गन्ने के रेट में बढ़ोतरी को लेकर आंदोलन तेज, अमित शाह की रैली का विरोध करेंगे किसान!

प्रदेश के गन्ना किसानों ने भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) के बैनर तले किसानों ने गन्ने के राज्य सलाहकार मूल्य (एसएपी) में बढ़ोतरी की मांग पूरी नहीं होने पर सरकार के खिलाफ अपना आंदोलन तेज करने की घोषणा की. किसानों ने राज्य भर में कई विरोध प्रदर्शनों की घोषणा की, जिसमें ट्रैक्टर मार्च, गन्ने की ‘होली’ जलाना और शर्ट उतारकर गृह मंत्री अमित शाह की रैली का विरोध करना शामिल है.

गन्ने के रेट में बढ़ोतरी की मांग को लेकर किसान बुधवार को ट्रैक्टर मार्च निकालेंगे और मुख्यमंत्री का पुतला फुकेंगे.
26 जनवरी को सर छोटू राम की जयंती पर ‘गन्ने की होली’ जलाएंगे. 27 जनवरी को अनिश्चितकाल के लिए चीनी मिलों के बाहर सड़क जाम करेंगे. वहीं 29 जनवरी को गोहाना में गृह मंत्री अमित शाह की रैली में शामिल होंगे और उनके भाषण के दौरान शर्ट उतारकर अपनी नाराजगी जाहिर करेंगे.

एक बैठक के दौरान किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने कहा, “किसान 25 जनवरी को अपनी चीनी मिलों से निकटतम शहर या कस्बे तक सीएम के पुतले के साथ ट्रैक्टर मार्च निकालेंगे और बाद में चीनी मिलों पर पुतला फूंकेंगे. 26 जनवरी को सर छोटू राम की जयंती पर किसान “गन्ने की होली” जलाएंगे. उन्होंने कहा कि वे अपनी मांगों को लेकर दबाव बनाने के लिए 27 जनवरी को अनिश्चित काल के लिए चीनी मिलों के बाहर सड़कों को जाम करेंगे.

साथ ही गोहाना में 29 जनवरी को गृह मंत्री अमित शाह की रैली में बड़ी संख्या में किसान शामिल होंगे. वे शाह के भाषण के दौरान अपनी शर्ट उतारकर नाराजगी जाहिर करेंगे. उन्होंने कहा, ‘हम अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार हमें ये नहीं दे रही है.’

किसान नेता एसएपी को मौजूदा 362 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 450 रुपये करने की मांग को लेकर राज्य की 13 चीनी मिलों के बाहर अनिश्चितकालीन धरना दे रहे हैं. किसानों ने आरोप लगाया कि सरकार ने किसी भी तरह की बढ़ोतरी की घोषणा नहीं की है. और जब विपक्षी नेताओं ने विधानसभा के शीतकालीन सत्र में इस मुद्दे को उठाया, तो सीएम मनोहर लाल खट्टर ने एसएपी तय करने के लिए एक समिति गठित करने की घोषणा की थी. गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने कहा, ‘हम चीनी मिलों के बाहर विरोध कर रहे हैं और अपनी मांगों को पूरा होने तक विरोध जारी रखेंगे.’

गन्ने की कीमत बढ़ाने की मांग को लेकर किसानों ने दूसरे दिन भी जड़ा शुगर मिलों पर ताला!

