इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल के प्रचार के लिए इन्फ्लुएंसर्स पर कितना खर्च हुआ, सरकार ने नहीं दी जानकारी!

 

 देश भर में इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल यानी ई20 को लेकर चल रही बहस अब सिर्फ गाड़ियों के माइलेज या इंजन की सेहत तक सीमित नहीं रही. सोशल मीडिया पर जहां वाहन मालिकों की शिकायतें आ रही हैं, वहीं कुछ माह पहले इन्फ्लुएंसर्स ई20 के ‘फायदे’ बता चुके हैं.

तब आरोप लगे थे कि सरकार ने करदाताओं के पैसे से इन इन्फ्लुएंसर्स को भुगतान कर ई20 का प्रचार कराया है, लेकिन जब सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत इसे लेकर जानकारी मांगी गई, तो सरकारी तेल कंपनियों और मंत्रालय के जवाबों ने नए प्रश्न पैदा कर दिए.

आरटीआई में क्या पूछा गया?

बिहार के आरटीआई एक्टिविस्ट कन्हैया कुमार ने 1 सितंबर 2025 को पेट्रोलियम मंत्रालय से कुछ सवाल पूछे:

– पिछले दो वर्षों में ई20 पेट्रोल के विज्ञापन/प्रचार पर सभी माध्यमों (इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट, डिजिटल, सोशल मीडिया आदि) के जरिए हुए कुल खर्च का विवरण
– प्रचार के लिए नियुक्त हुई एजेंसियों और इन्फ्लुएंसर्स के नाम
– इस काम के लिए इन्फ्लुएंसर्स इत्यादि को हुए भुगतान की जानकारी

क्या मिला जवाब

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने जवाब देने के बजाय 8 सितंबर को आरटीआई आवेदन तीन सरकारी तेल कंपनियों (बीपीसीएल, एचपीसीएल, आईओसीएल) को भेज दिया. लेकिन तेल कंपनियों से मिले जवाबों की असंगति ने नए संदेह पैदा कर दिए.

कन्हैया कुमार ने आरटीआई के जवाब विशेष रूप से द वायर हिंदी को उपलब्ध कराए हैं.

इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन का जवाब

29 सितंबर को आईओसीएल ने सभी सवालों का एक ही जवाब दिया: ‘मांगी गई जानकारी काल्पनिक प्रकृति की है. इसलिए हम इसे उपलब्ध कराने में असमर्थ हैं.’

यह जवाब हैरान करने वाला है क्योंकि ‘विज्ञापन खर्च, एजेंसियों के नाम और भुगतान के रिकॉर्ड’ जैसी तथ्यात्मक जानकारी मांगी गई थी.

भारत पेट्रोलियम का जवाब

बीपीसीएल ने 30 सितंबर 2025 को आरटीआई एक्ट 2005 की धारा 8(1)(d) का हवाला देते हुए कहा: ‘मांगा गया डेटा व्यावसायिक गोपनीयता के दायरे में आता है… इसलिए हम इस सूचना को उपलब्ध कराने से छूट चाहते हैं.’​

बीपीसीएल ने तर्क दिया कि यह जानकारी ‘तीसरे पक्ष की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति को नुकसान’ पहुंचा सकती है. लेकिन जनहित से जुड़ी सरकारी नीति के प्रचार पर हुआ सार्वजनिक व्यय ‘व्यावसायिक गोपनीयता’ कैसे हो सकता है?

हिंदुस्तान पेट्रोलियम (एचपीसीएल) का जवाब

हिंदुस्तान पेट्रोलियम (एचपीसीएल) ने भी बीपीसीएल जैसा ही जवाब दिया और व्यावसायिक गोपनीयता का हवाला देकर जानकारी देने से मना कर दिया.

जवाब में अंतर

इस तरह एक तरह सवालों के जवाब में सरकारी कंपनियों ने दो तरह के उत्तर दिए: आईओसीएल ने कहा कि सवाल ‘काल्पनिक’ है, बीपीसीएल और एचपीसीएल ने कहा कि यह ‘व्यावसायिक गोपनीयता’ का मसला है.

उत्तरों की यह असंगति इसलिए विवादास्पद हो जाती है क्योंकि इस पूरे प्रचार अभियान पर सरकार द्वारा प्रायोजित होने का आरोप लगा था.

अगर कोई प्रचार अभियान नहीं चलाया गया या इन्फ्लुएंसर्स को भुगतान नहीं किया गया, तो सीधा जवाब दिया जा सकता था कि – ‘ऐसा कोई खर्च नहीं किया गया.’

लेकिन कंपनियों ने अलग-अलग उत्तर दिए.

द वायर हिंदी ने तीनों कंपनियों को ईमेल भी भेजा है. उनसे फिर जानना चाहा है कि उन्होंने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स से प्रचार करवाया है या नहीं? अगर हुआ है तो कितना पैसा खर्च हुआ है? यह भी पूछा कि सार्वजनिक धन से जनता में जागरूकता के लिए चलाए गए अभियान पर हुए खर्च को ‘व्यावसायिक रूप से गोपनीय जानकारी’ कैसे माना जा सकता है?

खबर के प्रकाशन तक उनका जवाब नहीं आया है. जवाब मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा.

ध्यान रहे आरटीआई कानून 2005 का मूल उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है. खासकर जब मामला करदाताओं के पैसे के खर्च से जुड़ा हो, तो नागरिकों को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उनका पैसा कहां और कैसे खर्च हो रहा है.

