शनिवार, 04 फ़रवरी 2023
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पेट्रोल और डीजल की इतनी अधिक कीमतों की असली वजह है कम कॉर्पोरेट टैक्स



चार्ट के माध्यम से ये साफ़ देखा जा सकता है कि केंद्र सरकार का टैक्स से आने वाला राजस्व जीडीपी के अनुपात में लगातार कम होता जा रहा है. 2007-08 के बीच ये जीडीपी का 12.11 % था जो कि इसकी अब तक की सर्वाधिक दर रही है. वही अगर 2020-21 की बात करें तो जीडीपी के मुक़ाबले टैक्स राजस्व का अनुपात घटकर हो गया 10.25%.

व्हाट्सएप फॉरवर्ड्स के बीच जो होता है, असल में वही जीवन है. कल शाम मेरे एक स्कूल दोस्त ने अपना एक सवाल मुझे व्हाट्सएप पर भेजा जिसको लेकर वो संशय में था. दरअसल वो जानना चाहता था कि कहीं पेट्रोल – डीजल के दाम बढ़ने के पीछे एक दशक पहले UPA सरकार द्वारा ज़ारी किए गए वो तेल ऋण पत्र (आयल बॉन्ड्स) तो नहीं जो मोदी सरकार को अबतक चुकाने पड़ रहें हैं.

इन आयल बॉन्ड्स को चुकाने के लिए सरकार को चाहिए पैसे. सरकार ने ये पैसा जुटाने के लिए पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले टैक्स को बढ़ा दिया है जिसकी वजह से तेल के दाम आसमान छू रहें हैं.

ऊपर दी गई दलील आपको कितनी भी सही लगे मगर हक़ीकत में ऐसा बिल्कुल नहीं है. यह दलील 100 प्रतिशत गलत है.

हालांकि मुझे नहीं लगता मेरे कहने से लोग समझेंगे क्योंकि जब भी पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ते हैं, इस तरह की दलीलें व्हाट्सएप पर फिर से चलने लगती हैं.
देश के कई हिस्सों में इस वक़्त पेट्रोल की कीमतें 100 रूपए/लीटर से अधिक है. इन बढ़ी हुई कीमतों का कारण है केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल पर बढ़ाया गया उत्पाद शुल्क. दरअसल सरकार की कॉर्पोरेट टैक्स के रूप में होने वाली कमाई कम हो गई है, इसलिए पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क बढ़ाकर सरकार इस घाटे की पूर्ति कर रही है.

इसका मतलब यह है कि आपकी और मेरी जेब पर पड़ने वाली तेल की मार का कारण है सरकार द्वारा घटाए गया कॉर्पोरेट टैक्स.
आइए पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतों के इस खेल को थोडा विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं.

1)पिछले साल के मुक़ाबले इस साल कच्चे तेल के दाम बढ़े हैं. जून 2020 में कच्चे तेल की कीमत $40.63 प्रति बैरल थी. वही 16 जून 2021 को कच्चे तेल की कीमत $73.18 प्रति बैरल हो गई. इस से साफ़ होता है कि पेट्रोल डीजल के बढ़ते दामों के पीछे कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं. मगर भारत में महंगे होते पेट्रोल डीजल के पीछे न तो ये एकमात्र वजह है और न ही ये कोई प्रमुख वजह है.

2) इससे पहले, हम किसी और चीज़ में उलझें, आइए आयल बॉन्ड्स को समझते हैं. ये बॉन्ड्स भूतपूर्व UPA सरकार द्वारा तेल कम्पनियों (इंडियन आयल, भारत पेट्रोलियम, हिंदुस्तान पेट्रोलियम) को ज़ारी किए गए थे ताकि ये कम्पनियां अपना घाटा पूरा कर सकें. अर्थात लागत से कम दामों पर पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस आदि बेचने पर इन कम्पनियों को जो घाटा हुआ वो इन्होंने सरकार के द्वारा मिले आयल बॉन्ड्स से पूरा कर लिया. ये प्रक्रिया 2009-2010 तक चलती रही. आधिकारिक तौर पर इन बॉन्ड्स को तेल कम्पनियों को नकद सब्सिडी के बदले दी जाने वाली विशेष आर्थिक सुरक्षा के तौर पर देखा जाता है.

