मंगलवार, 07 फ़रवरी 2023
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अब हरियाणा में विश्वविद्यालयों को अनुदान की बजाय लोन देगी सरकार !


The Chief Minister of Haryana, Shri Manohar Lal calling on the Prime Minister, Shri Narendra Modi, in New Delhi on October 30, 2019.

"अब सभी सरकारी विश्वविद्यालय सरकार की तरफ अनुदान के लिए आस न लगाए बल्कि कर्ज लेने के लिए सरकार को निवेदन करें. थोड़े ही समय बाद विश्वविद्यालयों के ऊपर कर्जा बता कर विश्वविद्यालयों को धनकुबेरों को बेच दिया जाएगा"

हरियाणा सरकार के वित्त विभाग ने 29 अप्रैल 2022 को हरियाणा के विश्वविद्यालयों को 147.75 करोड़ के लोन का नोटिफ़िकेशन जारी किया. इस से पहले सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को सरकार की तरफ से अनुदान दिया जाता था. यह पहली बार है जब सरकार ने अनुदान की बजाय लोन दिया है. यह लोन एक प्रकार का कर्ज़ है जो बाद में विश्वविद्यालयों को चुकाना होगा.

किस विश्वविद्यालय को कितना लोन मिला

1. महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक को 23 करोड 75 लाख रुपए

2. कुरुक्षेत्र विषविद्यालय, कुरुक्षेत्र को 59 करोड़ रुपए

3. चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय, सिरसा को 10 करोड़ रुपए

4. चौधरी बंसी लाल विश्वविद्यालय, भिवानी को 10 करोड़ रुपए  

5. महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय, कैथल को 8.75 करोड़ रूपए

6. भगत फूल सिंह महिला विश्वविद्यालय, खानपुर कलाँ, सोनीपत को 12.50 करोड़  

7. इन्दिरा गांधी विश्वविद्यालय,मीरपुर, रेवाड़ी को 4.50 करोड़ रुपए  

8. गुरुग्राम विषविद्यालय, गुरुग्राम को 6.50 करोड़ रुपए

9. चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय जींद को 5.50 करोड़ रुपए

10. डॉ भीमराव अंबेडकर नेशनल लॉं विश्वविद्यालय, सोनीपत को 7.25 करोड़ रुपए



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वित्त विभाग द्वारा जारी नोटिफ़िकेशन



कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में प्रोफेसर डॉ अशोक चौहान ने गाँव सवेरा को बताया , “कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में चल रहे आर्थिक संकट की वजह से पिछले दो महीने से टीचर्स को सैलरी भी नहीं मिली है. विश्वविद्यालय में होने वाले सेमिनार भी विभाग की तरफ से करवाए गए हैं. सेमिनार के खाने, स्टेशनरी, आदि के पैसे भी वेंडर को नहीं दिये गए हैं. बिल बनाकर भेज दिये गए हैं लेकिन अभी तक पैसे नहीं मिले हैं. सेमिनार के लिए जो गेस्ट हाउस बूक करवाए गए थे उनकी भी पेमेंट अभी तक नहीं हुई है.”

आगे उन्होंने बताया, “इस संकट से निपटने के लिए विश्वविद्यालय ने बजट पास करके सरकार के पास भेज दिया था जो अभी तक नहीं मिला है. लोन के नाम से यह कर्ज जरूर मिला है. सरकार की तरफ से निर्देश है कि जितना बजट सरकार के पास भेजा था उसमें से भी 100 करोड़ कम ही दिया जाएगा. कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय को अपनी जरूरत का सिर्फ 70% बजट ही सरकार से मिलता था जिसे बाद में कम करके 60% कर दिया गया. बाकी सारा खर्चा विश्वविद्यालय को खुद ही निकालना होता है.”

साल 2017 में शिक्षा मंत्रालय और कैनरा बैंक के बीच एक समझौते के तहत hefa का निर्माण किया गया. Hefa का मतलब है higher education financing agency. यह agency भी लोन देने के लिए ही बनाई गई है.

