बुधवार, 07 दिसंबर 2022
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अब डूब रहा है रेगिस्तान का जहाज! ऊंटों की संख्या में लगातार हो रही है गिरावट



राजस्थान में ऊँट की घटती संख्या को देखते हुए 30 जून 2014 को तत्कालीन राज्य सरकार ने ऊँट को घरेलू पालतू पशु के रूप में संरक्षण प्रदान किया था।

राज्य का नाम ‘राजस्थान’ सुनते ही प्रत्येक मानव मस्तिष्क में रेगिस्तान व रेगिस्तान में पाया जाने वाला सबसे बड़ा जन्तु ऊँट का चित्र अपने आप ही बन जाता है। राजस्थान की पहचान वाला यह जन्तु संख्या बल में पिछड़ता हुआ नजर आ रहा है। पिछले एक दशक में राजस्थान प्रदेश में ऊँटो की संख्या में भारी कमी आई है, जो चिंताजनक है।

2012 में हुई 19वीं पशुगणना में राजस्थान में ऊँटो की संख्या 3.25 लाख थी। 20वीं पशुगणना, जो 2017 में प्रारंभ हुई जिसमें चौकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। 20वीं पशुगणना के अनुसार प्रदेश में ऊँटो की संख्या 3.25 लाख से घटकर 2.13 लाख रह गई है। यह चिंताजनक आंकड़े हैं जो ऊँट को दुर्लभ प्रजाति की ओर ले जा रहे हैं।

राजस्थान में ऊँट की घटती संख्या को देखते हुए 30 जून 2014 को तत्कालीन राज्य सरकार ने ऊँट को घरेलू पालतू पशु के रूप में संरक्षण प्रदान किया। सरकार ने ‘राजस्थान डिजास्टर मैनेजमेंट रिस्पॉन्स फंड’ की धारा 6(2) संशोधन कर इसमें कैटल/कैमल नया प्रावधान लागू करने की घोषणा की। अब तक इसमें सिर्फ गोवंश को ही शामिल किया गया था। जबकि चिंकारा 1981 से ही राजस्थान का राज्य पशु है। ऊँट को राज्य पशु का दर्जा दिए जाने के बावजूद भी संख्या में लगातार कमी होती जा रही है, जो भविष्य में ऊँट के विलुप्त होने के संकेत दे रही है।

राष्ट्रीय ऊष्ट्र अनुसंधान केन्द्र बीकानेर के प्रिंसिपल साइंटिस्ट डॉ. राजेश कुमार सावल ने हमें बताया, “पिछले कुछ समय से ऊँटों की संख्या में लगातार कमी हो रही है जो चिंताजनक है। ऊंट की राज्य के बाहर ख़रीद- फरोख्त पर रोक लगने के कारण ऊंट पालकों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रहा है। महंगा चारा होने की वजह से पालकों में ऊँट के प्रति दिलचस्पी नहीं दिखाई देती। लेकिन ऊँट के दूध में ओषधीय गुण होने की वजह से मांग बढ़ी है। ऊँटनी का दूध एमेजॉन पर आसानी से उपलब्ध हो रहा है। ऊँट के प्रति जागरूकता लाने के लिए निजी फंड इक्कठा करके ऑल इंडिया रेडियो पर ‘ऊंटा री बाता’ का कार्यकम चलाया जा रहा है इसके अलावा दूरदर्शन के माध्यम से भी लोगों में जागरूकता लाने का प्रयास किया जा रहा है। ‘ऊँट महोत्सव’ का आयोजन भी ऊँट के प्रति जागरूकता लाने के लिए किया जा रहा है। लेकिन सरकार की ओर से ऊँट पालकों को कोई विशेष सहयोग नहीं मिल पाना इसकी घटती हुई संख्या का कारण है।

परिवहन के आधुनिक संसाधनों ने कम की ऊँट की उपयोगिता

पशू चिकित्सक (एलएसए) डॉ सुभाष सिंह सिद्धू ने बताया कि एक समय ऊँट मरुस्थल में परिवहन का मुख्य साधन हुआ करता था। आवागमन व कृषि कार्यों में ऊँट का विशेष महत्व था। लेकिन विकास की चकाचौंध भरी आँधी में ऊँट की उपयोगिता कम होती चली गई। परिवहन के लिए रेत पर चलने वाले स्कूटर व गाड़ियां और कृषि कार्यों के लिए ट्रैक्टर ने मरुस्थल में निवास करने वाले लोगों की ऊँट पर निर्भरता को कम किया है। ऊँट के दूध का उपयोग पश्चिमी राजस्थान में ही होता था, लेकिन समय के साथ अब इसका दायरा विस्तृत हुआ है। इसके बावजूद कई कारणों से ऊँट की उपयोगिता पशुपालकों के लिए कम होती जा रही है और वे इसके प्रजनन में ज्यादा रुचि नहीं ले रहे हैं।

युवाओं में नहीं है ऊँट के प्रति दिलचस्पी

श्री देगराय उष्ट्र संरक्षण दुग्ध विपणन विकास संस्थान के अध्यक्ष सुमेर सिंह ने हमें बताया, “मेरे पास तीन सौ के करीब ऊँट है जिनसे प्रतिदिन एक क्विंटल दूध प्राप्त होता है जिसे जैसलमेर में बेचा जाता है। लेकिन वर्तमान में ऊँट पलकों की स्थिति अति-दयनीय होती जा रही है। ऊँट पालक आर्थिक रूप से पिछड़ते जा रहे है घाटे का सौदा होने के कारण पलकों का इस प्राणी से मोह भंग हो रहा है, नई युवा पीढ़ी की दिलचस्पी नहीं दिखाई देती। चारागाह खत्म हो रहे है चारे के संकट पलकों पर भारी पड़ रहा है, खरीद-फरोख्त पूर्णतः बन्द है, ‘उष्ट्र प्रोत्साहन योजना’ के तहत अनुदान का पूर्णतः लाभ पलकों तक नहीं पहुंच पाया है। अभी तक प्रोत्साहन राशि की तीसरी किश्त का भुकतान नहीं हुआ है। ज्यादातर ऊंट पालकों को तो अभी तक दूसरी किश्त की राशि का भी प्राप्त नहीं हुई है। सरकार से मांग है कि अनुदान योजना की राशि बढ़ाई जाए और पलकों तक सुचारू रूप से समय पर पहुंचाई जाये।”