हरियाणा सरकार ने विधानसभा के शीतकालीन सत्र के अखिरी दिन प्रदेश में गन्ने के दाम बढ़ाने की विपक्ष की मांग को नहीं माना था. गन्ने के दाम में बढ़ोतरी न होने से प्रदेश के किसान आक्रोषित हैं. जिसको लेकर आज नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी के नेतृत्व में भारतीय किसान यूनियन चढूनी ने प्रदेश की सभी शुगरमिलों को बंद

पिछले कईं दिनों से किसानों ने गन्ने की छिलाई बंद कर रखी है और किसान नेताओं की ओर से जारी कार्यक्रम के तहत प्रदेशभर की शुगर मिलों पर तालाबंदी की गई है. किसानों ने पानीपत ,फफड़ाना ,करनाल ,भादसोंभाली आनंदपुर शुगर मिल व महम शुगर मिल पर भी सुबह 9 बजे ताला लगाते हुए धरना शुरू किया. साथ ही जो भी गन्ने की ट्राली मिल पर पहुंची, उन्हें वापस लौटा दिया. उन्होंने कहा कि जब तक सरकार किसानों की मांग पूरी नहीं करती, तब तक शुगर मिलों को बंद रखते हुए प्रदर्शन किया जाएगा.

किसानों ने अम्बाला में नारायणगढ़ शुगर मिल के बाहर धरना दिया. सोनीपत के गोहाना में आहुलाना शुगर मिल पर ताला जड़कर किसानों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की तो वहीं किसानों का शाहबाद शुगर मिल और करनाल शुगर मिल पर भी धरना जारी है.

किसान गन्ने के रेट को बढ़ाकर 450 रुपए करने की मांग कर रहे हैं. बता दें कि पंजाब में गन्ना किसानों को 380 रुपये प्रति किवंटल का रेट मिल रहा है.

दो दिन पहले किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने ट्वीट किया था, “आज रात के बाद कोई भी किसान भाई किसी भी शुगर मिल में अपना गन्ना लेकर ना जाए अगर कोई किसी नेता या अधिकारी का नजदीकी या कोई अपना निजी फायदा उठाने के लिए शुगर मिल में भाईचारे के फैसले के विरुद्ध गन्ना ले जाता है और कोई उसका नुकसान कर देता है तो वह अपने नुकसान का खुद जिम्मेदार होगा.”

किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने आज लिखा, “हरियाणा के सभी शुग़रमिल बंद करने पर सभी पदाधिकारियों व किसान साथियों का धन्यवाद, अगर सरकार 23 तारीख़ तक भाव नहीं बढ़ाती तो आगे की नीति 23 तारीख़ जाट धर्मशाला में बनायी जाएगी.”

सोनीपत गन्ना मिल के बाहर किसानों का प्रदर्शन.

चालू सीजन में यूपी के गन्ना किसानों का 7,000 करोड़ बकाया, पिछले सीजन के भी 1,500 करोड़ बाकी

अमित शाह 26 जनवरी को जब उत्तर प्रदेश के कुछ जाट नेताओं से मिले, तो उस बैठक में कुछ जाट नेताओं ने गन्ना किसानों को देरी से भुगतान का मुद्दा भी उठाया। दरअसल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों का बकाया एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन गया है। सत्तारूढ़ भाजपा के रिकॉर्ड भुगतान के दावे के बावजूद अक्टूबर 2021 से सितंबर 2022 तक चलने वाले मौजूदा सीजन में गन्ना किसानों के करीब 7,000 करोड़ रुपये चीनी मिलों पर बकाया हो गए हैं। गन्ना किसान इस बात से भी नाराज हैं कि हाई कोर्ट के आदेश बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार चीनी मिलों को ब्याज भुगतान से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट चली गई।

उत्तर प्रदेश सरकार के गन्ना विभाग की 25 जनवरी तक की रिपोर्ट के अनुसार, चीनी मिलों ने पेराई सत्र 2021-22 में 25 जनवरी तक 465.26 लाख टन गन्ना किसानों से खरीदा, जिससे 45.67 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। किसानों से खरीदे गए गन्ने की कीमत करीब 16,000 करोड़ रुपये बनती है, जबकि इस दौरान गन्ना किसानों को 9,157.43 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है। यानी इस सत्र का करीब 7,000 करोड़ रुपये बकाया है।

भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने सरकार के रवैये को निराशाजनक बताया। रूरल वॉयस से बातचीत में उन्होंने कहा, “सरकार ने किसानों को 14 दिनों में भुगतान का वादा था, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। इससे किसानों की मुश्किलें बढ़ रही हैं। पिछली सरकार के समय जो ग्रुप समय से भुगतान नहीं कर रहे थे, वही ग्रुप अब भी भुगतान में कोताही कर रहे हैं। लेकिन उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो रही है।”

चौंकाने वाली बात यह है कि राज्य के गन्ना विकास और चीनी उद्योग मंत्री सुरेश राणा की विधान सभा थाना भवन और जिले की शामली मिल ने अभी तक पिछले साल का पूरा भुगतान नही किया है। इससे साफ हो जाता है कि जब उत्तर प्रदेश सरकार के संबंधित विभाग के मंत्री के गृह जिले और विधान सभा में गन्ना मूल्य भुगतान की यह स्थिति है तो इस मुद्दे पर सरकार की सख्ती की क्या स्थिति है।

शामली जिले के गांव खेड़ी बैरागी के किसान जीतेंद्र हुड्डा ने रूरल वॉयस को बताया, “इस साल के भुगतान की बात तो दूर, अभी तक पिछले साल के गन्ने का भी भुगतान नहीं हुआ है। ऐसे में हमें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।”

पिछले सीजन (2020-21) में 1027.50 लाख टन गन्ने की पेराई हुई और चीनी उत्पादन 110.59 लाख टन रहा था। चीनी मिलों ने गन्ना किसानों को 31,716.65 करोड़ रुपये का भुगतान किया। यह कुल गन्ना मूल्य का 96.07 फीसदी है। यानी पिछले सीजन की भी चार फीसदी रकम बकाया है, जो करीब 1,500 करोड़ रुपये बैठती है। हालांकि उससे पहले के वर्षों में प्रदेश की 119 चीनी मिलों ने गन्ने का पूरा भुगतान कर दिया है। मौजूदा सरकार के कार्यकाल में कुल 1,55,926.79 करोड़ रुपये के गन्ना मूल्य का भुगतान किया गया है।

गन्ना किसानों की नाराजगी दूर करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले साल सितंबर के आखिरी हफ्ते में गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) 25 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाकर 350 रुपये किया था। गन्ने की कीमत में वृद्धि की घोषणा करते समय राज्य सरकार ने कहा था कि गन्ने की रिजेक्ट की गई किस्मों को भी 310 रुपये की जगह 335 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर खरीदा जाएगा। हालांकि घोषणा के समय इस गन्ने का सिर्फ एक फीसदी बाकी रह गया था। राज्य सरकार का दावा था कि मूल्यवृद्धि से किसानों को 4,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आमदनी होगी। लखनऊ में किसान सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किसानों के बकाया बिजली बिल पर ब्याज माफ करने की भी घोषणा की थी। इसके बावजूद गन्ना किसानों की नाराजगी दूर होती नहीं लग रही है।

किसानों को मिलकर रहेगा ब्याज समेत गन्ना भुगतान

कोविड-19 दुनिया भर के लिए मुसीबत का सबब है और उत्तर प्रदेश के गन्ना उत्पादक किसान इसके अपवाद नहीं हैं। करीब 80 फीसदी ग्रामीण अर्थव्यवस्था रोजमर्रा का खर्च चलाने के लिए दूध की बिक्री पर निर्भर है। लेकिन कोरोना संकट के कारण दूध की कीमत घटने से उन किसानों की दिक्कतें बढ़ गई हैं जिन्हें छह से बारह महीनों में गन्ना भुगतान मिलता है। यही नहीं, किसानों पर अपने किसान क्रेडिट कार्ड के कर्ज को ब्याज और जुर्माने के साथ लौटाने का दबाव है, बच्चों के स्कूल और कॉलेज की फीस जमा करने के साथ उन्हें अपना घर भी चलाना है। इससे उन पर भारी बोझ पड़ रहा है और कई किसानों ने आत्महत्या कर ली है।

