किसान को नकद मदद चाहिए, ‘डिरेगुलेशन’ का झुनझुना नहीं

 

हमारे किसानों को स्वतंत्र करें। वो कोविड-19 के प्रभाव को कम करने में मददगार साबित हो सकते हैं। यहां पर स्वतंत्र करने का मतलब है कि उनकी सप्लाई चेन की रुकावटों को दूर किया जाए। जी हां, वही ‘सप्लाई चेन’ जिसका उल्लेख प्रधानमंत्री जी ने 12 मई को दिए अपने भाषण में 9 बार किया था। इसके बाद, वित्त मंत्री ने ‘फार्म-गेट इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए 1 लाख करोड़ रु. के एग्री इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड’ तथा आवश्यक वस्तु अधिनियम एवं एपीएमसी एक्ट में संशोधन के लिए एक ‘लीगल फ्रेमवर्क’ के निर्माण की घोषणा की। कागजों पर देखें, तो ये सही दिशा में उठाए गए साहसी कदम मालूम पड़ते हैं, लेकिन आज फैली महामारी के संदर्भ में इनसे किसानों को कोई राहत नहीं मिलेगी।

कृषि सेक्टर में जान फूंकने का मौजूदा सरकार का पिछला रिकॉर्ड काफी निराशाजनक रहा है। साल 2004-05 से 2013-14 के बीच भारत की औसत कृषि जीडीपी वृद्धि 4 प्रतिशत थी, जो 2014-15 से 2018-19 के बीच गिरकर 2.9 प्रतिशत रह गई।

कृषि देश का सबसे बड़ा निजी क्षेत्र है, लेकिन केंद्र सरकार ने अनेक पाबंदियां लगाकर कृषि क्षेत्र को पूरी क्षमता का इस्तेमाल करने से रोक रखा है। कृषि को नियंत्रित करने की मानसिकता दो ऐतिहासिक कारणों से है। पहला, जब तक हरित क्रांति ने हमें आत्मनिर्भर नहीं बनाया, तब तक भारत खाद्यान्न के लिए विकसित देशों पर निर्भर था। हमारे किसान सूखा, बारिश जैसी हर चुनौती का सामना करते हैं फिर भी हर साल खाद्यान्न उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है। अनाज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) सरकार का दायित्व है, ताकि किसानों को ‘कृषि उत्पादन व उत्पादकता में वृद्धि’ होने पर भी स्थिर व उचित दाम मिल सके।

दूसरा, भारत की राजनैतिक अर्थव्यवस्था में किसानों को उचित दाम 1960 के बाद एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया क्योंकि बड़े किसान राजनैतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो चुके थे। किसानों ने अपनी नवअर्जित राजनैतिक शक्ति का उपयोग सरकारी हस्तक्षेप से ऊंचे व ज्यादा स्थिर दाम पाने के लिए किया, जिससे भारत दुनिया में खाद्यान्न का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन गया। इस प्रकार सालों से खाद्यान्न आयात करने की भारत की समस्या का अंत हुआ। हमारे लिए रिकॉर्ड स्तर पर खाद्यान्न का उत्पादन गर्व की बात है क्योंकि इसके साथ इतिहास जुड़ा हुआ है। किसी भी कृषि रिपोर्ट में सरकार सबसे पहले इसी का उल्लेख करती है।

खेत से लेकर खाने की मेज तक कृषि सेक्टर पर वास्तविक नियंत्रण सरकार के हाथ में है। प्रतिबंधात्मक स्वामित्व, लीज़ एवं टीनेंसी कानून के रूप में सरकार का पूरा ‘कैपिटल कंट्रोल’ है। अपनी जमीन निजी लोगों को बेचने या किराये पर देने में किसान के सामने कई बाधाएं हैं। खाद-बीज के दाम और पानी-बिजली पर सब्सिडी पर सरकारी नियंत्रण के रूप में सरकार का ‘इनपुट कंट्रोल’ रहता है। कृषि उपकरणों एवं कलपुर्जों पर जीएसटी भी एक तरह का नियंत्रण ही है।

आवश्यक वस्तु अधिनियम कृषि उत्पाद का मूल्य और मात्रा को नियंत्रित करता है। एपीएमसी एक्ट कृषि उपजों की खरीद-फरोख्त की ऐसी व्यवस्था है, जिसमें एकाधिकार, बिचौलिये और कमीशनबाजी हावी है। दुनिया के साथ भारत के किसानों के स्वतंत्र व्यापार को बाधित करने के लिए अनेक व्यापारिक प्रतिबंध हैं।

किसानों के कल्याण के लिए काम करने वाले अनेक विशेषज्ञ एवं नीति-निर्माताओं का मानना है कि भारतीय कृषि को धीरे-धीरे खोला जाना चाहिए। देश की आधी आबादी की आर्थिक स्थिति और पूरे देश की खाद्य सुरक्षा कृषि पर निर्भर है। इसलिए इस सेक्टर के लिए एक स्थिर व संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, न कि डिरेगुलेशन के झुनझुने की। वित्त मंत्री की हाल की घोषणाओं में न तो किसानों को स्वतंत्र करने के लिए कोई ठोस प्रगतिशील नीतिगत उपाय दिए गए और न ही किसी सुधार का रोड मैप है। इन घोषणाओं में सुर्खियां बटोरने के लिए केवल ‘पैकेज’ दिए जाने की औपचारिकता पूरी कर दी।

