तुम किसान नहीं हो सकते!

तुम! तुम किसान नहीं हो सकते तुम मुंशी प्रेम चंद के होरी हो सकते हो, तुम हल्कू और जबरा हो सकते हो। मगर तुम किसान नहीं हो। किसान अपनी ‘दो बीघा जमीन’ पर खुश है। तुम ‘दो बीघा जमीन’ के शम्भु हो सकते हो। वो शम्भु जो 65 रूपये के कर्ज की चक्की में पिसता रहता है। लेकिन तुम किसान नहीं हो सकते।  

अच्छा किसान कभी शिकवा शिकायत नहीं करता। वो कभी नहीं कहता कि खेती घाटे का सौदा हो गई है। नगर महानगर, दिल्ली और राज्यों की राजधानी के गिर्द फलते फूलते फार्म हाउस गवाही देते है कि खेती फायदे का धंदा है। ये यूँ ही नहीं है कि नामी गिरामी हस्तियां काश्तकार के रूप में खुद को मुतारीफ कराने को बेताब हैं। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने यूपी के बाराबंकी में कभी जमीन का एक टुकड़ा खरीदा/ताकि वे खेती कर सके। संजय लीला भंसाली ने राजस्थान के जालोर के दसपा में जमीन खरीदी। यह काश्तकारी के प्रति असीम अनुराग था कि फिल्म स्टार जितेंद्र ने बूंदी जिले में जमीन खरीदी। लिएंडर पेस टेनिस के स्टार हैं। लेकिन यह काफी नहीं था। रिपोर्टेंं है कि पेस ने राजस्थान के सिरोही के राडबर में जमीन खरीदी।  

दिल्ली के गिर्दो नवा कोई 2700 फार्म हाउसेज हैं। इनमें कोई ज्वैलर है, कोई नेता है, कोई सम्पादक है, कोई बिचौलिया है, कोई एक्टर है, कोई कांट्रेक्टर है। ये सब खून पसीने की कमाई से बने हैं। उन्हें कोई शिकायत नहीं है। वे वतन परस्त है। वे दिन में किसी को परेशान नहीं करते। खेती भी रात को करते हैं। वहां साँझ ढले खेती शुरू होती है, भोर तक चलती है। वे असली किसान हैं। लेकिन तुम किसान नहीं हो। बेशक! तुम लाल बहादुर शास्त्री के जय जवान, जय किसान नारे का हिस्सा हो सकते हो। मगर दोस्त तुम किसान नहीं हो। 

आंकड़े बोलते हैं कि भारत में हर दिन खेती किसानी पर निर्भर 28 लोग ख़ुदकुशी कर मौत को गले लगा लेते है। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है। मुंबई के एक सांसद गोपाल शेट्टी ने चार साल पहले कथित रूप से कहा “ऐसी मौतेंं एक फैशन हो गई हैं। हर मौत कोई भूख या बेकारी से नहीं होती।”

स्टालिन भी कहता था The death of one man is a tragedy, the death of millions is a statistic एक व्यक्ति की मौत त्रासदी है, लाखोंं की मौत एक आंकड़ा हो जाती है। तुम उस संख्या का हिस्सा हो सकते हो, लेकिन किसान नहीं हो सकते। 

पंजाब के बरनाला में 22 साल के लवप्रीत की जिंदगी ने 23वा बसंत नहीं देखा। उसके पिता कुलवंत सिंह किसान थे, कर्ज से परेशान हो कर जान दे दी। कुलवंत के पिता भगवान सिंह ने भी ऐसे ही मौत को गले लगा लिया था। कर्ज में लिपटी यह तीसरी पीढ़ी थी/आप ये नहीं कह सकते कि किसान को खेती करनी नहीं आती। पंजाब में प्रति एकड़ उपज किसी भी विकसित मुल्क़ के बराबर है।

आंध्र में धरती के उस टुकड़े से मलप्पा का पीढ़ियों का रिश्ता था। लेकिन एक दिन उसने हार मान ली। खेती की नाकमयाबी ने उसे तोड़ दिया।उसने किसी दुकान से  वो सब खरीदा जो दाह संस्कार में काम आता है। मलप्पा ने कफ़न, पत्नी के लिए चुडिया, एक खुद की लेमिनेटेड फोटो और अगरबत्ती खरीदी। फिर खेत पर लौटा और जान दे दी। महाराष्ट्र में जालना में शेजुल राव खेती करते थे। एक दिन सभी नाते रिश्तेदारों को खुद की शोक सभा के लिए न्योता भेजा। किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन अगले दिन शेजुल राव ने आत्म हत्या कर ली। 

उस दिन यतवमाल के शंकर चावरे का नाम भी ख़ुदकुशी करने वाले किसानो की फेहरिस्त में दर्ज हो गया / वो भी खाली हाथ गया। लेकिन चावरे देश के हाकिम के नाम चिठ्ठी छोड़ गया। कहा आपकी नीतियांं मेरी मौत के लिए जिम्मेदार है। उस दिन मुख्यमंत्री का उस इलाके में  कार्यक्रम था। मगर रद्द हो गया। क्योंकि चावरे के परिजन उनसे सवाल पूछने की तयारी कर रहे थे। चावरे की बेटी भाग्य श्री ने कहा, “हमारे नेता कायर निकले।” उनमें एक बेटी की शोकाकुल आँखों का सामना करने की हिम्मत नहीं थी। संसद के 38 % सदस्य किसान है। लेकिन इन मौतों पर कोई नहीं बोला। यूँ वे मुखर रहते हैं मगर इस मुद्दे पर जबान गूंगी हो गई। ऐसी मौतों पर भारत भी नहीं पूछता।  

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