बुधवार, 07 दिसंबर 2022
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राजद्रोह कानून की बहस तो ठीक है, लेकिन UAPA और NSA जैसे कानूनों को भी भूलना नहीं है!



राजद्रोह के अधिकांश मामलों में बढ़ोत्तरी, नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), 2019 के खिलाफ और यूपी के हाथरस में एक दलित किशोरी के साथ बलात्कार के विरोध में हुए आंदोलनों के बाद हुई है.

जनता द्वारा जब भी कोई बड़ा आंदोलन सरकार की नीतियों के खिलाफ या अपनी किसी मांग के लिए होता है तो उसके बाद अखबारों में आंदोलन के कुछ नेताओं पर देशद्रोह के केस लगने की खबर हम सुनते रहते हैं. दरअसल कानूनी तौर पर यह देशद्रोह नहीं बल्कि राजद्रोह होता है. सुप्रीम कोर्ट में इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए इसके खिलाफ एक याचिका लगी हुई है.

चीफ जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली इन तीन जजों की बेंच राजद्रोह कानून को चुनौती देने वाले एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा सहित पांच पक्षों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है.

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार इस कानून का इस्तेमाल विरोधी आवाज़ों को दबाने के लिए करती है. सरकार ने इस कानून की समीक्षा करने का समय कोर्ट से मांगा है. कोर्ट ने सरकार को आईपीसी की धारा 124ए के प्रावधानों पर समीक्षा की अनुमति भी दे दी है॰ जब तक समीक्षा चल रही है तब तक सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह कानून पर रोक लगा दी है. कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को राजद्रोह कानून, आईपीसी की धारा 124ए के तहत कोई भी मामला दर्ज नहीं करने का आदेश दिया है. चूंकि अदालत ने अस्थायी रूप से धारा 124-ए पर रोक लगा दी है,  लेकिन सरकार अभी भी किसी भी व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता या अन्य क़ानून जैसे कि गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम के अन्य प्रावधानों के साथ देशद्रोह के आरोपी का जेल में रहना जारी रख सकती है, उसे जमानत से वंचित किया जा सकता है. उनके खिलाफ जांच आगे बढ़ सकती है, आरोप अभी भी तय किए जा सकते हैं और मुकदमा आगे बढ़ सकता है.

कब बनाया गया था यह कानून?

1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पहली लड़ाई के बाद स्वतंत्रता की मांग ज़ोर पकड़ने लगी. जनता को विदेशी गुलामी से मुक्त करवाने के लिए आन्दोलकारी सभाएं करके सरकार की आलोचना करने लगे और आज़ादी के संघर्ष के लिए जनता का आह्वान करने लगे. इस तरह के लोगों से अंग्रेज़ी हुकूमत को खतरा महसूस हुआ. अपने शासन को बनाए रखने के लिए अंग्रेजों ने इन पर रोक लगाने की ठानी. इनके दमन को कानूनी जामा पहनाने के लिए क्रांतिकारियों के खिलाफ औपनिवेशिक ब्रिटिश प्रशासन द्वारा इस कानून को पेश किया गया था. इसे 1870 में लाया गया था. इसका मुख्य मकसद अंग्रेज़ी राज़ को बनाए रखना और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ उठ रही आवाज़ों को दबाना था. इसके बाद से अंग्रेज़ क्रांतिकारियों को इसी कानून का नाम लेकर जेल में डालती थी.

क्या है राजद्रोह कानून?

यह कानून राजद्रोह कहलाता है नाकि देशद्रोह. यानि सरकार के खिलाफ गतिविधि को इस कानून के तहत राजद्रोह माना जाता है. भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए के तहत अगर कोई व्यक्ति सरकार के खिलाफ कोई लेख लिखता है या फिर बोलता है, या ऐसे किसी लेख या भाषण का समर्थन करता है, विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमानना पैदा करता है या पैदा करने का प्रयत्न करता है तो यह राजद्रोह है. इसके अलावा अगर कोई व्यक्ति राष्ट्रीय चिन्हों का अपमान करता है या संविधान को नीचा दिखाने की कोशिश करता है तो यह राजद्रोह है. ऐसा करने वाले व्यक्ति के खिलाफ राजद्रोह कानून के तहत केस दर्ज हो सकता है. देश विरोधी संगठन से किसी भी तरह का संबंध रखने या उसका सहयोग करने वाले के खिलाफ भी राजद्रोह का केस दर्ज हो सकता है. इस कानून के तहत दोषी को उम्र कैद, तीन साल की सजा या जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं. यह एक गैर जमानती, संज्ञेय अपराध है और इस पर विचार सेशन कोर्ट या इससे ऊपर वाली कोर्ट ही कर सकती है.

क्यों है विवाद?

अंग्रेज 1947 में जब भारत छोड़कर गए थे. ब्रिटेन में उसी साल इस कानून के तहत आखिरी केस दर्ज हुआ था. साल 2009 में वहां इस कानून को खत्म कर दिया गया. लेकिन भारत में यह कानून आज भी जारी है. आज भी भारत में इस कानून का इस्तेमाल उसी समझ और उद्देश्य से हो रहा है जिससे ब्रिटिश हुकूमत करती थी. यानि कि अपने विरोधियों को दबाने के लिए.

