कहीं चना तो कहीं सरसों एमएसपी के नीचे बेचने को मजबूर हैं किसान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार किसानों के लिए किए गए अपने कार्यों को गिनाते हुए यह बताना नहीं भूलती कि उसने किसानों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को बढ़ाकर लागत का डेढ़ गुना कर दिया है। सरकार के मंत्री और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लोग भी अक्सर ये दावे करते दिखते हैं।

लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। सरकार जो एमएसपी तय कर रही है, उस पर किसानों का उत्पाद खरीदे जाने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। इस वजह से मंडियों में व्यापारी किसानों से मनमाने भाव पर उनके उत्पादों को खरीद रहे हैं।

इसे दो उदाहरणों के जरिए समझा जा सकता है। अभी चना देश की विभिन्न मंडियों में आना शुरू हुआ है। चने का न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार ने 4,620 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। लेकिन इस मूल्य पर सरकार ने चने की खरीद शुरू नहीं की है।

अब जाहिर है कि सरकार खरीद नहीं करेगी तो मंडियों में किसानों को व्यापारियों के तय किए गए दर पर चना बेचना पड़ेगा। यही हो रहा है। मध्य प्रदेश की मंडियों से ये खबरें आ रही हैं कि वहां चना का न्यूनतम समर्थन मूल्य भले ही 4,620 रुपये प्रति क्विंटल का हो लेकिन किसानों को 3,800 रुपये प्रति क्विंटल का दर हासिल करने के लिए नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं। वहां यह दर भी जिन्हें मिल जा रहा है, वे खुद को खुशकिस्मत मान रहे हैं। किसानों को औसतन प्रति क्विंटल 800 से 900 रुपये का नुकसान हो रहा है।

अब इसके मुकाबले बाजार भाव देख लीजिए। इससे पता चलेगा कि किसानों को क्या दर मिल रहा है और आम उपभोक्ताओं को कितने पैसे चुकाने पड़ रहे हैं। जिस दिन मध्य प्रदेश की मंडियों से यह खबर आई कि वहां चना 3,800 रुपये प्रति क्विंटल यानी 38 रुपये प्रति किलो बेचने के लिए किसाना विवश हैं, उसी दिन दिल्ली में चना का खुदरा भाव पता करने पर यह बात सामने आई कि आम दिल्लीवासियों को एक किलो चने के लिए 105 रुपये से लेकर 115 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि किसानों से जिस भाव पर चना खरीदा जा रहा है, उससे तीन गुना अधिक कीमत पर उपभोक्ताओं को बेचा जा रहा है। सवाल यह उठता है कि बीच का जो अंतर है, वह कौन खा रहा है?

सरसों का उत्पादन करने वाले किसानों को भी एमएसपी नहीं मिल रही है। सरसों के पैदावार के लिहाज से राजस्थान का देश में बेहद अहम स्थान है। यहां सरसों की पैदावार मंडियों में आने लगी है। सरकार ने सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,200 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है।

लेकिन राजस्थान के श्रीगंगानगर मंडी से यह खबर आ रही है कि 4,200 रुपये प्रति क्विंटल की एमएसपी के मुकाबले उन्हें सिर्फ 3,400 रुपये प्रति क्विंटल से लेकर 3,600 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहे हैं। इस तरह से देखा जाए तो किसानों को एमएसपी के मुकाबले 600 से 800 रुपये कम में एक क्विंटल सरसों बेचना पड़ रहा है।

इन स्थितियों को देखने पर यह पता चलता है कि सिर्फ एमएसपी की घोषणा कर देना भर पर्याप्त नहीं है बल्कि इसे लागू कराने का एक उपयुक्त तंत्र विकसित करना बेहद जरूरी है। तब ही बढ़ी हुई एमएसपी का वास्तविक लाभ किसानों तक पहुंच पाएगा।

भयंकर कृषि संकट का सामना कर रहे हैं गांव

इंटरनैशनल फूड पाॅलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें इस संस्था ने बताया है कि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के गांव भयंकर कृषि संकट का सामना कर रहे हैं। संस्था ने यह भी कहा है कि अगर स्थितियों को नहीं सुधारा गया तो इससे और भी कई तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

