से औसत दैनिक सेवन और जो आहार भत्ता तय किया गया है, उसके बीच के अंतर को कम करने के लिए पर्याप्त आहार सुनिश्चित करना है.

कुपोषण से निपटने के कार्यक्रमों के मिश्रित परिणाम सामने आए हैं. आईसीडीएस कार्यक्रम में मातृ एवं शिशु कुपोषण को दूर करने की उत्कृष्ट क्षमता है, लेकिन प्रमाण बताते हैं कि यह परियोजना लंबे समय में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में विफल रही है. अंततः अगर हम सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से कुपोषण के कारकों को समझने से पता चलता है कि यह समस्या बहुआयामी है और देश और समाज की सामाजिक व आर्थिक स्थिति इसके लिए मुख्यतया जिम्मेदार है.

कुपोषण की समस्या को हल करने के लिए संदर्भ आधारित हस्तक्षेप और साक्ष्य-आधारित नीतियों, सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों जैसे विविध भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करना, स्वच्छता में सुधार और सुरक्षित पेयजल इत्यादि को पूरा करने की आवश्यकता है. हालांकि, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश का शीर्ष नेतृत्व भजन और अवैज्ञानिक उपायों को बढ़ावा देने में व्यस्त हैं.

साभार – द वायर

पोषाहार की कम मात्रा और अनियमित वितरण के बीच कुपोषण से लड़ता यूपी

लखनऊ: “मैं चार महीने की गर्भवती हूं. मुझे आंगनवाड़ी से हर महीने राशन मिलना चाहिए, लेकिन प‍िछले दो महीने में स‍िर्फ एक बार राशन मिला है. इतने में क्‍या होगा?,” लखनऊ के हबीबपुर गांव की रहने वाली रोशनी रावत (27) कहती हैं. रोशनी के दो बच्‍चे हैं, एक चार साल का और दूसरा एक साल का जो कि अतिकुपोषित है.

रोशनी को आंगनवाड़ी से हर महीने 1.5 किलो गेहूं दल‍िया, एक किलो चावल, एक किलो चना दाल और 500 मिलीलीटर खाद्य तेल मिलना चाहिए. हालांकि, रोशनी को अप्रैल के बाद जून में यह राशन मिल पाया, यानी दो महीने में एक बार. इसी तरह उनके एक साल के अतिकुपोष‍ित बच्‍चे को भी दो महीने में एक बार राशन मिला है.

बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग के मानक के अनुसार अतिकुपोषि‍त बच्‍चे को हर द‍िन 800 ग्राम कैलोरी और 20 से 25 ग्राम प्रोटीन मिलना चाहिए, लेक‍िन जब आंगनवाड़ी से अनुपूरक पुष्टाहार ही दो महीने में एक बार मिलेगा तो मानक कैसे पूरा होगा.

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, भारत में 6 से 23 महीने के 89% बच्‍चों को पर्याप्‍त आहार नहीं मिलता. इस मामले में सबसे खराब स्थिति उत्‍तर प्रदेश (यूपी) और गुजरात की है. यूपी और गुजरात में सिर्फ 5.9% बच्‍चों को पर्याप्‍त आहार मिलता है.

उत्‍तर प्रदेश में कुपोषण दूर करने के उद्देश्य से आंगनवाड़ी के तहत सूखा राशन द‍िया जाता है, ज‍िसे अनुपूरक पुष्‍टाहार कहते हैं. यह पुष्‍टाहार 6 महीने से 6 साल तक के बच्‍चों, गर्भवती और स्‍तनपान कराने वाली महिलाओं, कुपोषि‍त बच्‍चों और 11 से 14 साल की किशोरियों को द‍िया जाता है. हालांकि प्रदेश में यह योजना अन‍ियमितताओं की श‍िकार है. इंड‍ियास्‍पेंड ने अलग-अलग जि‍लों की आंगनवाड़ी कार्यकत्रियों से बात की तो जानकारी हुई कि लाभार्थियों की संख्या के मुकाबले राशन बहुत कम मात्रा में आता है और ऐसे में बहुत से लोग इससे वंचित रह जाते हैं.