तेल कम्पनियों द्वारा दी जा रही सब्सिडी के बदले सरकार ने उनको तुरंत प्रभाव से नकदी के रूप में आर्थिक सहायता देने की बजाय आयल बॉन्ड्स दिए. इन आयल बॉन्ड्स का कम्पनियों ने सरकार को सालाना ब्याज देना था और जब बॉन्ड की अवधि पूरी हो जाती.

ऐसा कर के सरकार ने अपने सालाना ख़र्च को बढ़ने से रोक लिया, जिससे राजकोषीय घाटे को भी सरकार संभालने में कामयाब हो गई. सरकार की कमाई और ख़र्च के बीच के अंतर को राजकोषीय घाटा कहते है.

3) ज़ाहिर है आने वाले समय में इन बॉन्ड्स की अवधि पूरे होने पर वर्तमान सरकार को ये चुकाने थे और उसके लिए सरकार को पैसों की ज़रूरत भी पड़नी थी.

अब सवाल आता है कि सरकार को कितनी कीमत के बॉन्ड चुकाने बाकी है? दिसंबर 2018 में राज्य सभा में इस विषय को लेकर पूछे गए एक प्रशन के जवाब में सरकार ने बताया था कि उनको आयल बॉन्ड्स के रूप में 1.30 लाख करोड़ रूपए चुकाने बाकी है.
नीचे दी गई टेबल में पूरी जानकारी है कि सरकार को कितनी कीमत का बॉन्ड कब चुकाना है, इसपर एक नज़र डालिए.

टेबल में दिए गए डाटा से हम देख सकतें हैं कि मार्च 2020 तक सरकार के पास आयल बॉन्ड्स के रूप में 1,30,923 करोड़ रूपए चुकाने बाकी थे. यानी की सरकार ने राज्य सभा में दिसंबर 2018 में दिए गए अपने जवाब में जितना पैसा बकाया बताया था, मार्च 2021 में भी वह उतना ही है.

4) वास्तव में मोदी सरकार के दौर में आयल बॉन्ड्स का जो पैसा सरकार पर बकाया था उसमे कोई बदलाव नहीं आया है अर्थात सरकार ने अबतक कोई पैसा आयल बॉन्ड्स के रूप में नहीं चुकाया है.

मार्च 2014 में आयल बॉन्ड्स का बकाया था 1,34,423 करोड़ रूपए. 17,50 करोड़ रूपए प्रति बॉन्ड के हिसाब से 2 बॉन्ड की अवधी साल 2015 में ही पूरी हो गई जो मनमोहन सरकार ने चूका दिए. इसके बाद मोदी सरकार पर आयल बॉन्ड्स का बकाया 1,34,423 करोड़ से घटकर 1,30,923 करोड़ रूपए ही रह गया जो अभी भी बना हुआ है.

इससे यह सिद्ध होता है कि वर्तमान सरकार ने मार्च 2015 से आयल बॉन्ड्स का एक पैसा नहीं चुकाया है. हालांकि सरकार इन बॉन्ड्स पर सालाना ब्याज़ अभी भी चूका रही है.

आयल बॉन्ड्स पर सरकार को सालाना कितना ब्याज़ चुकाना पड़ रहा है? इसके जवाब में सरकार ने दिसम्बर 2018 में राज्य सभा में जानकारी दी कि उनको हर साल 9,989.6 करोड़ रूपए आयल बॉन्ड्स के ब्याज़ के रूप में चुकाने पड़ रहें हैं.

पिछले तीन सालों में आयल बॉन्ड्स की बकाया राशि में किसी तरह की कोई तब्दीली नहीं हुई है. 2015 से लेकर 2018 तक सरकार ने जो ब्याज इन आयल बॉन्ड्स पर चुकाया है, वही ब्याज सरकार पिछले तीन सालों से चुकाती आ रही है.

चालू वित्तीय वर्ष में आयल बॉन्ड्स को लेकर स्तिथि क्या है? टेबल में दिखाए गए डाटा के अनुसार वित्तीय वर्ष 2021- 22 के अंत में सरकार को कुल 10 हज़ार करोड़ के 2 आयल बॉन्ड्स क्रमशः अक्टूबर और नवम्बर महीने में चुकाने हैं.

इसके अतिरिक्त बकाया बॉन्ड्स की ब्याज़ राशि भी सरकार को चुकानी है. अभी सरकार को Rs 9,989.96 करोड़ सालाना ब्याज के रूप में चुकाने पड़ते हैं, चूँकि 10 हज़ार करोड़ के 2 बॉन्ड्स सरकार इस साल के अंत में चूका देगी तो सालाना ब्याज़ राशि भी पहले के मुक़ाबले कम हो जाएगी.