संस्था ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों के ग्रामीण इलाकों की स्थिति और वहां के भयंकर कृषि संकट का अध्ययन करके बताया है कि इस वजह से इन क्षेत्रों में भूखमरी, कुपोषण, गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। साथ ही पर्यावरण को लेकर भी नए तरह की चुनौतियां पैदा हो रही हैं।

इस रिपोर्ट में इस स्थिति के खतरों से भी पूरी दुनिया को आगाह करने की कोशिश की गई है। रिपोर्ट मंे बताया गया है कि अगर स्थिति को नहीं सुधारा गया तो दुनिया की खाद्य सुरक्षा खतरे में आएगी। इसके अलावा सतत विकास लक्ष्यों को 2030 तक हासिल करना मुश्किल हो जाएगा। साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर स्थितियों में सुधार नहीं लाया गया तो पेरिस समझौते के लक्ष्यों को भी हासिल करना मुश्किल हो जाएगा।

इस रिपोर्ट में अफ्रीका, भारत और चीन के ग्रामीण इलाकों के संकट की खास तौर पर चर्चा की गई है और कहा गया है कि इन क्षेत्रों के शहरी इलाकों में जो सुविधाएं हैं, उनके मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में काफी कम सुविधाएं हैं। चीन के ग्रामीण इलाके पर्यावरण से संबंधित समस्याओं से जूझ रहे हैं। वहीं अफ्रीका के ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी बड़ी समस्या है। जबकि भारत के ग्रामीण इलाकों में कृषि संकट कई और समस्याओं के मूल में है।

अब भी गांवों में सबसे ज्यादा गरीब लोग रहते हैं। पूरी दुनिया की आबादी में गांवों की हिस्सेदारी 45.3 प्रतिशत है। जबकि दुनिया के 70 फीसदी गरीब लोग गांवों में ही रहते हैं। शहरी इलाकों में गरीबी की दर सात फीसदी है। जबकि गांवों के लिए यह आंकड़ा वैश्विक स्तर पर 17 फीसदी का है।

समाधान की राह सुझाते हुए इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण इलाकों पर खास जोर देते हुए उनका विकास करने की जरूरत है। नीतिगत मामलों में ग्रामीण इलाकों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इसके लिए रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण विकास को व्यापक दायरे में देखने की जरूरत है।

रिपोर्ट में नीति निर्धारकों को संबोधित करते हुए कहा गया है कि उन्हें यह भी देखने की जरूरत है कि अगर गांवों का विकास होगा तो इससे पूरी अर्थव्यवस्था आगे बढ़ेगी, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी, वैश्विक विकास लक्ष्यों को हासिल किया जा सकेगा और पर्यावरण संरक्षण संबंधित लक्ष्यों को पूरा करना भी आसान होगा।

इस रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि समस्या के समाधान के लिए गांवों और शहरों की अर्थव्यवस्थाओं को आपस में जोड़ना होगा। इससे कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र में सामंजस्य बनेगा और इसका असर न सिर्फ आर्थिक स्तर पर पड़ेगा बल्कि सामाजिक जीवन में भी इससे सुधार होगा।

इस रिपोर्ट में ग्रामीण इलाकों की स्थिति में सुधार के लिए पांच उपाय अलग से बताए गए हैं। ये उपाय हैंः गांवों में कृषि और गैर-कृषि रोजगार सृजन, लैंगिक समानता, पर्यावरण चुनौतियों का समाधान, उर्जा स्रोतों तक पहुंच में सुधार और सुशासन में निवेश। जाहिर है कि अगर इन मोर्चो पर काम होता है तो इससे न पूरी दुनिया के ग्रामीण इलाकों की तस्वीर बदल सकती है।

इस रिपोर्ट में पहली बार कुछ अच्छे प्रयोगों के बारे में भी बताया गया है। इसमें बताया गया है कि कैसे यूरोप के कुछ देशों ने अपने यहां के गांवों को संकट को दूर करने का सफल प्रयोग किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन प्रयोगों में से कुछ बातें दुनिया के वैसे देश अपनी जरूरत के हिसाब से अपना सकते हैं, जहां के ग्रामीण क्षेत्र संकटों का सामना कर रहे हैं।

कैसे उठाएंं प्रधानमंत्री बीमा योजना का फायदा? क्‍या हैं दिक्‍कतें?