2018 में यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) ने देश के 62 उच्च शिक्षण संस्थानों को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान की थी. छात्र संगठन तभी से कह रहे हैं कि यह स्वायत्ता सिर्फ फ़ंड से बचने की है. सरकार चाहती है कि शिक्षण संशथान अपना खर्चा खुद चलाएं और बाकी सब कुछ सरकार नियंत्रित करती रहे.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के पाइंट न 26.6 में लिखा हुआ है, “कोई भी सार्वजनिक संस्थान शैक्षिक अनुभवों को बढ़ाने के लिए निजी परोपकारी धन जुटाने की दिशा में पहल कर सकता है.” आखिर इसका क्या मतलब है? क्या सरकार फ़ंड नही देगी?

कैसे कमाते हैं विश्वविद्यालय

  1. सेल्फ फ़ाइनेंस स्कीम के कोर्स शुरू करके , यह ऐसे कोर्स हैं जिनका सारा खर्चा छात्र ही उठाते हैं, सरकार इनके लिए कोई ग्रांट नहीं देती. इनकी फीस 50 हजार रुपए से एक लाख रुपए तक होती है. आने वाले समय में यह फीस और भी बढ़ सकती है.
  2. दूरस्थ शिक्षा यानि कि डिस्टेन्स एजुकेसन, इस योजना से विश्वविद्यालय करोड़ों कमाते हैं. इसमें सप्ताह में सिर्फ एक दिन क्लास लगती हैं. न ही स्थायी शिक्षक विश्वविद्यालय को रखने पड़ते. इन कोर्सों की फीस रेगुलर कोर्स से भी ज्यादा होने लगी है.
  3. एग्जाम फीस : एग्जाम फीस से भी विश्वविद्यालय पैसा कमाते हैं. सरकार की ओर से ग्रांट न मिलने पर विश्वविद्यालय मनमर्जी से फीस बढ़ाते हैं. महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय ने तो इस तरह की फीस दो से ढाई गुना तक पहले ही बढ़ा दी है जिसके खिलाफ विश्वविद्यालय के छात्र छात्राएँ पिछले बारह दिन से धरने पर बैठे हुए हैं.

विश्वविद्यालयों की आय का मुख्य जरिया सरकार से मिलने वाला अनुदान यानि कि ग्रांट है. अगर सरकार यह ग्रांट नहीं देती है तो विश्वविद्यालय अपना खर्चा अलग अलग तरह की फीस बढ़ोत्तरी करके पूरा करेंगे जिसका सारा बोझ छात्र छात्राओं पर पड़ेगा.

महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय शिक्षक संघ एवं हरियाणा फेडरेशन आफ यूनिवर्सिटी एंड कॉलेज टीचर ऑर्गेनाइजेशन (HFUCTO) के प्रधान डॉ विकास सिवाच ने प्रैस बयान जारी करते हुए कहा, “सरकार ने सारी हद पार करते हुए विश्वविद्यालयों को अनुदान देने की बजाय कर्ज की प्रथा शुरू कर दी है. अब सभी सरकारी विश्वविद्यालय सरकार की तरफ अनुदान के लिए आस न लगाए बल्कि कर्ज लेने के लिए सरकार को निवेदन करें. थोड़े ही समय बाद विश्वविद्यालयों के ऊपर कर्जा बता कर विश्वविद्यालयों को धनकुबेरों को बेच दिया जाएगा. सरकारी विश्वविद्यालयों की स्थापना उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए की गई थी ताकि गरीब से गरीब का बच्चा उच्च शिक्षा प्राप्त करके अपने जीवन को सुधार सके ताकि देश की दिशा और दशा को सुधारा जा सके. क्या किसी ने कल्पना भी की थी कि सरकारी विश्वविद्यालय कर्ज लेकर चलेंगे? यूजीसी तथा तथा तमाम फंडिंग एजेंसीज पहले ही रिसर्च के काम के लिए फंडिंग बंद कर चुकी हैं. देश में शिक्षा खास तौर पर उच्च शिक्षा का लगातार स्तर गिर रहा है.”

डॉ विकास सिवाच ने सभी से अपील की है कि एकजुट होकर सरकार के इन अलोकतांत्रिक तथा निचले सत्र की कार्यशैली का विरोध करें और शिक्षा खासकर उच्च शिक्षा को बचाएं ताकि आने वाली नस्लें उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें. वह आगे की रणनीति के लिए जल्द ही महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय शिक्षक संघ और HFUCTO की तरफ से जनरल बॉडी मीटिंग (GBM) का आह्वान करने वाले हैं.