यानी कि सरकार को साल 2021-22 में बकाया आयल बॉन्ड्स और ब्याज राशि चुकाने के लिए Rs 19,500 करोड़ की आवश्यकता होगी और सरकारी लेनदेन के लिहाज से ये रक़म सरकार के लिए कोई बहुत बड़ा बोझ नहीं है.

5) यदि हम पेट्रोलियम पदार्थों से उत्पाद शुल्क के रूप में सरकार को होने वाली कमाई की बात करें तो साल 2014-15 में मोदी सरकार ने Rs 99,068 करोड़ की कमाई की थी.

यही नहीं, साल-दर-साल पेट्रोल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क से सरकार को होने वाली कमाई में ज़बरदस्त इज़ाफा हुआ है. वित्तीय वर्ष 2020-21 में अप्रैल से लेकर दिसंबर महीने तक सरकार ने पेट्रोल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क से Rs 2,35,811 की कमाई की है. इस रफ़्तार से यदि उत्पाद शुल्क की वसूली जारी रही तो चालू वित्तीय वर्ष के अंत तक इस से होने वाली सरकारी कमाई Rs 3,00,000 करोड़ से अधिक हो जाएगी.
इस साल के बजट में भी सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले अलग अलग शुल्कों से 2.75 लाख करोड़ रूपए कमाई करने का अनुमान लगाया है. सरकार के इस अनुमान को देखकर आसानी से कहा जा सकता है कि पेट्रोलियम पदार्थों पर लगने वाले उत्पाद शुल्क से सरकार की सालाना कमाई 3 लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर लेगी.

मार्च 2014 में पेट्रोल और डीजल पर लगने वाला कुल उत्पाद शुल्क क्रमशः 10.38 रूपए/लीटर और 4.52 रूपए/लीटर था जो 2 फ़रवरी 2021 को बढ़कर पेट्रोल पर 32.90 रूपए/लीटर और डीजल पर 31.80 रूपए/लीटर हो गया.

अप्रैल महीने में पिछले साल के मुक़ाबले पेट्रोल की कीमतों में 10 रूपए और डीजल की कीमतों में 13 रूपए प्रति लीटर का इज़ाफा दर्ज़ किया गया है. इस से मोदी सरकार के सत्ता में आते ही पेट्रोलियम पदार्थों पर लगने वाले उत्पाद शुल्क में निरंतर होती बढ़ोतरी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

6) तेल के बढतें दामों के पीछे एक और कारण है – इस पर राज्य सरकारों द्वारा वसूला जाने वाला शुल्क. इसको समझने के लिए निचे दी गई टेबल के साहरे दिल्ली में बेचे गए पेट्रोल के विवरण पर नज़र डालते हैं. 16 जून के रिकॉर्ड के मुताबिक भारत पेट्रोलियम ने डीलर को 37.68 रूपए/लीटर के हिसाब से पेट्रोल बेचा. इसके ऊपर केंद्र सरकार ने 32.90 रूपए/लीटर के हिसाब से उत्पाद शुल्क वसूल किया. इसके अलावा डीलर ने भी 3.80 रूपए/लीटर के हिसाब से अपना कमीशन वसूला. उसके बाद दिल्ली सरकार ने भी 30% प्रति लीटर के हिसाब से इसके ऊपर मूल्यवर्धित कर (VAT) वसूल किया. इन सब को जोड़कर एक लीटर पेट्रोल की कीमत हुई 96.70 रूपए/लीटर.

दिल्ली सरकार की ही तरह अन्य राज्य सरकारें भी पेट्रोल डीजल पर VAT वसूलती हैं, हालांकि हर राज्य में लगने वाले VAT की दर अलग- अलग होती हैं. यही कारण है कि पेट्रोल डीजल के दाम हर जगह एक समान नहीं होते. यदि डीलर को तेल मिलने वाले दाम में इज़ाफा होता है तो राज्य सरकारों के द्वारा वसूले जाने वाले VAT में भी बढ़ोतरी होती है.