योजना के व्‍यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद अभी भी बहुत-से किसानों को जानकारी नहीं है कि फसल बीमा कैसे कराएं और क्‍लेम कैसे मिलेगा?

करीब चार महीने पहले किसानों को प्रकृति की मार और अचानक होने वाले नुकसान से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का ऐलान किया था। इस खरीफ सीजन से किसानों को इस नई योजना का लाभ मिलना शुरू हो जाएगा। लगातार दो साल से सूखे की मार झेल रहे किसानों को बेसब्री से इस योजना का इंतजार है। योजना के बारे में व्‍यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद अभी भी बहुत-से किसानों को जानकारी नहीं है कि फसल बीमा कैसे कराएं और क्‍लेम कैसे मिलेगा?

नई योजना में क्‍या है नया? 

  • पुरानी फसल बीमा योजनाओं में किसानों को 15 फीसदी तक प्रीमियम देना पड़ता था लेकिन नई बीमा योजना में किसानों के लिए प्रीमियम की राशि महज डेढ से 2 फीसदी रखी गई है। बागवानी फसलों के लिए किसानों को 5 फीसदी प्रीमियम देना होगा। बीमा का बाकी खर्च केंद्र और राज्‍य सरकारें मिलकर वहन करेंगी।
  • सरकारी सब्सिडी पर कोई ऊपरी सीमा नहीं है। भले ही शेष प्रीमियम 90% हो, यह सरकार द्वारा वहन किया जाएगा। पुरानी बीमा योजनाओं में सरकारी सब्सिडी की ऊपरी सीमा तय होती थी। जिसके चलते नुकसान की पूरी भरपाई नहीं हो पाती थी। नई स्कीम में बीमित राशि का पूरा क्‍लेम मिल सकेगा।
  • अभी तक देश में करीब 23 फीसदी किसान ही फसल बीमा के दायरे में आ पाए हैं। सरकार ने इस साल कम से कम 50 फीसदी किसानों तक फसल बीमा पहुंचाने का लक्ष्‍य रखा है।

-बैंकों से कर्ज लेने वाले किसानों के लिए फसल बीमा अनिवार्य है। यानी बैंक से कर्ज लेने वाले किसानों का बीमा बैंकों के जरिये हो जाएगा। लेकिन जिन किसानों ने बैंकों से कर्ज नहीं लिया, उन्‍हें बीमा के दायरे में लाने सरकार के लिए बड़ी चुनौती है।

– ओलाबारी, जलभराव और भू-स्‍खलन जैसी आपदाओं को स्थानीय आपदा माना जाएगा। स्थानीय आपदाओं और फसल कटाई के बाद नुकसान के मामले में किसान को इकाई मानकर नुकसान का आकलन किया जाएगा।

किस तरह के नुकसान कवर होंगे

बुवाई/रोपण में रोक संबंधित जोखिम: कम बारिश या प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों के कारण बुवाई/ रोपण में उत्पन्न रोक।

खड़ी फसल (बुवाई से कटाई तक के लिए): सूखा, अकाल, बाढ़, सैलाब, कीट एवं रोग, भूस्खलन, प्राकृतिक आग और बिजली, तूफान, ओले, चक्रवात, आंधी, टेम्पेस्ट, तूफान और बवंडर आदि के कारण उपज के नुकसान।

कटाई के उपरांत नुकसान: नई बीमा योजना में फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान की भरपाई हो पाएगी। अगर फसल कटाई के 14 दिन तक यदि चक्रवात, चक्रवाती बारिश और बेमौसम बारिश से उपज को नुकसान पहुंचता है तो किसान को बीमा क्‍लेम मिल सकता है।