इसके अनेक कारण हैं। कृषि राज्य का विषय है। केंद्र सरकार ज्यादा से ज्यादा एक ‘मॉडल कानून’ बना सकती है, जिसे सभी राज्य अपनाएं। लेकिन इन्हें अपनाना है या नहीं, यह राज्यों के ऊपर है। केंद्र सरकार ने ‘लिबरलाईज़िंग लैंड लीज़ मार्केट्स एंड इंप्लीमेंटेशन ऑफ मॉडल एग्रीकल्चरल लैंड लीज़ एक्ट, 2016’ पारित करके ऐसा किया भी था। लेकिन यह कानून सत्ताधारी दल के नेतृत्व वाले राज्यों सहित बहुत कम राज्यों ने अपनाया। इसलिए ‘कैपिटल कंट्रोल’ हटाए जाने का उपाय सफल नहीं हो सका।

कृषि वस्तुओं की मार्केटिंग भी राज्य का विषय है। ‘केंद्र सरकार द्वारा किसान को अपना उत्पाद आकर्षक मूल्य में बेच पाने के पर्याप्त विकल्प प्रदान करने के लिए एक कानून बनाए जाने’ तथा ‘स्वतंत्र अंतर्राज्यीय व्यापार की बाधाओं’ को दूर किए जाने की घोषणा करते हुए, वित्तमंत्री जी यह बताना भूल गईं कि यह केवल एक मॉडल कानून होगा, जिसे अपनाना या न अपनाना राज्य के ऊपर निर्भर करेगा, जैसा कि लैंड लीज़ एक्ट में हुआ था।

केंद्र सरकार के लिए दूसरा विकल्प ‘समवर्ती सूची’ की वस्तुओं में आश्रय लिया जाना है, जिसमें ‘खाद्य सामग्री’, ‘रॉ कॉटन’, ‘रॉ जूट’ एवं ‘पशु आहार’ सूचीबद्ध हैं। उसके लिए भी संविधान के अनुच्छेद 301 के तहत एक और कानून को पारित करना होगा।

वित्तमंत्री ने घोषणा की है कि किसानों को प्रोसेसर्स, एग्रीगेटर्स, बड़े रिटेलर्स, एक्सपोर्टर्स आदि से जुड़ने के लिए एक सुविधाजनक कानूनी ढांचा बनाया जाएगा। यह कागज पर बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह एक विस्तृत नीतिगत घोषणा है, जिसका कोई विवरण, रोडमैप या संस्थागत फ्रेमवर्क नहीं दिया गया है।

देश में फैली इस महामारी के दौरान, संसद या इसकी स्टैंडिंग कमेटी वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से भी काम नहीं कर रही हैं। कोई संवैधानिक निगरानी नहीं है। कोई भी विधेयक जन परामर्श के लिए नहीं रखा गया। इसलिए अध्यादेश लाने से कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं होगा। सरकार को संसद के मानसून सत्र में संपूर्ण कानूनी प्रारूप प्रस्तुत करना होगा। यह राज्यों से परामर्श लिए नहीं हो सकेगा। बिना संस्थागत प्रारूप के आनन-फानन में नीति थोपने का परिणाम वही होगा, जो बिना योजना के त्रुटिपूर्ण जीएसटी लागू करने का हुआ है।

‘प्राईस एवं ट्रेड कंट्रोल’ को आंशिक रूप से हटाया जाना भी आधा अधूरा उपाय है। कृषि को नियंत्रण मुक्त करने के लिए संपूर्ण ढांचा बदलना होगा। साथ ही लागत और पूंजी संबंधी नियंत्रणों को समाप्त करना होगा। इसके लिए काफी व्यापक योजना और संस्थागत ढांचे की जरूरत होगी। केंद्र सरकार द्वारा प्रारंभ की गई ई-नाम मंडियां बुनियादी ढांचे की योजना के अभाव में विफल साबित हुई हैं।

कोविड-19 के संकट में जब अर्थव्यवस्था संकट में है और किसानों को लागत के लिए पैसे की जरूरत है, ऐसे में उन्हें पुख्ता मदद दिए बिना अधूरी स्वतंत्रता देना उनका उपहास उड़ाने के बराबर है। अच्छा तो यह होता कि पहले उन्हें आर्थिक सहयोग दिया जाए और उसके बाद संस्थागत सुधारों की शुरुआत की जाए।

(लेखक तक्षशिला इंस्टीट्यूट, बैंगलोर में पब्लिक पॉलिसी का अध्ययन कर रहे हैं। लेख में अभिव्यक्त किए गए विचार उनके अपने हैं। लेख का इंग्लिश रूपांतरण सीएनएन न्यूज़18 में प्रकाशित हुआ था।)