स्वतंत्र भारत में इस कानून को बनाए रखना एक तीखी बहस का विषय रहा है – देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस प्रावधान को “बहुत ज्यादा आपत्तिजनक” कहा था और कहा था कि “जितनी जल्दी हम इससे छुटकारा पा लें उतना ही बेहतर है. “

राजद्रोह कानून के दुरुपयोग के संदर्भ में चिंता ज़ाहिर करते हुए मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने कहा है, ‘राजद्रोह कानून का इस्तेमाल बिल्कुल उसी तरह से है, जैसे हम किसी बढ़ई को लकड़ी का एक टुकड़ा काटने के लिए आरी देते हैं लेकिन वह उसका इस्तेमाल पूरे जंगल को ही काटने में कर डालता है.’

राजद्रोह कानून पर 2010 से 2021 तक का डेटा रखने वाली वेबसाइट आर्टिकल 14 के मुताबिक देश में राजद्रोह के 96% केस सरकार और नेताओं की आलोचना करने वालों के खिलाफ दर्ज हुए हैं. ऐसे 405 केस हैं, जिनमें नेताओं की आलोचना की गई थी. जिसमें 149 पर मोदी के खिलाफ “आलोचनात्मक” या “अपमानजनक” टिप्पणी करने का आरोप लगाया गया तो 144 पर उत्तर प्रदेश (यूपी) के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ “आलोचनात्मक” या “अपमानजनक” करने पर केस दर्ज हुए.

देश में 2010 से अब तक कुल 13,306 लोगों पर राजद्रोह के 867 केस दर्ज किए जा चुके हैं. इनमें से सिर्फ 13 लोगों को सजा हुई है. यानी, ऐसे मामलों में सजा की दर 1% भी नहीं है. 2010 से लेकर 2021 तक के डेटा से सामने आता है कि राजद्रोह का सबसे ज्यादा इस्तेमाल जिन पांच राज्यों में किया गया, उनमें दो में भाजपा के मुख्यमंत्री तो दो में एनडीए गठबंधन की पार्टियों के सीएम रहे.

इस पूरे दौर में देश में राजद्रोह के 867 केस दर्ज हुए. वेबसाइट ने जिला कोर्ट, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, पुलिस स्टेशन, एनसीआरबी रिपोर्ट और अन्य माध्यमों के जरिए डाटा इकट्ठा करके बताया है कि इन केसों में 13 हजार 306 लोगों को आरोपी बनाया गया. हालांकि, जितने भी लोगों पर केस दर्ज हुआ था, डेटाबेस में उनमें से सिर्फ तीन हजार लोगों की ही पहचान हो पाई.

यूपीए-II सरकार की 2010 और 2014 की वार्षिक औसत की तुलना में मोदी के कार्यकाल के दौरान 2014 और 2020 के बीच हर साल दर्ज किए गए राजद्रोह के मामलों की संख्या में 28% की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है. 2014 और 2019 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से राजद्रोह के 500 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं.

राजद्रोह के अधिकांश मामलों में बढ़ोत्तरी, नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), 2019 के खिलाफ और यूपी के हाथरस में एक दलित किशोरी के साथ बलात्कार के विरोध में हुए आंदोलनों के बाद हुई है.

यूपी में, 2010 के बाद से देशद्रोह के 115 मामलों में से 77% पिछले तीन वर्षों में दर्ज किए गए, जब से योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री का पद संभाला. इनमें से आधे से अधिक “राष्ट्रवाद” के मुद्दों पर दायर किए गए हैं – जिसमें लोगों पर “भारत विरोधी” टिप्पणी करने या “पाकिस्तान समर्थक” नारे लिखने और नारे लगाने का आरोप लगाया गया है.

यूपी सरकार ने संशोधित नागरिकता कानूनों और हाथरस में सामूहिक बलात्कार से निपटने के लिए आलोचकों के खिलाफ 28 मामले दर्ज किए हैं.

एशिया कप, आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी और ट्वेंटी 20 विश्व कप मैचों में पाकिस्तान पर भारत की हार का कथित “जश्न मनाने” के नाम पर भी 2014, 2017 और 2021 में तीन राजद्रोह के मामले दर्ज किए गए, योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि पाकिस्तान की जीत का जश्न मनाने वालों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया जाएगा.

फीस बढ़ोत्तरी का विरोध करने वाले छात्रों से लेकर किसान आंदोलन के समर्थकों तक पर राजद्रोह की धाराओं के तहत केस किए गए थे.

क्या इस कानून के खत्म होने से कोई फर्क पड़ेगा?

बहुत सारे बुद्धिजीवियों का मानना है कि इस कानून के खत्म होने से देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत होगी और लोगों को सही तरीके से विचारों की अभिव्यक्ति और जनांदोलनों की आज़ादी मिलेगी.

लेकिन इस तरह के केस देखने वाले वकीलों का मानना है कि धारा 124a आजकल कम ही इस्तेमाल की जाती है. अगर यह धारा भारतीय दंड संहिता से हट भी जाती है तो भी सरकार के पास कुछ विशेष कानून हैं जो लगातार असहमति को दबाने के लिए सरकार इस्तेमाल कर रही है. अब सरकार 124a की बजाय UAPA और NSA का ज्यादा इस्तेमाल कर रही है. भीमा कोरेगांव केस हो, हाथरस में सिद्दीकी कप्पन का केस हो चाहे भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर वाला केस, हर केस में या तो UAPA का इस्तेमाल किया गया है या फिर NSA का. यह बहस 124a(राजद्रोह) तक सीमित नहीं रहनी चाहिए बल्कि UAPA और NSA की समीक्षा तक जानी चाहिए.