डेटा इंट्री में लापरवाही का खामियाजा भुगत रहे लाभार्थी

यूपी में 1.89 लाख से ज्‍यादा आंगनवाड़ी केंद्र हैं. इंड‍ियास्‍पेंड के पास उपलब्‍ध बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग के आंकड़ों के मुताब‍िक, जुलाई 2021 में इन आंगनवाड़ी केंद्रों से करीब 1.59 करोड़ लाभार्थ‍ियों को सूखा राशन द‍िया जाता था. यह आंकड़ा हर कुछ महीने में कम-ज्‍यादा होता है. ऐसे में हर तीन महीने में नए लाभार्थी जोड़ने और अपात्रों को हटाने का काम किया जाता है और यहीं से द‍िक्‍कत शुरू होती है.

इस द‍िक्‍कत के बारे में यूपी के बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की निदेशक डॉ. सारिका मोहन इंड‍ियास्‍पेंड से कहती हैं, “राशन की कमी नहीं है. हर तीन माह पर हम अपनी जरूरत का आंकलन करते हैं और सप्‍लायर को लाभार्थ‍ियों का आंकड़ा भेजते हैं. यह देखने में आता है कि कई ज‍िला कार्यक्रम अध‍िकारी डेटा इंट्री पर ध्‍यान नहीं देते, इसल‍िए द‍िक्‍क्‍त आती है. हमने ऐसे ज‍िलों को ल‍िख‍ित में कहा है कि एमपीआर (मास‍िक प्रगति रिपोर्ट) को अपडेट रखना है, क्‍योंकि राशन उसी हिसाब से मिलेगा. बार बार कहने के बावजूद भी कुछ जिले ऐसे हैं जो पूरी डेटा इंट्री नहीं करते, वहीं द‍िक्‍कत होती है.”

आंगनवाड़ी केंद्र से बंटने वाला अनुपूरक पुष्‍टाहार। फोटो: रणव‍िजय स‍िंह
आंगनवाड़ी केंद्र से बंटने वाला अनुपूरक पुष्‍टाहार. फोटो: रणव‍िजय स‍िंह

डॉ. सारिका मोहन की बात से जाहिर है कि अनुपूरक पुष्‍टाहार (सूखा राशन) की सप्‍लाई और लाभार्थ‍ियों की संख्‍या में अंतर होता है, इसल‍िए बहुत से लाभार्थी इससे छूट जाते हैं. बाल व‍िकास एवं पुष्‍टाहार व‍िभाग की ओर से अलग-अलग वर्ग के हिसाब से राशन का व‍ितरण किया जाता है, ज‍िसका व‍िवरण न‍िम्नल‍िख‍ित है.

  • 6 माह से 6 साल के अतिकुपोष‍ित बच्‍चे: 1.5 किलो गेहूं द‍ल‍िया, 1.5 किलो चावल, 2 किलो चना दाल, 500 मिलीलीटर खाद्य तेल
  • 6 माह से 3 साल के बच्‍चे: 1 किलो गेहूं दल‍िया, 1 किलो चावल, 1 किलो चना दाल, 500 मिलीलीटर खाद्य तेल
  • 3 से 6 साल के बच्‍चे: 500 ग्राम गेहूं दलिया, 500 ग्राम चावल, 500 ग्राम चना दाल
  • गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं: 1.5 किलो गेहूं दल‍िया, 1 किलो चावल, 1 किलो चना दाल, 500 मिलीलीटर खाद्य तेल
  • 11 से 14 साल की किशोरियां: 1.5 किलो गेहूं दल‍िया, 1 किलो चावल, 1 किलो चना दाल, 500 मिलीलीटर खाद्य तेल

अनुपूरक पुष्‍टाहार का यह मानक बच्‍चों और महिलाओं में प्रतिद‍िन की कैलोरी और प्रोटीन की जरूरतों को देखते हुए तय किया गया है. बाल व‍िकास एवं पुष्‍टाहार व‍िभाग की ओर से कैलोरी और प्रोटीन का प्रतिद‍िन का तय मानक न‍िम्‍नलिख‍ित है.

