शुक्रवार, 27 जनवरी 2023
गांव-देहात

प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना: क्या सरकार पूरा कर पाएगी देश के देहाती गरीबों के घर का सपना?



ग्रामीण इलाकों में 42% लोगों के पास पक्के मकान थे और 50% लोगों के पास आधा पक्का आधा कच्चा घर था. वहीं 8% लोग कच्चे घरों में रह रहे थे.

जिन योजनाओं के पूरा होने का साल 2022 स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा प्रचारित किया गया उनमें प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना भी शामिल थी. सरकार के अनुसार प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना (पीएमएवाई-जी) को ग्रामीण क्षेत्रों में 2022 तक ‘सभी के लिए आवास’ प्रदान करने की सरकार की प्रतिबद्धता के अनुरूप तैयार किया गया था. इस योजना का उद्देश्य 2022 तक कच्चे और जीर्ण-शीर्ण घरों में रहने वाले सभी बेघर लोगों को मूलभूत सुविधाओं के साथ पक्का घर उपलब्ध कराना था.

28 जुलाई 2018 को प्रधानमंत्री लखनऊ में अपने वादे को दोहराते हैं कि 2022 तक सभी को पक्का घर दिया जाएगा. उन्होंने बताया कि इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए 54 लाख घर शहरों और 1 करोड़ घर ग्रामीण लोगों के लिए सरकार ने मंजूर कर दिए हैं.

बीती 24 नवंबर को प्रधानमंत्री ने त्रिपुरा में निगम चुनाव से पहले 1.47 लाख लाभार्थियों को इस योजना की पहली किस्त जारी करते हुए पिछली सरकारों को योजनाओं में लेट-लतीफी के लिए खरी-खोटी सुनायीं. दूसरों को देरी के लिए सुनाने वाली सरकार ने 9 दिसंबर 2021 को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके बताया कि प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण का जो लक्ष्य 2022 में पूरा होना था उसे 2024 तक पूरा किया जाएगा. सरकार ने योजना की समय-सीमा को बढ़ा दिया. कई मीडिया संस्थानों ने इस खबर को लिखा कि सरकार ने योजना को 2024 तक बढ़ाया. यह पूरी तरह भ्रामक था. सरकार को मार्च 2021 तक खुद के द्वारा तय किए गए 2.95 करोड़ ग्रामीण घरों का निर्माण करना था और सरकार के अनुसार तय लक्ष्य को पूरा करने के लिए अभी 1.55 करोड़ घर और बनाए जाने है जिसके लिए सरकार ने समय सीमा को बढ़ाकर मार्च 2024 कर दिया है. सरकार द्वारा प्रेस रिलीज में कहा गया है कि 29 नवंबर 2021 तक सरकार 1.65 करोड़ घर बना चुकी है. पता नहीं किस गणित से यह हिसाब लगाया गया है. 2.95 करोड़ घरों में अगर सरकार 1.65 करोड़ घर बना चुकी है तो फिर 1.55 करोड़ क्यों बना रही है क्योंकि 2.95 करोड़ में 1.65 करोड़ घटाने पर 1.30 करोड़ घर ही बचते हैं बनाने को. अगर 1.55 करोड़ घर और बनाने है 2.95 करोड़ घरों को पूरा करने लिए तब अभी सिर्फ 1.40 करोड़ घर ही बने. फिर सरकार 1.65 घरों के निर्माण का दावा क्यों कर रही है, मतलब 25 लाख घर हवा में खड़े हैं.

लक्ष्य को पाने के लिए तीन गुना बढ़ानी होगी गति

सरकार का दावा है कि 15 अगस्त 2022 जब देश अपना 75 वां स्वतंत्रता दिवस मनाएगा तब तक 2.02 करोड़ घरों का निर्माण हो चुका होगा. 20 नवंबर 2016 से लॉन्च हुई इस योजना को 5 साल से अधिक समय हो गया है और सरकार की ही मानें तो 1.65 करोड़ घरों का निर्माण हो चुका है, यानि हर महीने औसतन 2 लाख 75 हजार घरों का निर्माण हुआ है. जबकि 15 अगस्त 2022 तक सरकार को 2.02 करोड़ में बचे हुए लगभग 35 लाख घरों का निर्माण करने के लिए औसतन हर माह 3 लाख 88 हजार घर बनाने होंगे. ये तो सरकार के अनुसार 1.65 करोड़ घर बन चुके हैं को सच मानने के बाद है और अगर अभी 1.40 करोड़ ही घर बने हैं जैसा कि हमने ऊपर बताया तो सरकार को अगस्त तक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए लगभग 6 लाख 66 हजार घर हर माह बनाने होंगे.