ऐसे में किसान केंद्र सरकार द्वारा आगामी वर्ष के लिए घोषित गन्ने के उचित लाभकारी मूल्य (एफआरपी) में केवल 10 रुपये की वृद्धि से नाखुश हैं। कई किसानों का कहना है कि उनके सामने खुदकुशी करने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा है। लेकिन मैं गन्ने के बकाया भुगतान की समस्या के बारे में बात करते हुए किसानों को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि आने वाले दिनों में हालत बेहतर हो सकते हैं। यह सर्वज्ञात तथ्य है कि साल 1995-96 तक चीनी मिलें किसानों से गन्ना लेकर भुगतान करने में वर्षों लगा देती थीं। लेकिन 1997 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद जब चीनी मिलों को गन्ना किसानों के 29 करोड़ रुपये ब्याज समेत चुकाने का निर्देश दिया गया तब चीनी मिलों ने जल्द भुगतान करना शुरू कर दिया था क्योंकि उन्हें पता 14 दिनों के बाद ब्याज भी देना पड़ेगा।

निर्देश के बावजूद अगौता चीनी मिल ने 25 करोड़ रुपये से ज्यादा का गन्ना भुगतान तो किया लेकिन ब्याज नहीं दिया। चूंकि तब 80 सहकारी या सरकारी चीनी मिलों का नियंत्रण राज्य सरकार के पास था, इसलिए राज्य सरकार ने ब्याज समेत गन्ना भुगतान में दिलचस्पी नहीं ली और आदेशों का पालन नहीं कराया। जबकि अदालत के आदेशों के तहत ब्याज की धनराशि के बराबर चीनी का स्टॉक डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट की कस्टडी में था। इसलिए 1997 में मुझे गन्ना आयुक्त और चीनी मिल मालिक के खिलाफ अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी। लगभग 12 वर्षों के संघर्ष के बाद आखिरकार चीनी मिल के निदेशक को जेल भेजा गया और अगौता चीनी मिल के किसानों को 2009 में ब्याज का भुगतान मिला।

किसानों को याद दिलाना चाहुंगा कि गन्ना सीजन 1996-97 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) को अवैध करार देते हुए केंद्र द्वारा निर्धारित एसएमपी पर गन्ना भुगतान का निर्देश दिया था जो एसएपी से एक तिहाई कम था। इस मामले पर जब सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की याचिका खारिज हो गई तो 1997 में मैंने हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच में याचिका दायर की जिसमें अदालत ने 1999 में एसएपी को समझौता मूल्य के रूप में कायम रखने और गन्ना आयुक्त को 14 दिनों के भीतर ब्याज समेत भुगतान सुनिश्चित कराने का निर्देश दिया। तब भी ब्याज का भुगतान नहीं किया गया तो मैंने 1997 से ब्याज का भुगतान करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की जो अभी तक लंबित है। जब अगौता चीन मिल ने किसानों को ब्याज का भुगतान किया तो मैंने ब्याज समेत गन्ना भुगतान के लिए एक नई याचिका दायर की।

साल 2014-15 में हाईकोर्ट ने गन्ना आयुक्त को साल 2011 से 2015 तक करीब 2000 करोड़ रुपये के ब्याज का भुगतान सुनिश्चित कराने को कहा लेकिन उस समय की समाजवादी पार्टी सरकार ने 2015 और 2016 में कैबिनेट फैसलों के जरिए चीनी मिलों द्वारा किसानों को दिया जाने वाला भुगतान तीन साल के लिए माफ कर दिया। हाईकोर्ट ने इस निर्णय को रद कर दिया है और योगी सरकार के गन्ना आयुक्त को चार महीनों नए सिरे से मामले पर निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