  • 6 माह से 6 साल तक के अत‍िकुपोष‍ित बच्‍चे: 800 ग्राम कैलोरी और 20-25 ग्राम प्रोटीन
  • 6 माह से 3 साल के बच्‍चे: 500 ग्राम कैलोरी और 12-15 ग्राम प्रोटीन
  • 3 से 6 साल के बच्‍चे: 200 ग्राम कैलोरी और 6 ग्राम प्रोटीन
  • गर्भवती और स्‍तनपान कराने वाली महिलाएं: 600 ग्राम कैलोरी और 18-25 ग्राम प्रोटीन
  • 11 से 14 साल की किशोरियां: 600 ग्राम कैलोरी और 18-25 ग्राम प्रोटीन

पर्याप्‍त पुष्‍टाहार की कमी से जूझते लाभार्थी

यूपी के आंगनवाड़ी केंद्रों पर इन्‍हीं मानक के अनुसार राशन द‍िया जाता है. हालांकि इंड‍ियास्‍पेंड को व्‍यापक तौर पर यह समस्‍या देखने को म‍िली कि आंगनवाड़ी केंद्र पर ज‍ितने लाभार्थी हैं, उससे कम राशन पहुंच रहा है. इसका सीधा असर लाभार्थ‍ियों पर देखने को मिलता है.

लखनऊ के हबीबपुर गांव की रहने वाली रोमा यादव (23) को आठ महीने पहले बच्‍ची हुई, जिसका नाम सृष्टि है. जन्‍म के वक्‍त सृष्‍टी का वजन सिर्फ 1.5 किलो था, जो कि जन्‍म के वक्‍त कम वजन (लो बर्थ वेट) माना जाता है. व‍िश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के अनुसार जन्‍म के वक्‍त बच्‍चे का वजन 2.5 किलो से कम होने पर उसे लो बर्थ वेट के तौर पर देखा जाता है. गांव की आंगनवाड़ी कार्यकत्री ने सृष्‍टी का कम वजन देखते हुए उसे अतिकुपोषि‍त की श्रेणी में रखा. आंगनवाड़ी के अनुपूरक पुष्‍टाहार के मानक के अनुसार सृष्‍टी को हर महीने 1.5 किलो गेहूं द‍ल‍िया, 1.5 किलो चावल, 2 किलो चना दाल, 500 ग्राम खाद्य तेल मिलना चाहिए. इंड‍ियास्‍पेंड की टीम जब सृष्‍टी के घर पहुंची तो उसकी मां रोमा ने बताया, “प‍िछले दो महीने में एक बार राशन मिला है. मई और जून का मिलाकर एक बार. आंगनवाड़ी दीदी कहती हैं कि ऊपर से राशन कम आ रहा है, पता नहीं क्‍या सच है.

लखनऊ के हबीबपुर गांव की रोमा यादव अपनी बच्‍ची के साथ। फोटो: रणव‍िजय सिंह
लखनऊ के हबीबपुर गांव की रोमा यादव अपनी बच्‍ची के साथ. फोटो: रणव‍िजय सिंह

रोमा की बात से साफ है कि सृष्‍टी को तय मानक के अनुसार जितना पुष्‍टाहार मिलना चाहिए वो नहीं मिल रहा, यानी सृष्‍टी को पर्याप्‍त आहार नहीं मिल पा रहा. सृष्‍टी की तरह भारत में 6 से 23 महीने के 89% बच्‍चों को पर्याप्‍त आहार नहीं मिलता.

बच्‍चों को पर्याप्‍त आहार न मिलना कुपोषण के स्‍तर को बढ़ाने का एक कारक हो सकता है. यूपी में पहले ही कुपोषण का स्‍तर बहुत ज्‍यादा है. पांचवे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताब‍िक, यूपी में पांच साल से कम उम्र के 39.7% बच्‍चे ठ‍िगनापन, 17.3% बच्‍चे दुबलापन और 32.1% बच्‍चे अल्‍पवजन के हैं. ठिगनेपन के मामले में यूपी देश के उन 10 राज्‍यों में शामिल है जहां सबसे खराब स्‍थ‍ित‍ि है. इस मामले में यूपी स‍िर्फ मेघालय और बिहार से बेहतर स्‍थ‍िति में है.

कार्यकत्रियों के लिए चुनौती भरा राशन बांटना

आंगनवाड़ी केंद्रों पर राशन कम आने से आंगनवाड़ी कार्यकत्र‍ियों को भी परेशान‍ियों का सामना करना पड़ रहा है. कम राशन और ज्‍यादा लाभार्थ‍ियों के बीच संतुलन बैठाने के ल‍िए आंगनवाड़ी कार्यकत्र‍ियां अलग-अलग तरीके आजमा रही हैं. इसके अलावा गांव वालों की नाराजगी भी झेल रही हैं.

