कॉरपोरेट कब्जे से गांव-किसान को बचाने का आखिरी मौका

 

खेती को कॉरपोरेट के हवाले करने वाले कृषि अध्यादेश एवं उन पर बने कानूनों के विरोध की पहली सालगिरह पर उन सभी साथियों को बधाई जिनके संघर्ष के कारण खेती और गांव बचने की उम्मीद अभी भी जिन्दा है।

सुप्रीम कोर्ट, संसद भवन, विज्ञान भवन, टीवी चैनल, विदेशी अखबारों से लेकर खेतों की पगडंडियों तक इन कानूनों पर हुई बहसों के बाद यह तो निश्चित है ये कानून दुनिया के सबसे अधिक विवादित कानूनों में शामिल हैं। दिल्ली की सड़कों पर  खुले आसमान के नीचे सर्दी, गर्मी, बरसात और कोरोना की दोनों लहरों को झेलते हुए लाखों किसानों के आंदोलन के बाद भी यदि यह आंदोलन भारत की अर्थव्यवस्था और उसकी संस्कृति बचाने का आंदोलन नहीं बन पाया है तो इसकी जिम्मेदारी उन राजनीतिक दलों और स्वतंत्र मीडिया की है जो भाजपा की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था तथा खेती पर कॉरपोरेट के नियंत्रण के विरोध का दावा करते हैं।

इस आंदोलन को समाप्त करने के लिए भाजपा के पास जितने भी औजार थे वो सब इस्तेमाल कर लिए हैं। कॉरपोरेट व भाजपा को पता है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और समाज पर नियंत्रण के विरोध में किया जाने वाला यह आखिरी प्रतिरोध है, यदि 65% आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले किसान जिनके पास आंदोलन चलाने के जीवट के साथ ही भोजन सहित अन्य आवश्यक संसाधन जुटाने की सामर्थ्य भी हो, उनके असफल होने के बाद शायद ही कोई अन्य वर्ग/संगठन आंदोलन करने की हिम्मत जुटा पाएगा।

खेती पर कॉरपोरेट के नियंत्रण के दूरगामी प्रभाव को दूसरे देशों खासकर अमेरिका के उदाहरण से समझा जा सकता है, जहां 1970 के दशक में सरकार ने पारिवारिक खेती की बजाय कॉरपोरेट के नियंत्रण वाली औद्योगिक खेती को प्रोत्साहित किया, जिससे वहां न केवल फसलों की विविधता समाप्त हो गई, पारिवारिक फार्म उजड़ गए बल्कि सरकार को खेती करने के लिए कॉरपोरेट को अधिक सब्सिडी भी देनी पड़ी।

खेती पर कॉरपोरेट के नियंत्रण के बाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था कैसे प्रभावित होगी उसे पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 60-70 के दशकों में किसान परिवारों में जन्मे व्यक्ति आसानी से समझ सकते हैं। हरित क्रांति से देश भले ही खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गया है लेकिन उसने जहां एक ओर किसानों को कर्जदार बनाया है वहीं फसलों की विविधता समाप्त कर कृषि भूमि एवं वातावरण को प्रदूषित कर दिया है।

औद्योगिक खेती केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था ही नहीं समाज को प्रभावित करती है इसे समझने के लिए गन्ने की खेती अच्छा उदाहरण है। सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति (एमएसपी) के माध्यम से गन्ने की फसल को अन्य फसलों से अधिक लाभकारी बनाया क्योंकि उससे किसानों की तुलना में चीनी मिल मालिकों का अधिक लाभ होता है। कृषि भूमि के 90% भाग पर गन्ने की खेती होने से समाज में आर्थिक एवं सामाजिक संबंधों में परिवर्तन हुए। केवल गन्ने की खेती होने से गांवों में ‘फसलाना’ व्यवस्था समाप्त हो गई जिससे गांवों में रहने वाले दस्तकार लुहार, धोबी, बढ़ई, नाई आदि समुदायों के साथ लेन-देन नगदी में बदल गया। कपास, सरसों, मक्का आदि की खेती बंद होने से उस पर आधारित दस्तकारों जैसे जुलाहे, धोबी, तेली, लुहार, बढ़ई आदि बेरोजगार हो गए। मजबूरी में उन्हें जीवनयापन के लिए शहरों का रूख करना पड़ा।

गन्ने की पैदावार बढ़ाने के लिए जहां एक और कर्ज लेकर मशीनें खरीदी वहीं दूसरी ओर रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों के अधिक प्रयोग ने जमीन की उर्वरता घटाई। और जब किसान गन्ने की फसल पर आधारित हो गए तब चीनी मिलों ने ना केवल भुगतान करने में देरी की बल्कि सरकार पर गन्ना मूल्यों में बढ़ोतरी न करने का दवाब बनाने में भी सफल रहे, जिसके कारण आज किसान घाटे में भी गन्ने की खेती करने के लिए मजबूर हैं।

आश्चर्य की बात है कि कॉरपोरेट ताकतों के खिलाफ यह लड़ाई किसान अकेला लड़ रहा है जबकि इसका सबसे अधिक नुकसान मजदूरों, छोटे व्यापारियों एवं उपभोक्ताओं का होने जा रहा है। व्यापारी वर्ग थोक एवं खुदरा व्यापार में आने वाली कम्पनियों अमेजन, वालमार्ट और रिलायंस जैसे कॉरपोरेट का तो विरोध करता है लेकिन खाद्यान्न उत्पादन और कृषि व्यापार पर कॉरपोरेट कब्जे के विरोध शतुरमुर्गी नीति अपनाए हुए है।

समाज के विभिन्न वर्गों को समझ लेना चाहिए कि पूंजीवादी व्यवस्था का किसी से कोई रिश्ता नहीं होता। उसका उद्देश्य केवल मुनाफा और अधिक मुनाफा कमाना होता है। कॉरपोरेट समर्थक इन कृषि कानूनों की बरसी पर हमें आने वाले संघर्ष की ऊर्जा के लिए ग्रामीण भारत के दो सबसे बड़े पैरोकार महात्मा गांधी तथा चौधरी चरण सिंह के विचार ‘भारत की आत्मा गांवों में निवास करती है’ तथा ‘हिन्दुस्तान की तरक्की का रास्ता खेत-खलिहानों से होकर गुजरता है’ को अवश्य स्मरण कर लेना चाहिए।

सत्ता प्राप्ति के लिए कॉरपोरेट की सारथी बनी भाजपा को याद रखना चाहिए की कॉरपोरेट व्यवस्था का पहला निशाना ग्रामीण अर्थव्यवस्था और समाज होगा। उसके विघटन के बाद आत्मा तो निकल जाएगी और उनके शासन करने के लिए ‘भारत’ का केवल शरीर मात्र ही बचेगा। भाजपा से इतर विपक्षी पार्टियों के लिए भी यह अंतिम अवसर है क्योंकि इसके बाद वो समाज और उसके मुद्दे ही नहीं बचेंगे जिसके आधार पर प्रजातंत्र चलता है, यदि कुछ बचेगा तो कॉरपोरेट जो संसाधनों के बल पर सत्ता दिला तो देते हैं लेकिन कीमत भी पूरी वसूल करते हैं।

इस कॉरपोरेट विरोधी आन्दोलन को जीतने तक लड़ने का संकल्प लेने वाले बहादुरों को सलाम एवं शुभकामनाएं।