स्थानीय आपदायें: अधिसूचित क्षेत्र में मूसलधार बारिश, भूस्खलन और बाढ़ जैसे स्थानीय जोखिम से खेतों को हानि/क्षति।

बीमा कराने पर कितना खर्च आएगा 

उदाहरण के तौर पर, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में 30 हजार का बीमा कराने पर अगर प्रीमियम 22 प्रतिशत तय किया गया है तो किसान 600 रुपए प्रीमियम देगा और सरकार 6000 हजार रुपए का प्रीमियम देगी। शत-प्रतिशत नुकसान की दशा में किसान को 30 हजार रुपए की पूरी दावा राशि प्राप्त होगी।

-अगर किसी ग्राम पंचायत में 75 फीसदी किसान बुवाई नहीं कर पाएं तो योजना के तहत बीमित राशि का 25 फीसदी भुगतान मिलेगा।

25 फीसदी राशि तुरंत खातों में पहुंचााने का दावा 

सरकार का दावा है कि बीमा क्‍लेम के लिए लंबे समय तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। प्राकृतिक आपदा के बाद 25 फीसदी राशि किसान के खाते में तुरंत पहुंचेगीी जबकि बाकी भुगतान नुकसान के आकलन के बाद किया जाएगा।

किन किसानों को मिलेगा बीमा का लाभ?

सभी पट्टेदार/ जोतदार किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ मिल सकता है। योजना के तहत पंजीकरण कराने के लिए किसानों कों भूमि रिकॉर्ड अधिकार (आरओआर), भूमि कब्जा प्रमाण पत्र (एल पी सी) आदि आवश्यक दस्तावेजी प्रस्तुत करने होंगे।

गैर ऋणी किसानों के लिए यह योजना वैकल्पिक होगी।

कैसे कराएं फसल बीमा?

कृषि ऋण लेने वाले किसानों का बीमा उनके बैंक के जरिये होगा। जिन किसानों ने बैंक से कर्ज नहीं लिया है वे भी नोडल बैंक या भारतीय कृषि बीमा कंपनी (एआईसी) के स्‍थानीय प्रतिनिधि अथवा संबंधित पंचायत सचिव, ब्‍लाॅक के कृषि विकास अधिकारी या जिला कृषि अधिकारी के माध्‍यम से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में अपना पंजीकरण करा सकते हैं।

भारत सरकार ने किसानों तक बीमा योजना को पहुंचाने के लिए एक बीमा पोर्टल भी शुरू किया है। जिसका वेब पता  है http://www.agri-insurance.gov.in/Farmer_Details.aspx

इसके अलावा एक एंड्रॉयड आधारित “फसल बीमा ऐप्प” भी शुरू किया गया है जो फसल बीमा, कृषि सहयोग और किसान कल्याण विभाग (डीएसी एवं परिवार कल्याण) की वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है।

फसल बीमा कराने के लिए जरुरी दस्‍तावेज?

-सरकारी पहचान-पत्र

-निवास प्रमाण-पत्र

-खसरा/खाता संख्या की प्रमाणित प्रति (बोये गए क्षेत्र के दस्तावेज़)

-बैंक खाता संख्या और रद्द किया गया चेक (बैंक विवरण के लिए)

  • एक हस्ताक्षरित भरा हुआ प्रस्ताव फॉर्म

फसल बीमा की पूरी प्रकिया ऑनलाइन होने और स्‍थानीय स्‍तर पर कर्मचारियों की कमी के चलते किसानों को फसल बीमा करवाने में कई तरह की दिक्‍कतें आ रही हैं। जनधन खाते खोलने के लिए बैंकों ने जिस प्रकार अभियान चलाए, वैसे तत्‍परता फसल बीमा को लेकर देखने में नहीं आ रही है।

फसल बीमा में असल दिक्‍कतें क्‍लेम लेते वक्‍त आनी शुरू होंगे। तभी नई योजना की खूबियां और खामियां पूरी तरह उजागर होंगी।