“गांव में लोग सीधा आरोप लगाते हैं कि उनका राशन हम खा रहे हैं, लेकिन यह सच नहीं है. हमें ज‍ितना राशन मिलता है, हम बांट रहे हैं,” लखनऊ के हबीबपुर गांव की आंगनवाड़ी कार्यकत्री उर्मिला मौर्य कहती हैं. “मुझे मई महीने में 66 लोगों का राशन मिला, जबकि मेरे यहां 6 माह से 3 साल के 74 बच्‍चे, गर्भवती और स्‍तनपान कराने वाली 22 महिलाएं और अतिकुपोष‍ित 4 बच्‍चे हैं. कुल 100 लाभार्थी हैं. अब इसमें से किसे राशन दें और किसे न दें,” उर्मिला बताती हैं.

आंगनवाड़ी के सभी लाभार्थियों को एक साथ राशन मिल जाये इसलिए उर्मिला ने मई और जून में मिले राशन को एक साथ वितरित किया. इससे उर्मिला ने गांव वालों से व‍िवाद की संभावना को खत्‍म किया लेकिन लाभार्थियों को दो महीने में एक बार राशन मिल पाया है. लाभार्थ‍ियों के पूछने पर अब उर्मिला ऊपर से कम राशन आने की दुहाई दे रही हैं.

उर्मिला की तरह गोरखपुर जिले के छितौनी गांव की आंगनवाड़ी कार्यकत्री गीता पांडेय भी जैसे तैसे पुष्‍टाहार व‍ितरण को संभाल रही हैं. गीता पांडेय ने बताया कि उनके आंगनवाड़ी केंद्र पर 12 गर्भवती हैं जिसमें से सिर्फ 6 के लिए राशन आ रहा है. इसी तरह 6 माह से 3 साल के 60 बच्‍चे हैं, लेकिन 30 बच्‍चों का राशन आ रहा है. 3 साल से 6 साल के 48 बच्‍चे हैं, लेकिन 16 बच्‍चों का ही राशन आ रहा है.

गीता कहती हैं, “हम लोगों को गांव में बहुत द‍िक्‍कतों का सामना करना पड़ रहा है. हमें यह तय करना पड़ रहा है कि अबकी बार अगर किसी गर्भवती को राशन दे रहे हैं तो अगली बार किसी दूसरे को दिया जाए. इसके साथ सभी लोगों से यह बताना पड़ रहा है कि सरकार से कम राशन आया है.”

धीमी गति से चल रहा पोषाहार यून‍िट बनाने का काम

यूपी में आंगनवाड़ी के तहत सूखा राशन बांटने की योजना ज्‍यादा पुरानी नहीं है. दरअसल, पहले आंगनबाड़ी केंद्रों पर बच्‍चों को पुष्‍टाहार के रूप में अनाजों का मिश्रण देते थे, जिसे ‘पंजीरी’ कहा जाता है. इस पुष्‍टाहार के उत्पादन और वितरण में अनियमितताओं की शिकायतों के चलते प्रदेश के बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग ने पंजीरी की आपूर्ति करने वाली कंपनियों का करीब 29 साल का एकाधिकार खत्‍म करते हुए सितंबर 2020 में यह काम स्‍वयं सहायता समूह की महिलाओं से कराने का फैसला लिया.

नई व्यवस्था के तहत ज‍िलों में पोषाहार यून‍िट लगने थे, लेकिन इसमें करीब 2 साल का लंबा वक्‍त लगने वाला था. इसल‍िए विभाग ने इस दौरान आंगनवाड़ी केंद्रों के लाभार्थियों को सूखा राशन देने का फैसला किया.

बात करें पोषाहार यून‍िट की तो इसकी प्रगति भी बहुत अच्‍छी नहीं है. योजना के तहत यूपी के 43 जिलों में 204 यून‍िट लगनी हैं, जिसकी जिम्‍मेदारी ‘यूपी राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन’ को दी गई है. इंड‍ियास्‍पेंड ने स‍ितंबर 2021 में र‍िपोर्ट किया कि योजना शुरू होने के एक साल बीतने के बाद इन 204 यून‍िट में से सिर्फ दो यूनिट लग पाई हैं. यह दो यूनिट भी संयुक्त राष्ट्र के यूएन वर्ल्‍ड फूड प्रोग्राम ने अपने खर्च पर लगवाई हैं.

