सोमवार, 03 अक्टूबर 2022
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‘बिजली संशोधन बिल’ को लेकर प्रदेश भर में किसानों और उपभोक्ताओं में रोष



केंद्र सरकार ने सोमवार, 8 अगस्त को लोकसभा में बिजली संशोधन विधेयक 2022, पेश किया. ऊर्जा मंत्री आर के सिंह द्वारा पेश किए गए इस विधेयक पर कई विपक्षी दलों के सदस्यों ने अपना विरोध जताते हुए इसे संविधान के फेडरल सिद्धांतों का उल्लंघन बताया. इस विधेयक का कई विपक्षी दलों के साथ-साथ बिजली कर्मचारियों, किसान संगठनों ने भी इस आधार पर विरोध किया है कि इससे केवल उन सिर्फ कुछ बिजली वितरण कंपनियों को लाभ होगा जो बड़े व्यापारिक घरानों से संबंधित हैं.

यह विधेयक बिजली के निजीकरण की अनुमति देता है और यदि यह पारित हो जाता है और कानून बन जाता है, तो यह ग्राहकों को अपना बिजली आपूर्तिकर्ता चुनने का विकल्प प्रदान करेगा, जैसे कोई टेलीफोन, मोबाइल और इंटरनेट सेवाओं के लिए अपने प्रदाताओं को चुन सकता है. सरकार का कहना है कि इस विधेयक से बिजली वितरण क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा निजी कंपनियों की राह खुलेगी और एक सर्किल में अनेकों यूटिलिटी कंपनियां काम कर सकेंगी.

इस विधेयक का संयुक्त किसान मोर्चा ने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन करते हुए विरोध किया था,  जिसे उस समय सरकार ने वापस ले लिया था. यह बिल पेश किए जाने पर एसकेएम ने एक बयान जारी करते हुए कहा, “9 दिसंबर, 2021 को सरकार ने एसकेएम को लिखे पत्र में कहा था कि बिजली संशोधन विधेयक में किसानों को प्रभावित करने वाले प्रावधानों पर सभी हितधारकों के साथ चर्चा की जाएगी. पिछले आठ महीनों में कोई चर्चा नहीं हुई है और इस बिल को पेश करना सरकार द्वारा किसानों के साथ एक बड़ा धोखा होगा.”

बिल के पेश करते ही हरियाणा और पंजाब में किसान संगठनों और अन्य उपभोक्ताओं ने इसका विरोध शुरू कर दिया था. कई जिलों में बिजली बिल संशोधन की प्रतियां जलाकर किसानों ने सरकार के खिलाफ रोष व्यक्त कर, नारेबाजी की. बिल पेश किए जाने का विरोध कर रहे अखिल भारतीय किसान सभा, हरियाणा के उपाध्यक्ष इंदरजीत सिंह ने गांव सवेरा को बताया, “सरकार के द्वारा जिस प्रकार से प्रत्येक विभाग का निजीकरण किया जा रहा है, यह निंदनीय है. इसी प्रकार बिजली के क्षेत्र की खेतीबाड़ी और देश के विकास कार्यों में अहम भूमिका है. जनसेवा के क्षेत्रों को लाभ हानि की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए. सरकार की यह वैधानिक जिम्मेदारी बनती है कि इन क्षेत्रों में जन सुविधाएं मुहैया करवाए. किसानों और नागरिकों द्वारा जगह-जगह पर बिजली बिल संशोधन की प्रतियां जलाकर रोष व्यक्त किया गया है. इस बिल को तुरंत प्रभाव से रद्द किया जाना चाहिए.

किसानों द्वारा विधेयक का विरोध किए जाने के बाद केंद्रीय बिजली मंत्री आर.के. सिंह ने ट्वीट कर सफाई देते हुए कहा, “कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसानों के लिए हानिकारक हो. बिजली (संशोधन) विधेयक, 2022 जन-समर्थक है और हमारी अर्थव्यवस्था के विकास के लिए है. सब्सिडी प्रावधानों में कोई बदलाव नहीं किया गया है. राज्य उपभोक्ताओं के किसी भी वर्ग को कितनी भी सब्सिडी, यहां तक कि मुफ्त बिजली भी दे सकता है. किसानों को प्रभावित करने वाला कोई प्रावधान नहीं. इससे सार्वजनिक या निजी सभी वितरण कंपनियों को विनियमित करने के लिए राज्य के बिजली आयोग मजबूत बनेंगे.”

सिंह के ट्वीट के बावजूद, कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), तृणमूल कांग्रेस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम सहित कई विपक्षी दलों के सदस्यों ने विधेयक पेश करने का विरोध किया. उन्होंने सरकार पर संविधान के संघीय सिद्धांतों का उल्लंघन करने और “बिजली क्षेत्र के अंधाधुंध निजीकरण” की अनुमति देने का आरोप लगाया. विपक्ष ने केंद्र सरकार पर बिजली के समवर्ती सूची में होने के बावजूद इस मामले पर राज्य सरकारों के साथ उचित परामर्श नहीं करने का आरोप लगाया.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, ने बिल पेश करने से पहले अपना विरोध जताते हुए ट्वीट करते हुए कहा, “यह कानून बहुत खतरनाक है. इससे देश में बिजली की समस्या सुधरने की बजाय और गंभीर होती जाएगी. लोगों की परेशानी बढ़ेगी. इससे कुछ ही कंपनियों को फायदा होगा. मैं केंद्र से अपील करता हूं कि इसे जल्दबाजी में न लाएं.”

लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने विधेयक को पेश करने का विरोध करते हुए किसानों को दिया गया लिखित आश्वासन का हवाला दिया और बिजली संशोधन विधेयक को “किसान विरोधी बिल” भी करार दिया.

बीकेयू (भगतसिंह) के अध्यक्ष अमरजीत सिंह ने इस कदम को वादा खिलाफी बताया. उन्होंने कहा, “सरकार ने संयुक्त किसान मोर्चा से सलाह किए बिना ही बिजली बिल संशोधन को संसद में पेश कर दिया, जोकि सरकार की वादाखिलाफी है. बिजली बिल संशोधन से आम उपभोक्ताओं को भी काफी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा. इस बिल से बिजली की कीमतों में काफी इजाफा होगा. यह बिल जनता की खिलाफत में है. संयुक्त किसान मोर्चा व अन्य सामाजिक संगठन इसके लिए मिलकर लड़ाई लड़ेंगे. सरकार की दमनकारी नीतियों से आमजन की भावनाएं भी काफी आहत हैं.”