जब इन्फ्लुएंसर्स को मिला ‘पेड कोलैब’ ईमेल

इस पूरे अभियान की कहानी तब सामने आई जब कुछ कंटेंट क्रिएटर्स ने खुलासा किया कि उन्हें पीआर एजेंसियों से ई20 प्रचार के लिए पैसे की पेशकश की गई थी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया.

अभी तक इसका प्रमाण मौजूद नहीं है कि सरकार ने इन इन्फ्लुएंसर्स को पैसा दिया था या नहीं, लेकिन कुछ प्राइवेट एजेंसियों ने उन्हें प्रचार करने के लिए संपर्क जरुर किया था.

बूम लाइव से बातचीत में ‘द रेस मंकी’ नाम के ऑटो रिव्यू पोर्टल के संपादक ईशान भारद्वाज ने बताया कि 14 अगस्त 2025 को उन्हें ‘हेक्सटेक मीडिया’ नाम की पीआर एजेंसी द्वारा संपर्क किया गया था. जब भारद्वाज ने 20 लाख रुपये की मांग की, तो एजेंसी ने 15 लाख रुपये का प्रस्ताव दिया. भारद्वाज ने कहा, ‘यह मार्केटिंग नहीं, बल्कि घोटाला है. करदाताओं के पैसे से गलत सूचना फैलाई जा रही है.’​

‘मोटरसाइकिल ट्रेल्स’ नाम के एक अन्य इन्फ्लुएंसर को भी ऐसी ही पेशकश मिली थी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया.

कॉन्टेंट क्रिएटर मुकेश मोहन का दावा है कि मई 2025 में ‘यूनोइया नेटवर्क्स’ नामक पीआर एजेंसी से 1.45 लाख रुपये में ई20 पर स्पॉन्सर्ड रील बनाने का ऑफर मिला था. उन्होंने इस कथित ऑफर का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर शेयर किया था.

यहां सवाल उठता है कि क्या इन प्राइवेट एजेंसियां ने अपने आप इन इन्फ्लुएंसर्स को सरकारी उत्पाद के प्रचार के लिए संपर्क किया? हेक्सटेक मीडिया का पक्ष जानने के लिए हमने ईमेल किया है, लेकिन जवाब नहीं आया.

आरोप-प्रत्यारोप के बीच गौण होता मुख्य सवाल

एक तरफ जब इन्फ्लुएंसर्स ई20 के फायदे बता रहे थे, उसी दौरान सोशल मीडिया पर कई लोग ई20 से उपजी परेशानियों को भी बयान कर रहे थे और केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी पर सवाल उठा रहे थे.

प्रतिक्रिया देते हुए गडकरी ने सोशल मीडिया के ‘ई20 विरोधी’ पोस्ट्स को ‘पेड कैंपेन’ और ‘राजनीतिक रूप से प्रेरित’ बताया था. उन्होंने कहा था कि यह अभियान उन्हें निशाना बनाने के लिए चलाया गया है और ‘पेट्रोल लॉबी बहुत अमीर और ताकतवर है.’

परिवहन मंत्री के आरोपों का जवाब देते हुए कॉन्टेंट क्रिएटर मुकेश मोहन ने अपने एक वीडियो में कहा, ‘नहीं मंत्री जी, आलोचक पैसे नहीं ले रहे थे. पैसे तो इसके लिए (पेड कैंपेन) दिए जा रहे थे.’

ई20 नीति के गुण-दोष पर बहस अलग है, लेकिन इसके प्रचार पर खर्च की जानकारी देने से इनकार करना चिंता का विषय है. एक तरफ मंत्री कह रहे हैं कि आलोचना ‘पेड’ है, दूसरी तरफ पीआर एजेंसियों के ऑफर और इन्फ्लुएंसर्स द्वारा सरकारी अकाउंट्स के साथ ‘कोलैब’ में पोस्ट किए गए वीडियो मौजूद हैं.

जब सोशल मीडिया पर छाया ई20 का प्रचार अभियान

जुलाई-अगस्त 2025 में जब भारत ने ई20 लक्ष्य को पांच साल पहले हासिल करने का ऐलान किया, तो सोशल मीडिया पर अचानक कई बड़े इन्फ्लुएंसर्स एक साथ ई20 की तारीफ करते नजर आए. करीब 30 से अधिक इन्फ्लुएंसर्स ने लगभग एक साथ, एक जैसे हैशटैग के साथ और एक जैसी थीम वाले वीडियो पोस्ट किए.

इन वीडियोज में बताया गया कि ई20 से पर्यावरण को फायदा होगा, किसानों की आय बढ़ेगी और गाड़ियों को कोई नुकसान नहीं होगा.

सबसे दिलचस्प, इन सभी पोस्ट में इंस्टाग्राम के ‘कोलैब’ फीचर के जरिए पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, बीपीसीएल, एचपीसीएल और आईओसीएल जैसी सरकारी तेल कंपनियों के आधिकारिक अकाउंट्स को जोड़ा गया था.

कोलैब फीचर के लिए संबंधित यूजर की मंज़ूरी जरूरी होती है, जिससे साफ हो जाता है कि सरकार को इस अभियान की पूरी जानकारी थी.

फैक्ट चेक वेबसाइट ऑल्ट न्यूज ने बताया था कि इस अभियान के तहत बनाए गए वीडियो करोड़ों लोगों तक पहुंचे.

साभार: द वायर