पोषाहार यून‍िट को लेकर डॉ. सारिका मोहन ने उस वक़्त (स‍ितंबर 2021 में) बताया था कि उनको मिली जानकारी के अनुसार सभी 43 जिलों में पोषाहार उत्पादन तीन से चार महीने में शुरू हो जाना चाहिए. लेकिन इस बार इस विषय पर बात करने पर उन्होंने कहा, “यूपी राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन ने जो हमें र‍िपोर्ट दी है उसके हिसाब से जून के आख‍िर तक 34 पोषाहार यून‍िट शुरू हो जाएगी.” वहीं, राज्‍य ग्रामीण आजीविका मिशन की ओर से बताया गया कि फिलहाल फतेहपुर और उन्‍नाव जिले में दो यून‍िट लग पाई हैं. यह वही यून‍िट हैं जिन्‍हें यूएन वर्ल्‍ड फूड प्रोग्राम ने अपने खर्च पर लगवाया है. बाकी जगह यून‍िट लगाने का काम चल रहा है.

साभार- इंडियास्पेंड

(रणविजय सिंह इंडियास्पेंड के साथ प्रिंसिपल कोरेस्पोंडेंट हैं.)

कोरोना संकट के दौरान बच्चों के पोषण को आश्वस्त करने में मिड-डे मील स्कीम ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

स्कूल में दिया जाने वाला भोजन दुनिया भर में लाखों कमजोर बच्चों के लिए पोषण सुनिश्चित करता है. दुनिया भर में लगभग 37 करोड़ बच्चे स्कूल फीडिंग प्रोग्रामों का हिस्सा हैं. जबकि COVID-19 महामारी से पहले भारत में दोपहर में मिलने वाले मिड डे मील से 10 करोड़ स्कूली बच्चे लाभान्वित हुए थे, ब्राज़ील (4.8 करोड़), चीन (4.4 करोड़), दक्षिण अफ्रीका (90 लाख) और नाइजीरिया (90 लाख) जैसे देशों में भी स्कूली बच्चों के लिए भोजन कार्यकर्म अधिक चलाए जाते हैं. हाल ही में यूनिसेफ के ऑफिस ऑफ रिसर्च – इनोसेंटी और यूएन के विश्व खाद्य कार्यक्रम (डब्ल्यूएफपी) द्वारा जारी किए गए वर्किंग पेपर के अनुसार, 37 करोड़ बच्चे जोकि स्कूल में मिलने वाले भोजन के लाभार्थी थे, इस साल 2020 के कोरोना संकट के दौरान उनके 3900 करोड़ मील (भोजन) छूट गए हैं. (1 मील – 1 बार का भोजन)

COVID-19: मिसिंग मोर दैन अ क्लासरूम – द इम्पैक्ट ऑफ स्कूल क्लोजर्स ऑन चिल्ड्रन न्यूट्रीशन नामक शोध पत्र बच्चों के बीच कैलोरी की कमी को 30 प्रतिशत तक कम करने में मध्याह्न भोजन योजना (MDMS) के महत्व पर प्रकाश डालता है. फिक्स्ड-इफेक्ट्स रिग्रेशन (जिला या ग्राम स्तर पर) इंगित करते हैं कि मिड-डे मील स्कीम तक पहुंच और उम्र के हिसाब से कम लंबाई (यानी स्टंटिंग) के लिए स्कोर के बीच नकारात्मक और अत्यधिक महत्वपूर्ण सहसंबंध मौजूद है. 2005 और 2012 में भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण (आईएचडीएस) के डेटा से पता चलता है कि देश में दोपहर के भोजन की योजना उन बच्चों को अच्छी तरह से लक्षित है जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है, जिनमें लाभार्थियों की उम्र के हिसाब से कम लंबाई (यानी स्टंटिंग) जेड-स्कोर है उन लोगों की तुलना में जो मिड-डे मील स्कीम में नामांकित नहीं हैं.

देश में मिड-डे मील स्कीम के सकारात्मक प्रभाव से पोषण पर सूखे के नकारात्मक प्रभाव का अधिकांश प्रभाव पूरी तरह से निष्प्रभावी हो गया है. साक्ष्य आधारित शोध परिणामों के आधार पर, अध्ययन में उल्लेख किया गया है कि कुपोषण का खतरा उन बच्चों के लिए अधिक था, जो प्राथमिक शिक्षा पूरी नहीं करते थे या निरक्षर थे.