लेकिन जब गन्ना आयुक्त ने ब्याज भुगतान के मुद्दे पर लगभग दो साल तक कोई निर्णय नहीं लिया तो मुझे अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी। पहले तो गन्ना आयुक्त ने अदालत के निर्देशों को टालने की कोशिश की लेकिन जब उन्हें गिरफ्तार किए जाने की चेतावनी दी गई, तो उन्होंने 2019 में एक हलफनामा दायर किया कि 2012-13, 2013-14 और 2014-15 में लाभ कमाने वाली चीनी मिलें किसानों को प्रतिवर्ष 12 फीसदी और घाटे में चल रही मिलें 7 फीसदी ब्याज का भुगतान करेंगी। इसमें भुगतान माफ किए जाने या 2011-12 के ब्याज भुगतान का कोई जिक्र नहीं है जबकि इसका भुगतान भी अदालत के आदेश के अनुसार होना चाहिए।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आपत्ति जताई कि ब्याज का भुगतान कानूनन 15 फीसदी की दर से होना चाहिए। मैंने गन्ना किसानों को मिलने वाला ब्याज खत्म करने के लिए राज्य सरकार और गन्ना आयुक्त के अधिकार को भी चुनौती दी। जब गन्ना आयुक्त ने ब्याज के भुगतान के बारे में हलफनामा दायर कर दिया, तब धनराशि का भुगतान तुरंत होना चाहिए था, लेकिन राज्य और चीनी मिलों ने लंबी हड़ताल और बाद में महामारी के कारण अदालत न चलने का फायदा उठाया।

लेकिन अदालतें कुछ दिनों में काम करना शुरू कर देंगी और तब गन्ना आयुक्त को ब्याज के भुगतान में देरी का कारण बताना होगा। एक बार जब सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दे दिया कि गन्ना आयुक्त के पास ब्याज राशि को माफ करने या कम करने का अधिकार नहीं है, तो मिल मालिक या राज्य 14 दिनों के बाद भुगतान में एक दिन की भी देरी नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें 15 फीसदी ब्याज देना होगा, जबकि उन्हें कॉरपोरेट कर्ज 10 से 12 फीसदी ब्याज पर मिलता है। ये तथ्य बताते हैं कि किसानों को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। निश्चित रूप से उन्हें ब्याज का भुगतान मिलेगा।

मैं गन्ना किसानों को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि बुरा वक्त बीत चुका है और अब बकाया भुगतान मिलना तय है। अगर 1996 से 15 फीसदी सालाना की दर से ब्याज का भुगतान किया जाता है, तो उन्हें प्रति एकड़ एक लाख रुपये मिलेंगे और यदि 2011-12 से 2019-2020 तक भुगतान किया जाता है, तो भी उन्हें प्रति एकड़ 50 हजार रुपये से कम नहीं मिलेंगे।

कर्ज अदा न करने पाने वाले गन्ना किसानों के खिलाफ रिकवरी नोटिस जारी होने को लेकर उनकी परेशानी समझी जा सकती है। लेकिन हर किसान को पता होना चाहिए कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच के 2012 के आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि जब तक चीनी मिलों से ब्याज समेत गन्ना भुगतान न हो जाए, तब तक राज्य किसानों के खिलाफ सरकार रिकवरी नोटिस जारी नहीं कर सकती है। यही वजह है कि पिछले सात सालों में रिकवरी नोटिस जारी नहीं हुए और किसानों को कम से कम 10 फीसदी कलेक्शन चार्ज की बचत हुई है। लेकिन इस साल स्टे ऑर्डर लागू होने के बावजूद रिकवरी नोटिस जारी हुए हैं। राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन ऐसे रिकवरी नोटिस को वापस कराने के प्रयास कर रहा है।