यही नहीं अगर सरकार अपने कहे को पूरा कर लेती है यानि 15 अगस्त 2022 तक 2.02 करोड़ घर बन जाते है फिर भी मार्च 2024 तक 2.95 करोड़ घर बनाना संभव नहीं दिखता. अगस्त 2022 से मार्च 2024 के बीच 19 महीने होंगे और सरकार के लिए 95 लाख घर बचेंगे. यानि हर महीने सरकार को लगभग 5 लाख घर बनाने होंगे जबकि सरकार की अभी तक की उच्च रफ्तार 2 लाख 75 हजार घर हर महीने रही है.

वित्त वर्ष 20-21 में काम हुआ बहुत ही धीमा

कोविड महामारी, अर्थव्यवस्था की खराब हालत, राज्यों को जीएसटी का समुचित हिस्सा न मिलना आदि ऐसे कारण हैं जो बताते हैं कि सरकार के लिए राह चाहकर भी आसान नहीं है. पिछले साल यानि वित्त वर्ष 2020-21 में सरकार सिर्फ अपने लक्ष्य के 4 प्रतिशत ही घर बना पायी. हर 100 में सिर्फ 4 घर. यह धीमी गति मंत्रालय की प्रदर्शन समीक्षा समिति (पीआरसी) के एजेंडा पेपर में उजागर हुई. यह समिति योजनाओं की प्रगति पर ध्यान और विभिन्न परियोजनाओं में रुकावटों की पहचान करने के लिए नियमित अंतराल पर बैठक करती है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जहां केंद्र ने वित्त वर्ष 2020-21 में 63 लाख 77 हजार घरों के निर्माण का वार्षिक लक्ष्य निर्धारित किया था, वहीं राज्यों ने केवल 35 लाख 57 हजार या लक्ष्य का 56% को ही स्वीकृत किया है. इनमें से सिर्फ 2,65,250 घर ही पूरे हो पाए, जो कि साल के लक्ष्य का 4.16% है.

आपको बता दें, इस योजना के अंतर्गत बजट का आवंटन 60:40 का रहता है. वही पहाड़ी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मामलों में यह 90:10 के अनुपात में रहता है. केंद्र सरकार ने पिछले साल हुई देरी के लिए महामारी के अलावा राज्यों को भी दोषी ठहराया है. केंद्र और राज्य सरकारों के बीच लक्ष्य और बजट आवंटन को लेकर समन्वय नहीं है यह बिन्दु प्रदर्शन समीक्षा समिति ने भी रेखांकित किया है.

सामाजिक न्याय भी है दांव पर

2015-16 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NHFS) के अनुसार देशभर में 57% लोग पक्के मकान में रहते हैं, 38% लोग आधे पक्के और 6% लोग कच्चे मकानों में रहते हैं. वहीं ग्रामीण इलाकों में 42% लोगों के पास पक्के मकान थे और 50% लोगों के पास आधा पक्का आधा कच्चा घर था. वहीं 8% लोग कच्चे घरों में रह रहे थे. 31% आदिवासी, 49% अनुसूचित जाति, 57% पिछड़े वर्ग, 59% मुस्लिम और 74% सामान्य वर्ग के लोगों के पास पक्के घर थे. प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण सिर्फ आर्थिक दृष्टि से ही नहीं अपितु सामाजिक न्याय की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है.

बढ़ती गरीबी के मद्देनजर योजना है अहम

इसी साल में मार्च में जारी पीयू (PEW) संस्थान की रिपोर्ट में बताया गया कि पिछले साल साढ़े 7 करोड़ भारतीय गरीबी में चले गए. इसी के आधार पर दुनिया में बढ़ी गरीबों की जनसंख्या में 60% भारत का योगदान है. भूखमरी की रिपोर्ट में भी भारत का प्रदर्शन गिरा है, जिसमें अपने पड़ोसी बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका से भी पीछे है. महामारी के जारी रहने से सफर और भी मुश्किल हो गया है.