पंजाब- आत्महत्या से मरने वाले पंजाब के 9,000 से अधिक किसानों में से 88% कर्ज में डूबे

इकनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली (पत्रिका) के नए संस्करण में प्रकाशित पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) के एक अध्ययन से पता चला है कि पंजाब के छह जिलों में साल 2000 से 2018 के बीच आत्महत्या से 9,291 किसानों की मौत हुई है. सर्वेक्षण में शामिल  जिलों में संगरूर, बठिंडा, लुधियाना, मानसा, मोगा और बरनाला शामिल हैं.

अध्ययन में यह पाया गया है कि इन सभी आत्महत्याओं में 88 फीसदी मृत्यु का सब से मुख्य कारण गैर-संस्थागत स्रोतों से भारी कर्ज़ा लेना रहा है. अध्ययन में कहा गया है कि आत्महत्या से मरने वाले 77 प्रतिशत किसानों के पास दो हेक्टेयर से कम भूमि थी, अर्थात मुख्य रूप से सीमांत और छोटे किसान ही इन आत्महत्याओं का मुख्य शिकार थे.

पीएयू के क्षेत्रीय सर्वेक्षण से यह भी पता चला कि लगभग 93% परिवार ऐसे थे जिनमें एक व्यक्ति की आत्महत्या से मृत्यु हुई थी. 7% आत्महत्या के मामलों में परिवार में दो या दो से अधिक मामले थे. आत्महत्या से होने वाली कुल मौतों में से 92% पुरुष थे.

अध्ययन के मुताबिक, कर्ज से जुड़े आत्महत्या के मामलों की संख्या साल 2015 में सबसे ज्यादा (515) थी. उस साल कपास की फसल खराब हो गई थी. पंजाब के जिला बठिंडा, मनसा और बरनाला में प्रमुख व्यावसायिक फसल कपास है. लेकिन अमेरिकी कपास की उत्पादकता पिछले तीन दशकों में साल 2015 में सबसे कम (197 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) रही. किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था.

सर्वेक्षण किए गए जिलों में, संगरूर जो वर्तमान में आम आदमी पार्टी सरकार का मुख्य केंद्र है, में आत्महत्या से सबसे ज्यादा 2,506 मौतें हुई हैं. जिसके बाद मनसा में 2,098, बठिंडा में 1,956, बरनाला में 1,126, मोगा में 880 और लुधियाना में 725 आत्महत्याएं हुई.

यह अध्ययन पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (पीएयू) के अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र विभाग के तीन वरिष्ठ सदस्यों जिनमें सुखपाल सिंह, मंजीत कौर और एचएस किंगरा शामिल थे, ने घर-घर जाकर सर्वे के माध्यम से इन छह जिलों के सभी गांवों को कवर करके मौतों की कुल संख्या को संगठित किया.

भारी कर्ज की वजह

क्षेत्र के किसान ऐतिहासिक रूप से कर्जदार रहे हैं. 1920 के दशक की शुरुआत में, ब्रिटिश शोधकर्ता मैल्कम लयाल डार्लिंग ने पंजाब के किसानों पर टिप्पणी कर कहा था, “पंजाब का किसान कर्ज में पैदा होता है, कर्ज में रहता है और कर्ज में ही मर जाता है.”

यह समझने के लिए कि कैसे बारहमासी कर्ज़ की समस्या पंजाब के किसानों को घातक परिणामों की ओर ले जाती है, अध्ययन ने पिछली शताब्दी के बदलते कृषि परिदृश्य का विश्लेषण किया. देश में हरित क्रांति से पहले, पंजाब में पहले अपने गुज़र बसर के लिए खेती करना ही प्रचालन में था. जिसमें, किसानों के द्वारा कृषि का उत्पादन घरेलू उपभोग के लिए होता था.

लेकिन 1960 के दशक के बाद, हरित क्रांति की वजह से देश में व्यावसायिक खेती शुरू हुई जिसमें कृषि इनपुट और कृषि उत्पाद दोनों को बाजार से जोड़ दिया गया. जिसके लिए किसानों को पैसा उधार लेने की आवश्यकता हुई और निजी एजेंसियों द्वारा अत्यधिक ब्याज दरों पर उधार दिए गए, जिसकी बजह से किसान कर्ज के जाल में धकेल दिए गए.

35 साल से कम उम्र के किसानों में 75% आत्महत्या के मामले

अध्ययन से पता चलता है कि आत्महत्या से मरने वाले लगभग 75% किसानों की उम्र 19 से 35 वर्ष के बीच थी. आत्महत्या से मरने वालों में से लगभग 45% निरक्षर (अनपढ़) थे और 6% उच्च माध्यमिक स्तर तक पढ़े थे. अध्ययन के अनुसार, आत्महत्या पीड़ितों के परिवार अपनी सामाजिक असुरक्षा को लेकर बेहद डरे हुए पाए गए. ऐसे परिवारों में से एक-तिहाई हिस्सा उनका था जिन्होंने मुख्य कमाने वाले को खो दिया था जिसके बाद परिवार के पास आजीविका कमाने का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं बचा था. अध्ययन में कहा गया है कि लगभग 28% परिवार डिप्रेशन (अवसाद) से पीड़ित हैं.

