शनिवार, 04 फ़रवरी 2023
गांव-देहात

आखिर कब तक सीवर में मरते रहेंगे मजदूर?



मुख्यमंत्री के आदेश हैं कि जिन जगहों पर पुरानी सीवरेज प्रणाली है, वहां उसी तरह की तकनीक पर आधारित मशीनों से सफाई की जाए और जहाँ पर नई सीवरेज व्यवस्था है, वहां अत्याधुनिक रोबोटिक मशीनों से सफाई करवाई जाए.

तारीख 19 अप्रैल, 2022. हिसार के उकलाना मंडी के बुढ़ाखेड़ा गांव में चार युवकों की सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट में जहरीली गैस में दम घुटने की वजह से मौत हो गयी.

यह हादसा गांव के साल 2017 में बने सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) में दो खराब मोटरों को ठीक करने के दौरान हुआ. टैंक से मोटर निकालने के लिए करीब पौने छह बजे ठेका कर्मी सुरेंद्र व राहुल टैंक पर पहुंचे थे. जंजीर की कुंडी बनाकर एक मोटर को तो उन्होंने करीब दस मिनट में ही ऊपर खींच लिया था. जब दूसरी मोटर खींचने लगे तो यह जंजीर के साथ ऊपर नहीं आ रही थी. मोटर निकालने के लिए पहले सुरेंद्र टैंक में नीचे उतरा, गैस के प्रभाव से वह बेहोश होने लगा. साथी को बचाने के लिए राहुल भी नीचे उतर गया, लेकिन वह भी नीचे बेहोश हो गया. ठेकाकर्मी अमरजीत ने यह सब देखकर मदद के लिए आवाज़ लगाई और सीढ़ी लेने के लिए गाँव की तरफ भागा. गांव में चौकीदारी करने वाला राजेश और महेंद्र, वहां से गुजर रहे थे, दोनों ने सुरेंद्र और राहुल को बचाने के लिए टैंक में छलांग लगाई लेकिन वह नहीं जानते थे कि यह उनकी जिंदगी कि अंतिम छलांग होने वाली है. चारों नौजवानों की जहरीली गैस की वजह से दम घुटने से मौत हो गयी.

सुरेंदर के साथ ही काम करने वाले एक कर्मचारी ने बताया, “जब भी मोटर खराब हुई तो ऐसे ही उतर कर ठीक करनी होती थी लेकिन अबकी बार गैस ज्यादा बनी हुई थी जिसकी वजह से यह हादसा हुआ. सुरेंदर और राहुल दोनों ही शिव कन्स्ट्रकशन कंपनी के कर्मचारी थे. कंपनी सुरेंदर को 7500 रु हर महीने देती थी और 7000 रु राहुल को मिलते थे. यह दोनों जिस टैंक पर काम करते थे उसमे गंदा पानी आकर इकठ्ठा होता था जो इसमें से दूसरे टैंक में ट्रीटमेंट के लिए जाता था.

कुछ युवक टैंक के अंदर जाना चाहते थे लेकिन ग्रामीणों ने उनको नीचे जाने से रोक लिया, नहीं तो यह बड़ा हादसा और भी बड़ा हो सकता था. दमकल व पुलिस विभागद्वारा पहले टैंक से पानी को खाली करवाया गया. इसके बाद रात के करीब10 बजे शव रस्सी के सहारे करीब चार घंटे मशक्कत के बाद बाहर निकाले गए. घटना के बाद गाँव वालों ने गुस्से में हँगामा कर दिया जिसमें प्रशासन के साथ कुछ देर तनातनी भी हुई. गाँव वालों ने एक-एक करोड़ मुआवजा और आश्रितों के लिए सरकारी नौकरी की मांग की है. रात के करीब 11 बजे राज्यमंत्री अनूप धानक चंडीगढ़ से गांव में पहुंचे और ग्रामीणों से बातचीत की. रात 1.35 बजे पर ग्रामीणों की कमेटी की राज्यमंत्री से मांगों पर बातचीत के बाद 17-17 लाख रुपए मुआवजा और 1-1 नौकरी के आश्वासन पर सहमति बनी तो शवों को पोस्टमार्टम के लिए अग्रोहा भेज दिया गया.