ऊँट में है विषम परिस्थितियों में जीने का हौंसला, मनुष्य के लिए प्रेरणा स्त्रोत

केमेलस ड्रोमेडेरियस (वैज्ञानिक नाम), कैमलिडाए कूल का यह जन्तु, हर परिस्थिति को अपने अनुकूल बना लेता है। हर प्रकार के मौसम में जीने का हौंसला रखता है। चाहे कड़ाके की ठंड हो या भीषण गर्मी, ऊँट हर स्थिति में जीवन बसर आसानी से कर लेता है। बदलते हालातों में इसने अपने आपको इस तरह ढाला कि रेतीली आंधी व सूरज की तेज किरणें भी इस पर बेअसर होती हैं। ऊँट के हर परिस्थिति में जीने का हौंसला वर्तमान के मनुष्य को हर परिस्थिति में जीने के लिए प्रेरित करता है।

अजीब-सा दिखने वाला यह पालतू पशु बिना पानी पीये कई दिनों तक जीवित रह सकता है। यह रेत के धोरों में तेज धावक की तरह बिना रुके-थके लम्बी दौड़ लगा लेता है। भारत में गरीब लोगों के लिए ऊँट दैनिक आमदनी का बेहतर जरिया है। इस भोले-भाले पशु की उपयोगिता न केवल कृषि व सिंचाई क्षेत्रों में है बल्कि इसका उपयोग माल ढोने, निर्माण तथा मनोरंजन, सवारी व सफारी में भी किया जाता है। इसके अतिरिक्त सीमा पर देश की सुरक्षा में भी इनका उपयोग किया जाता है। इसलिए ऊँट बहुउपयोगी पशुओं की श्रेणी में शुमार है। इनके बालों व खाल की व्यापक उपयोगिता होने से पशुपालक इन्हें बाजार में ऊँचे दामों में बेचकर काफी मुनाफा कमा लेतें है ऊँटनी के दूध में औषधीय गुण होते हैं, जो सेहत के लिए काफी फायदेमंद होता है। औषधीय गुणों के कारण इसके दूध की बिक्री बाजार में आसानी से हो जाती है।

ऊँट को कहा जाता है रेगिस्तान का जहाज

ऊँट के पैर चपटे व गद्देदार होते है जो मरुस्थलीय भूमि में धँसते नहीं जिस कारण ऊँट मरुस्थलीय भूमि पर लम्बी दूरी तय करने में सहायक होते है ऊँट के एक बार पानी पी लेने पर कई दिनों तक बिना पानी के रह सकता है ऊँट की जीवनशैली रेगिस्तान में रहने के अनुकूल है इसलिए इसे ‘रेगिस्तान का जहाज’ कहा जाता है।

जवानों के साथ ऊँट करता है सरहदों की सुरक्षा

राजस्थान में सीमा पर रेगिस्तान का जहाज बीएसएफ के जवानों का हमसफर बना हुआ है। हर तरह के मौसम में ऊँट उनके सच्चे साथी की भूमिका में हमेशा तत्पर रहते हैं। पाकिस्तान के साथ लगने वाली राजस्थान की 1070 किमी सीमा रेखा का अधिकांश क्षेत्र रेगिस्तानी है जहाँ पर बीएसएफ के जवान ऊँट पर बैठकर गश्त करते हैं।

बीएसएफ के जवानों का कहना है कि ऊँट की ऊंचाई अधिक होने के कारण ऊंट पर बैठ कर जवान काफी दूरी तक स्पष्ट देख सकता है। साथ ही रेगिस्तान में कई दिन तक बगैर पानी के भी ऊँट लगातार अपनी सेवा दे सकते है। बीएसएफ की प्रत्येक बटालियन के पास अपने ऊँट होते हैं। जवानों को उपलब्ध सुविधाओं के अनुसार ही ऊँटों का भी पूरा ध्यान रखा जाता है।

ऊँट संरक्षण के लिए राज्य सरकार के प्रयास

30 जून 2014 को राजस्थान सरकार ने ऊँट के संरक्षण के लिए ऊँट को राज्य-पशु का दर्जा दिया है, साथ ही प्रजनन को बढ़ावा देने के लिए “उष्ट्र प्रजनन प्रोत्साहन योजना” के अंतर्गत ऊँटनी के ब्याने पर तीन किश्तों में कुल 10,000 रूपये की आर्थिक सहायता दी जाती हैं। ऊँटनी के दूध का औषधीय महत्त्व होता हैं, इसका उपयोग मधुमेह, ऑटिज्म, दमा, पीलिया, तपेदिक और एनीमिया में लाभदायक बताया गया है। ऊँट पालन को बढ़ावा देने के लिए प्रतिवर्ष बीकानेर में “ऊँट महोत्सव” का आयोजन होता है जिसमें ऊँट की सजावट, बाल कतरन डिजाइन और ऊँट नृत्य के लिए पुरस्कार दिए जाते हैं।