पेट्रोलियम कंपनी द्वारा डीलर को जिस दाम पर एक लीटर तेल बेचा गया है, एक लीटर पर केंद्र सरकार ने जितना उत्पाद शुल्क वसूल किया है, डीलर का प्रति लीटर कमीशन – इन सब को जोड़ने के बाद जो कुल राशि आती है, राज्य सरकारें उसके ऊपर VAT वसूलती हैं.
इसको अगर बारिकी से समझा जाए तो पता लगता है कि देश की जनता तेल पर टैक्स के ऊपर टैक्स या कहें कि दोहरा टैक्स चूका रही है. सरकारों को इसको दुरुस्त करना चाहिए ताकि जनता पर कम बोझ पड़े. इसके लिए राज्य सरकारों को केवल प्रति लीटर तेल के दाम और डीलर कमीशन को मिलाकर बनने वाली कुल राशि पर VAT वसूलना चाहिए, केंद्र सरकार द्वारा वसूले जाने वाले उत्पाद शुल्क को इस से बाहर रखना चाहिए.

7) केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोलियम पदार्थों पर इतनी अधिक मात्र में लगाए गए उत्पाद शुल्क का मुख्य कारण है सरकार का टैक्स के रूप में आने वाले राजस्व में सकल घरेलु उत्पाद (GDP)के अनुपात में आती निरंतर गिरावट.

निचे दिया गया चार्ट सरकार को टैक्ससे आने वाले कुल राजस्व को जीडीपी के अनुपात में दर्शाता है.

चार्ट के माध्यम से ये साफ़ देखा जा सकता है कि केंद्र सरकार का टैक्स से आने वाला राजस्व जीडीपी के अनुपात में लगातार कम होता जा रहा है. 2007-08 के बीच ये जीडीपी का 12.11 % था जो कि इसकी अब तक की सर्वाधिक दर रही है. वही अगर 2020-21 की बात करें तो जीडीपी के मुक़ाबले टैक्स राजस्व का अनुपात घटकर हो गया 10.25%.

जीडीपी के अनुपात में इस घटते टैक्स राजस्व के पीछे एक बड़ा कारण है सरकार की कॉर्पोरेट टैक्स के रूप में होने वाली कमाई में गिरावट. साल 2017-18 में जीडीपी के अनुपात में कॉर्पोरेट टैक्स राजस्व था 3.34% जो साल 2020-21 में घटकर रह गया केवल 2.32%. बावजूद इसके कम्पनियों ने चालू वित्तीय वर्ष में अपनी कमाई में बम्पर इज़ाफा दर्ज़ किया.

कॉर्पोरेट टैक्स के रूप में घटते राजस्व के पीछे मुख्य कारण है केंद्र सरकार द्वारा कम्पनियों के लिए बेस टैक्स रेट में भारी कटौती करना. सितम्बर 2019 में केंद्र सरकार ने कम्पनियों के कॉर्पोरेट टैक्स में बदलाव करते हुए बेस टैक्स रेट को 30% से घटाकर 22% कर दिया था. यह ही नहीं, सरकार ने नई विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) कम्पनियों के लिए इसको 25% से घटाकर 15% कर दिया था.

साल 2019-20 में कॉर्पोरेट टैक्स से सरकार की कमाई हुई थी 5.57 लाख करोड़ रूपए जो साल 2020-21 में घटकर हो गई 4.57 लाख करोड़ रूपए. ये सब हुआ सरकार द्वारा कॉर्पोरेट टैक्स की दरों में कटौती करने से. इसे यदि साफ़ शब्दों में समझना हो तो ये कहना बिलकुल ग़लत नहीं होगा कि कॉर्पोरेट टैक्स कम होने की वजह से सरकार को जो घाटा हुआ है उसकी भरपाई जनता अपनी जेब से पेट्रोल डीजल पर टैक्स देकर कर रही हैं.

सरकार की आमदनी घटती- बढ़ती रहती है मगर ख़र्च साल-दर-साल बढ़ता ही जाता है. ज़ाहिर है इस साल ख़राब अर्थ्वाव्स्था के चलते सरकार की आमदनी घटेगी और उसके अनुपात में ख़र्च बढेगा.

कुल मिलाकर अंत में इस बात से कतई इंकार नहीं किया जाना चाहिए कि सरकार की कमाई और उसके ख़र्चे के बीच का जो अंतर है वो अक्सर जनता की जेब से ही भरा जाता है. आगे भी ऐसा होने के सम्पूर्ण आसार नज़र आ रहें हैं.

Vivek Kaul is a widely published economic commentator. He is also the author of five books. His fifth book Bad Money—Inside the NPA Mess and How It Threatens the Indian Banking System, has just been released. He is also the author of the Easy Money trilogy.