इनमें से लगभग 13% परिवारों को अपनी कमाई का एकमात्र साधन छोड़कर, मृत्यु के बाद अपनी जमीन बेचनी पड़ी. जिनमें से कम से कम 11% परिवारों के बच्चों को अपनी शिक्षा बंद करनी पड़ी. अध्ययन में पाया गया कि जिन परिवारों में एक सदस्य की मौत कर्ज के बोझ के कारण आत्महत्या से हुई थी, उन्हें सामाजिक रूप से भी दूर रखा गया था.

नीतिगत हस्तक्षेप

अध्ययन के अनुसार, पीड़ितों के परिवारों को मुआवजा देने की व्यवस्था बहुत ही थकाऊ भरा है. मार्च 2013 में, राज्य सरकार ने एक नीति तैयार की थी जिसके अनुसार पीड़ित परिवारों को 3 लाख रुपये का मुआवजा के साथ अन्य सहायता, एक निश्चित अवधि के भीतर मृत्यु के बाद दिया जाना चाहिए. लेकिन, कई मामलों में ये परिवार पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, क्रेडिट रिकॉर्ड आदि जैसे आवश्यक दस्तावेजों की कमी के कारण इस मुआवजे से वंचित हो गए थे.

अध्ययन के अनुसार, उन सभी किसान परिवारों को मुआवजा देना बहुत आवश्यक है जहां परिवार में एकलौते कमाऊ सदस्य की आत्महत्या से मृत्यु हुई है क्योंकि वे सभी गंभीर आर्थिक संकट में हैं.

अध्ययन में सलाह दी गई है कि संस्थागत ऋण, जो पीड़ित परिवारों द्वारा लिए गए कुल कर्ज़ का लगभग 43% है, को माफ कर दिया जाना चाहिए. अध्ययन में कहा गया है कि गैर-संस्थागत स्रोतों द्वारा दिए गए कर्ज़ों का निपटान करने के लिए, गैर-संस्थागत ऋण को संस्थागत ऋण में बदलने करने के लिए ‘उधारकर्ताओं की ऋण अदला-बदली की योजना’ को प्रभावी बनाया जाना चाहिए.

पंजाब चुनाव से पहले, आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने दावा किया था कि अगर उनकी पार्टी पंजाब में सरकार बनाती है, तो वह किसानों के बीच आत्महत्या से होने वाली मौतों को रोक देंगे. आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने के दो महीने में दो दर्जन किसान आत्महत्या कर चुके हैं. कांग्रेस पंजाब के प्रमुख अमरिंदर सिंह राजा वारिंग सहित विपक्ष ने अपने वादे पर खरे नहीं उतरने के लिए भगवंत मान के नेतृत्व वाली सरकार की आलोचना की है.

National Seminar on “Liberating the Farmers from Debt Trap”

The question is how do we revitalize the health of our economy and liberate the farmers from the debt trap. Have we failed on the policy front?

gadkariAccording to 70th round of NSS data for the year 2012-13, majority of the farmers in India do not earn enough even to meet their consumption needs. In years of drought or floods, their condition becomes miserable and desperate. The small and marginal farmers are the most vulnerable in this respect. During the past one and a half decade, about 3 lakh farmers have committed suicide.

The question is how do we revitalize the health of our economy and liberate the farmers from the debt trap. Have we failed on the policy front? What kind of policy reforms are needed to improve the socio-economic conditions of farmers in various regions? What are the key challenges to implement the needed policy reforms? We sincerely feel that there is a need to discuss in an integrated manner, all the relevant issues relating to the present agrarian distress and find out the ways to overcome the challenges.

To initiate a debate on this crucial agricultural policy challenge The Council for Social Development, New Delhi, Centre for Agricultural Policy Dialogue, New Delhi and Swabhimani Shetkari Sanghtana of Maharashtra are jointly organizing a National Seminar on “Liberating the Farmers from Debt Trap: Challenges of Policy Reforms in India” at the India International Centre, Annexe, New Delhi on June 14, 2016.

Participants in the inaugural session of the seminar include Sri. Nitin Gadkari, Union Minister of Surface Transport, Highways and Shipping, Prof. Arvind Panagariya, Vice Chairman, NITI Aayog, Sri. Sanjeev Balyan, Minister of State, Agriculture, Sri. Om Prakash Singh Dhankar, Minister of Agriculture Haryana, Sri. Feroze Varun Gandhi, M.P and Dr. Dalwai, Additional Sec. Ministry of Agriculture, Govt. of India.

About 70 persons including technical experts, Members of Parliament, senior government officials and representatives of NGOs and Farmers’ organisations are expected to participate in the seminar. The seminar will discuss the following issues:

(i) Alternative Models of Income and Social Security for the farmers;
(ii) Challenges of Agricultural Policy Reforms, including Agricultural Price and Market Reforms, Technology, Land Policy, Subsidies, Crop Insurance, Credit Sector Reforms etc.
(iii) Challenges of Climate change – Risk Mitigation and Adaptation Strategies.