एफआरपी में दस रुपये की वृद्धि से भी किसानों को उदास होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हम सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले के अनुसार एसएपी के हकदार हैं, जिसने मेरे मामले में हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। राज्य को एसएपी तय करने का अधिकार है, जो एक वैध मूल्य है। उम्मीद है कि अक्तूबर में जो एसएपी तय किया जाएगा, वह प्रधानमंत्री के वादे के मुताबिक उत्पादन लागत पर 50 फीसदी लाभ के फार्मूले के अनुसार कम से कम 450 रुपये प्रति क्विंटल होगा। एक बार जब 15 फीसदी की दर से किसानों को ब्याज का भुगतान किया जाएगा तो अगली बार गन्ना भुगतान खुद ही समय से होगा। इससे नोटबंदी और महामारी के दौरान नौकरी गंवा चुकी युवा पीढ़ी के लिए खेती की तरफ लौटने का अच्छा अवसर मौका मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा।

(लेखक किसान नेता और राष्ट्रीय मजदूर किसान संगठन के संयोजक हैं)

चीनी मिलों को 38 हजार करोड़ की सरकारी मदद, फिर भी किसानों का 22 हजार करोड़ बकाया

पिछले दो वर्षों में केंद्र सरकार चीनी मिलों को करीब 38 हजार करोड़ रुपये की मदद और रियायतें देने का ऐलान कर चुकी है। इसके बावजूद गन्ना किसानों का बकाया भुगतान 22 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसमें सबसे ज्यादा बकाया उत्तर प्रदेश के किसानों का है। 12 मई तक यूपी की चीनी मिलों पर किसानों का कुल 14,496 करोड़ रुपये बकाया था।

लॉकडाउन और महामारी के संकट में भुगतान को लेकर किसानों की परेशानी बढ़ती जा रही है। स्थिति बिगड़ती देख अब केंद्र सरकार हरकत में आई है और केंद्रीय खाद्य मंत्री राम विलास पासवान ने चीनी मिलों को जल्द से जल्द भुगतान करने को कहा है। लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि सरकार से हजारों करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता मिलने के बावजूद चीनी मिलों ने किसानों को समय पर भुगतान नहीं किया है।

खाद्य मंत्रालय के अनुसार, अक्तूबर से शुरू हुए पेराई सीजन 2019-20 में देश भर की चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का बकाया 22,079 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसमें से करीब 767 करोड़ रुपये का भुगतान पेराई सीजन 2018-19 का है। यह हाल तब है जबकि पिछले दो साल में करीब 80 लाख टन चीनी का निर्यात हो चुका है और अगले चार महीनों में 10 लाख टन चीनी निर्यात की संभावना है। चीनी के अलावा एथनॉल के उत्पादन से भी चीनी मिलों को कमाई होती है। लॉकडाउन के दौरान तो चीनी मिलों ने सैनिटाइजर भी खूब बनाया, लेकिन किसानों का भुगतान अटका हुआ है।

सवाल यह है कि चीनी मिलों की कमाई के विभिन्न स्रोतों, चीनी के निर्यात और तमाम सरकारी रियायतों के बावजूद किसानों को समय पर भुगतान क्यों नहीं मिलता?

इस साल चीनी मिलों को रियायतें

40 लाख टन चीनी का बफर स्टॉक बनाने के लिए 1647 करोड़ रुपये की भरपाई

60 लाख टन चीनी निर्यात के लिए प्रति टन 10,448 रुपये की सहायता। इस पर कुल 6,268 करोड़ रुपये खर्च

पिछले साल दी गई सहायता  

चीनी मिलों को प्रति कुंतल 13.88 रुपये की मदद। कुल खर्च 3,100 करोड़ रुपये

चीनी निर्यात को बढ़ावा देने के लिए 900 करोड़ रुपये की सहायता

30 लाख टन चीनी का बफर स्टॉक बनाने के लिए 780 करोड़ रुपये की भरपाई

बैंकों के जरिए 7402 करोड़ रुपये का सॉफ्ट लोन जिस पर एक साल के लिए 7 फीसदी ब्याज सरकार भरेगी। ब्याज छूट पर खर्च 518 करोड़ रुपये