वर्किंग पेपर में कहा गया है कि स्कूल फीडिंग कार्यक्रमों को संशोधित किया जा सकता है ताकि स्कूल बंद होने या संकट के समय भोजन प्रदान किया जा सके. पके हुए भोजन के रूप में देने के अलावा, उन्हें टेक-होम राशन (THR) या बस बिना शर्त नकद हस्तांतरण (UCT) के रूप में भी प्रदान किया जा सकता है. गरीब और कमजोर परिवारों के बच्चों के बीच भोजन और पोषण सुनिश्चित करने के लिए स्कूल फीडिंग कार्यक्रमों के महत्व को रेखांकित करते हुए, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मार्च 2020 में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UT) को एक नोटिस जारी किया, जिसमें उन्हें मिड-डे मील स्कीम स्कूल बंद होने के दौरान भी जारी रखने के लिए कहा. इस मामले को लॉकडाउन के दौरान भूख और कुपोषण से निपटने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करने के लिए वर्किंग पेपर द्वारा उद्धृत किया गया है.

मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि बिहार और उत्तराखंड में, बैंक खाते के हस्तांतरण के माध्यम से मिड-डे मील स्कीम के बदले नकद हस्तांतरण प्रदान किया गया था, जबकि छत्तीसगढ़, जम्मू और कश्मीर, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में स्कूली बच्चों के परिवारों को घर पर ही राशन आपूर्ति की गई थी. नव प्रकाशित वर्किंग पेपर में कहा गया है कि बिहार में, कक्षा I-V (प्राथमिक) में प्रति स्कूल बच्चे का 114.21 रुपये का नकद हस्तांतरण और VI-VIII (उच्च प्राथमिक) में 171.17 रुपये प्रति स्कूली बच्चों का नकद हस्तांतरण किया गया (जो कि राज्य सरकार के अनुसार, प्रति बच्चे के 15 दिन के भोजन का खर्च है). केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में, खाद्यान्न घर पर ही पहुंचाए गए. हरियाणा जैसे कुछ राज्यों में, शिक्षकों ने पात्र छात्रों के परिवारों को मिड-डे मील राशन और खाना पकाने की लागत वितरित की.

भारत और घाना दोनों के साक्ष्य बताते हैं कि बचपन के दौरान खाद्य असुरक्षा से पढ़ने, संख्यात्मकता और अंग्रेजी अंकों के साथ-साथ अल्पकालिक स्मृति और आत्म-नियमन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. बाल विकास के लिए बच्चे के जीवन के पहले 8,000 दिनों में पोषण एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. वर्किंग पेपर में यह भी चेतावनी देता है कि स्कूल बंद होने के कारण शैक्षिक और पोषण संबंधी व्यवधान के दीर्घकालिक परिणाम होंगे यदि विभिन्न सरकारों द्वारा उचित रूप से नियंत्रित नहीं किया जाता है.

यूनिसेफ-डब्ल्यूएफपी पेपर दर्शाता है कि यूगांडा में प्राथमिक-स्कूली आयु वर्ग की लड़कियों और वयस्क महिलाओं के बीच एनीमिया को कम करने में स्कूल फीडिंग कार्यक्रमों ने मदद की है. घाना में स्कूली भोजन कार्यक्रमों से गरीबी रेखा के नीचे के परिवारों की लड़कियों और बच्चों को फायदा हुआ है. इस तरह के कार्यक्रमों से सीखने और संज्ञानात्मक क्षमताओं में सुधार होने की संभावना है. औसत दैनिक पारिवारिक आय का लगभग 15 प्रतिशत परिवारों द्वारा बचाया जाता है जब स्कूल जरूरतमंद परिवारों के बच्चों को खिलाते हैं.

यद्यपि वर्किंग पेपर ने सरकारों से मौजूदा स्कूल फीडिंग कार्यक्रमों को टेक-होम राशन, टॉप-अप कैश ट्रांसफर या फूड वाउचर का उपयोग करने के लिए कहा है, यह स्कूल-आधारित लक्ष्यीकरण और पोषण के वितरण के बाद से स्कूलों को सुरक्षित रूप से फिर से खोलने पर जोर देता है।. शोध पत्र के लेखकों द्वारा सरकारों से कार्यक्रम के डिजाइन और पूर्व में उपेक्षित मुद्दों पर ध्यान देने का आग्रह किया गया है, जैसे कि आहार की गुणवत्ता और भोजन-शोधन के विकल्प.