किसी व्यक्ति को बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर या टैंक में उतारने पर संसद ने 2013 में कानून बनाकर पाबंदी लगा दी थी. मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट 2013 के तहत देश में सीवर-सफाई के लिए किसी भी व्यक्ति को उतारना पूरी तरह गैर-कानूनी है. लेकिन इसके बावजूद इस तरह के मामले सामने आते रहते हैं. केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्री वीरेन्दर कुमार ने अगस्त 2021 में राज्यसभा में बताया था कि 1993 से 2018 तक देश में 941 सफाई कर्मचारियों की मौत सीवर में दम घुटने की वजह से हो चुकी है, जिसमें से 117 अकेले हरियाणा से हैं.

राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अनुसार पूरे देश में हर पाँच दिन में एक सफाई कर्मचारी की ऐसे मौत हो रही है. अगर पिछले दो साल की बात करें तो पिछले दो साल में सीवरेज में उतारने से हुए हादसों के अधिक केस सिरसा, हिसार, पानीपत और नूह से आ रहे हैं. बीती 14 अप्रैल को पानीपत में एक मजदूर की सीवर में दम घुटने से मौत हो गयी थी. 25 दिन पहले दो भाइयों की मौत नूह जिले में हुई थी. पिछले साल, अक्तूबर 2021 में पानीपत में दो मजदूर और एक इंजीनियर का दम घुट गया था और मौत हो गयी थी. सरकार के तमाम दावों के बावजूद सीवर में मौत जारी हैं.

मुख्यमंत्री के आदेश हैं कि जिन जगहों पर पुरानी सीवरेज प्रणाली है, वहां उसी तरह की तकनीक पर आधारित मशीनों से सफाई की जाए और जहाँ पर नई सीवरेज व्यवस्था है, वहां अत्याधुनिक रोबोटिक मशीनों से सफाई करवाई जाए. मगर ये सब आदेश केवल कागजों तक ही सीमित हैं. विभागों के पास अत्यानुधिक मशीनें ही नहीं हैं. अधिकारी भी बार-बार मशीन न होने व फंड की कमी की बात करते हैं. मजबूरन, फिर कर्मचारियों को सीवर में उतारा जाता है. हैरानी की बात तो यह है कि मैनुअल तरीके से सफाई पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए एक्ट के साथ राज्य निगरानी समिति का गठन भी किया गया है. हरियाणा का अपना सफाई कर्मचारी आयोग भी है जिसकी वैबसाइट की गैलरी में सफाई कर्मचारियों की जगह सरकारी कार्यक्रमों और चुनाव अभियान की फोटो ज्यादा दिखाई देती हैं.

मैनुअल स्कैवैंजिंग एक्ट 2013 के अनुसार अगर कुछ खास परिस्थितियों में किसी कर्मचारी को सीवर में उतारना भी पड़ता है तो उसके लिए खास प्रावधान जरूरी हैं. क्या हैं वो खास प्रावधान:-

  1. कर्मचारी का कम से कम 10 लाख रुपए का बीमा होना चाहिए.
  2. कर्मचारी से काम की लिखित स्वीकृति ली जानी चाहिए.
  3. सफाई से एक घंटे पहले मैनहोल या टैंक का ढक्कन खोला जाना चाहिए.
  4. यह सारा काम प्रशिक्षित सुपरवाइजर की निगरानी में काम होना चाहिए.
  5. आक्सीजन सिलेंडर, मास्क, जीवन रक्षक उपकरण यहां तक की एंबुलेंस भी मौके पर मौजूद होनी चाहिए.

हिसार की डीसी डॉ प्रियंका सोनी पत्रकारों को बताया, “एसटीपी में चार युवाओं की मौत के मामले में एडीसी स्वप्निल रविंद्र पाटिल की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय कमेटी गठित की है. कमेटी में एसई सिंचाई, एसई जनस्वास्थ्य, डीएसपी बरवाला, एसडीएम बरवाला शामिल किए हैं. जांच रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की जाएगी.“

इस सबके बावजूद प्रशासन से सवाल बनता है कि इतने कानून बनने के बावजूद भी यह परंपरा क्यों जारी है? क्यों मशीनों का उपयोग नहीं किया जाता?