इन रियायतों के अलावा गन्ने से एथनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 362 चीनी मिलों को 18,643 करोड़ रुपये का सॉफ्ट लोन दिया जा रहा है। इस कर्ज पर सरकार पांच साल तक कुल 4045 करोड़ रुपये की ब्याज छूट देगी। इस योजना के तहत अब तक 64 चीनी मिलों को 3148 करोड़ रुपये का कर्ज मंजूर हो चुका है। एथनॉल उत्पादन की तकनीक और क्षमता में सुधार के लिए भी सरकार चीनी मिलों को प्रोत्साहन दे रही है।

यह सिर्फ केंद्र सरकार की ओर से दी गई सहायता है। राज्य सरकारों की ओर चीनी मिलों को मिलने वाली मदद इसमें शामिल नहीं है।

करीब 38 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की इन रियायतों के बावजूद चालू पेराई सीजन में 31 फीसदी गन्ने का भुगतान किसानों को नहीं मिला है। चालू पेराई सीजन में किसानों ने कुल 72 हजार करोड़ रुपये का गन्ना चीनी मिलों को बेचा है, जिसमें से अभी तक करीब 50 हजार करोड़ रुपये का भुगतान हुआ है।

किसान नेता सरदार वीएम सिंह
किसान नेता सरदार वीएम सिंह

गन्ना भुगतान के मुद्दे पर सरकार और चीनी मिलों के साथ लंबी लड़ाई लड़ रहे राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय संयोजक सरदार वीएम सिंह का कहना है कि सरकार और चीनी मिलों की मिलीभगत के चलते किसानों को न तो समय पर पेमेंट मिलता है और न ही बकाया भुगतान पर कोई ब्याज मिल पाता है। जिस दिन चीनी मिलों को बकाया भुगतान पर ब्याज देना पड़ेगा, वे समय पर भुगतान करने लगेंगी। चीनी मिलों की खराब माली हालत के तर्क को खारिज करते हुए वीएम सिंह कहते हैं कि यूपी में 15 साल में प्राइवेट चीनी मिलों की संख्या 35 से बढ़कर 95 हो गई। अगर इस उद्योग में घाटा होता तो प्राइवेट सेक्टर नई फैक्ट्रियां क्यों लगाता?

इस साल गन्ना भुगतान में देरी के लिए केंद्र सरकार कोरोना संकट और लॉकडाउन को प्रमुख वजह बता रही है। खाद्य मंत्रालय के अनुसार, लॉकडाउन के दौरान चीनी की खपत में करीब 10 लाख टन की कमी आई जिसका असर चीनी मिलों की कमाई पर पड़ा। यह बात मान भी लें तो हर साल भुगतान में देरी की समस्या को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। पिछले साल जब कोरोना जैसा संकट नहीं था, तब भी गन्ना किसानों का बकाया 28 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। अगर उत्पादन के लिहाज से देखें तो इस साल चीनी मिलों की स्थिति बेहतर है, क्योंकि देश में चीनी उत्पादन पिछले साल से करीब 18 फीसदी कम हुआ है। इसलिए भाव बेहतर मिलने की उम्मीद है।

दरअसल, गन्ना भुगतान में देरी पुरानी समस्या है। इससे चीनी मिलों को कच्चा माल यानी गन्ना उधार पर मिल जाता है और किसानों को पेमेंट कई-कई महीने बाद या अगले साल होता है। किसानों का यह बकाया भुगतान चीनी मिलों के लिए ब्याज मुक्त कर्ज की तरह है। जबकि किसानों को नकद खर्च कर पेमेंट के इंतजार में उधार लेना पड़ता है। यह खेती को घाटे का सौदा बनाने वाली व्यवस्था की एक छोटी-सी झलक है। कृषि संकट के पीछे ऐसे कई कहानियां छिपी हैं।