हालांकि दुनिया भर में सरकारें 5 साल से कम उम्र के बच्चों के पोषण की स्थिति पर डेटा प्रकाशित करती रही हैं, लेकिन 5 साल से अधिक उम्र के बच्चों के पोषण संबंधी परिणामों में डेटा की कमी है. तो, यूनिसेफ-डब्लूएफपी वर्किंग पेपर ने सरकारों से कहा है कि वे स्कूल जाने वाले बच्चों की पोषण स्थिति के अलावा स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के स्कूल ड्रॉपआउट और पोषण संबंधी परिणामों पर स्कूल क्लोजर के प्रभाव को समझने और आकलन करने के लिए घरेलू स्तर के आंकड़े एकत्र करें.

मिड-डे मील के लिए बजटीय आवंटन

हालांकि 19,946.01 करोड़ रुपए शुरू में 2020-21 (B.E.) में स्कूलों में मिड-डे मील के राष्ट्रीय कार्यक्रम के लिए आवंटित करने का प्रस्ताव था, लेकिन केंद्रीय बजट 2020-21 में इस योजना के लिए केवल 11,000.00 करोड़ की घोषणा की गई थी. मानव संसाधन विकास विभाग द्वारा संबंधित संसदीय स्थायी समिति द्वारा 5 मार्च, 2020 को राज्यसभा में प्रस्तुत की गई रिपोर्ट सं. 312 के अनुसार, मिड-डे मील स्कीम के लिए 8,946.01 करोड़ रुपए की स्पष्ट रूप से कमी थी.

नए बजट के संदर्भ में, केंद्रीय बजट 2021-22 में मिड-डे मील स्कीम के लिए नाममात्र बजट आवंटन बढ़ाया गया है. 2020-21 (B.E.) में 11,000 करोड़ रुपए के मुकाबले इस बार 2021-22 (बी.ई.) में 11,500 करोड़ यानी लगभग 4.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, केंद्र सरकार के स्कूल फीडिंग कार्यक्रम पर खर्च की गई राशि 2020-21 में 12,900 करोड़ (R.E.) रुपए थी. 2020-21 के लिए बजटीय आवंटन से मिड-डे मील स्कीम आवंटन में वृद्धि अप्रैल, 2020 से खाना पकाने में आई 1,900 करोड़ रुपये की लागत के कारण वार्षिक आवंटन में वृद्धि के कारण भी हुई है. केंद्रीय बजट 2021-22 के अपने विश्लेषण में, सेंटर फॉर बजट और गवरनेन्स एकाउंटेबलिटी (CBGA) ने कहा है कि चालू वित्त वर्ष (R.E.) के रिवाइज्ड एस्टीमेट्स को देखते हुए 2021-22 (B.E) में एमडीएमएस आवंटन मे की गई कटौती को सही ठहराना मुश्किल है.

आर्थिक सर्वे 2020-21 के अनुसार, 2020-21 में अनुमानित -7.7 प्रतिशत महामारी से प्रेरित संकुचन के बाद, भारत की वास्तविक जीडीपी 11.0 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि प्राप्त करने का अनुमान है, और अगले वित्तीय वर्ष में नाममात्र जीडीपी 15.4 प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है. इसलिए, अगले वित्त वर्ष में मुद्रास्फीति लगभग 4.4 प्रतिशत रहने की उम्मीद है. वास्तविक रूप से, 2020-21 (BE) और 2021-22 (BE) के बीच मिड-डे मील स्कीम आवंटन में लगभग कोई बदलाव नहीं हुआ है (यानी वास्तविक अर्थों में केवल 0.1 प्रतिशत की मामूली वृद्धि), अगर हम अगले वित्तीय वर्ष की 4.4 प्रतिशत मुद्रास्फीति को ध्यान में रखें.

केंद्र सरकार के कुल खर्च के अनुपात के रूप में मिड-डे मील स्कीम पर खर्च 2020-21 (बी.ई.) में 0.36 प्रतिशत था, जो 2021-22 (बी.ई.) में 0.33 प्रतिशत हो गया. सामाजिक कार्यकर्ताओं ने देश में बच्चों में कम पोषण के अधिक प्रसार के बावजूद मिड-डे मील स्कीम जैसी पोषण योजनाओं के लिए धन की कमी के बारे में अपनी चिंताओं को उठाया है. 3 फरवरी, 2021 के भोजन के अधिकार अभियान द्वारा एक प्रेस विज्ञप्ति में एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) योजना और मध्याह्न भोजन के तहत गर्म पकाए गए भोजन के तत्काल पुनरुद्धार के लिए कहा गया है. खाद्य सुरक्षा कार्यकर्ताओं द्वारा भोजन में अंडे को शामिल करने के लिए पर्याप्त बजटीय प्रावधानों की भी मांग की गई है.

हालाँकि, 2 फरवरी, 2021 को राज्य सभा को शिक्षा, महिलाओं, बच्चों, युवाओं और खेल संबंधी विभागीय संसदीय स्थायी समिति द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्ट सं. 320 में कहा गया था कि पिछले तीन वित्तीय वर्षों में, मिड-डे मील स्कीम के लिए बजट में प्रदान की गई धनराशि का पूरी तरह से उपयोग नहीं किया जा सका. उदाहरण के लिए, यह पाया गया है कि उत्तर पूर्वी क्षेत्र (एनईआर) के लिए आवंटित धन का पूरा उपयोग नहीं किया गया है. उत्तर पूर्वी क्षेत्र (एनईआर) में बच्चों की संख्या मिड-डे मील स्कीम के तहत मिड-डे मील (PAB-MDM) के कार्यक्रम अनुमोदन बोर्ड द्वारा अनुमोदित बच्चों की कुल संख्या का लगभग 6 प्रतिशत है, जबकि वित्त मंत्रालय के निर्देशों के अनुसार, लगभग 10 प्रतिशत किसी भी योजना के लिए बजट अनुमान एनईआर राज्यों के लिए आवंटित किए जाने हैं.

संबंधित राज्यसभा समिति ने धन के कम उपयोग पर अपनी चिंता व्यक्त की है और सिफारिश की है कि एक रणनीति तैयार की जानी चाहिए जिसमें मिड-डे मील स्कीम के तहत आवंटित धन का उपयोग विवेकपूर्ण तरीके से किया जाए. यह सुझाव दिया गया है कि यदि रिवाइज्ड एस्टीमेट धनराशि का उपयोग नहीं किया जा सकता है, तो संबंधित विभाग के पास संपार्श्विक कार्यक्रमों में होना चाहिए जहां धन सक्षम अधिकारियों के अनुमोदन के साथ दिया जा सकता है.

महिलाओं के सशक्तीकरण पर संसदीय स्थायी समिति की चौथी रिपोर्ट (2020-2021), जिसे फरवरी 2021 में लोकसभा में पेश किया गया था, ने उल्लेख किया है कि आदिवासी समुदायों के बीच पोषण संबंधी कमियों को संबोधित और उनमें सुधार करने के लिए अधिक से अधिक आदिवासी बच्चों को हर रोज गर्म पकाया भोजन उपलब्ध कराया जाना चाहिए. उस रिपोर्ट में, संसदीय स्थायी समिति ने सिफारिश की है कि जनजातीय क्षेत्रों के साथ-साथ बाहर के आदिवासी बच्चों के निजी तौर पर प्रबंधित निजी स्कूल, जो कृषि क्षेत्रों में दिनों के लिए दूर रहते हैं या गांवों में या आसपास के अन्य क्षेत्रीय कार्यों में शामिल होते हैं, मिड-डे मील स्कीम द्वारा कवर किया जाना चाहिए. पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी ने आदिवासी इलाकों के साथ-साथ मिड-डे मील स्कीम के तहत आउट-ऑफ-स्कूल आदिवासी बच्चों को निजी स्कूलों को कवर करने की सिफारिश की है. इस साल फरवरी के दौरान लोकसभा में प्रस्तुत संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार, मिड-डे मील स्कीम के उचित कार्यान्वयन के लिए जनजातीय क्षेत्रों में निजी स्कूलों को सरकारी अधिकारियों द्वारा बारीकी से देखा जा सकता है, लेकिन सरकार द्वारा स्कूल अधिकारियों को मौजूदा मानदंडों के अनुसार धन आवंटित किया जाना चाहिए. स्कूल से बाहर के आदिवासी बच्चों या स्कूल छोड़ने वालों के लिए, स्थानीय पंचायतों द्वारा दैनिक खाना पकाने और भोजन परोसने की एक समानांतर व्यवस्था की जा सकती है. समिति ने राज्यों / संघ शासित प्रदेशों द्वारा नियमित आवधिकता में मिड-डे मील स्कीम के ऑडिट के लिए भी सुझाव दिया है.