आट्टे के दाम पर काबू पाने के लिए 30 लाख टन गेहूं बाजार में बेचने पर मजबूर हुई सरकार!

गेहूं के दाम में आई रिकॉर्ड तेजी के बाद केंद्र सरकार ने अपने भंडार से 30 लाख टन गेहूं खुले बाजार में बेचने का फैसला लिया है. केंद्र सरकार की ओर से 30 लाख टन गेहूं की बिक्री ओपन मार्केट सेल स्कीम (OMSL) के जरिए होगी.

सरकार की ओर से जारी एक आधिकारिक बयान के अनुसार विशेष ओपन मार्केट सेल स्कीम योजना के तहत खरीदार की बिक्री इस मकसद से की जाएगी कि वे इसका आटा तैयार करके 29.50 पैसे प्रति किलो अधिकतम खुदरा मूल्य (एमएसपी) पर बिक्री करें. बयान में कहा गया है कि योजना के तहत फ्लोर मिलर्स, थोक खरीदारों को ई नीलामी के माध्यम से गेहूं बेचा जाएगा. एक खरीदार को एक नीलामी में एफसीआई से अधिकतम 3 हजार टन गेहूं मिलेगा. इसके अलावा राज्य सरकारों व केंद्र शासित प्रदेशों को बिना ई-नीलामी के गेहूं उपलब्ध करवाया जाएगा.

इसके अलावा सरकारी पीएसयू, कोऑपरेटिव, केंद्रीय भंडार, एनसीसीएफ आदि को भी बिना ई-नीलामी के 2,350 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से गेहूं उपलब्ध करवाया जाएगा. वहीं सरकार की ओर से निजी ट्रेडर्स के लिए भी गोदाम खोलने का फैसला किया गया है.

बता दें कि बाजार में इस वक्त गेहूं की कीमत 31-32 रुपये किलो तक पहुंच गई है. बिजनैस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार ट्रेडर्स ने कहा, ‘बिक्री शुरू होते ही बाजार भाव में कम से कम 2 रुपये किलो कमी आ सकती है’ उन्होंने कहा कि ज्यादातर गेहूं पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश में पड़ा है, जहां से गेहूं फ्लोर मिलर्स और आटा बनाने वालों को बेचा जाएगा. उन्होंने कहा कि अगले सप्ताह बिक्री खुलने की संभावना है.

आंकड़ों के अनुसार 1 जनवरी, 2023 को केंद्रीय पूल में भारत का गेहूं का अनुमानित स्टॉक करीब 171.7 लाख टन था, जो जरूरी रणनीतिक भंडार से 24.4 प्रतिशत ज्यादा है. खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने 19 जनवरी को कहा था कि गेहूं और आटे की खुदरा कीमतें बढ़ गई हैं और सरकार जल्द ही बढ़ती दरों को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाएगी. ओएमएसएस नीति के तहत सरकार समय-समय पर थोक उपभोक्ताओं और निजी व्यापारियों को खुले बाजार में पूर्व-निर्धारित कीमतों पर खाद्यान्न, विशेष रूप से गेहूं और चावल बेचने के लिए सरकारी उपक्रम भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को अनुमति देती रही है. इसका उद्देश्य जब खास अनाज का मौसम न हो, उस दौरान इसकी आपूर्ति बढ़ाना और सामान्य खुले बाजार की कीमतों पर लगाम लगाना है.

हरियाणा में मनमाने ढंग से चलाया गया शिक्षकों का तबादला अभियान: हाई कोर्ट

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार द्वारा चलाए गए शिक्षकों के तबादला अभियान को गलत बताते हुए इसे स्पष्ट रूप से छात्रों के हितों की अनदेखी और अधिकारियों की सनक का नतीजा बताया. जस्टिस हरनरेश सिंह गिल ने शिक्षकों के तबादलों की वजह से छात्रों को आई दिक्कतों को स्पष्ट करने के लिए वरिष्ठ माध्यमिक शिक्षा के डिप्टी डायरेक्टर को अदालत में हाजिर रहने का निर्देश दिया है.

बता दें कि प्रदेश भर के शिक्षकों ने सरकार के ट्रांसफर ड्राइव अभियान का विरोध किया था. सरकार के ट्रांसफर ड्राइव अभियान के खिलाफ शिक्षक सड़कों पर भी उतरे थे लेकिन सरकार ने शिक्षकों की मांगों की परवाह किए बिना ट्रांसफर ड्राइव स्कीम लागू कर दी जिसके बाद शिक्षकों ने हाई कोर्ट का रुख किया और अब हाई कोर्ट ने भी शिक्षकों की ट्रांसफर ड्राइव स्कीम पर सवाल खड़े करते हुए इसे मनमाने तरीके से लागू करने वाली स्कीम बताया है.

सुनवाई के दौरान जस्टिस गिल ने जोर देकर कहा कि यह समझ से परे है कि अधिकारी “इतनी गहरी नींद” में कैसे चले गए. स्कूलों में शिक्षकों की पोस्टिंग में अनुपातहीनता की गई है, जहां विषय के छात्रों की संख्या शून्य या न्यूनतम है वहां शिक्षक लगाए गए और दूसरी ओर जहां छात्रों की संख्या ज्यादा थी वहां विषय के शिक्षकों को तैनात नहीं किया गया.

याचिकाकर्ता के वकील की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों को पढ़ने और तर्कों को सुनने के बाद जस्टिस गिल ने कहा, “एक दस्तावेजों से पता चलता है कि आठ स्कूलों में, छात्रों की कुल संख्या के मुकाबले विषय शिक्षकों की अनुपातहीन संख्या उपलब्ध है. कुछ स्कूलों में छात्र नहीं होने पर भी तीन-तीन शिक्षकों की पोस्टिंग की गई है. वहीं जहां छात्रों की अच्छी संख्या है वहां किसी भी विषय के शिक्षकों की पोस्टिंग नहीं किया गया है.”

मनरेगा के तहत मिलने वाला रोजगार मौजूदा वित्त वर्ष में पांच साल के सबसे नीचले स्तर पर!

इस वित्तीय वर्ष में मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत प्रति परिवार रोजगार के औसत दिन पांच साल में सबसे निचले स्तर पर रहे. 20 जनवरी तक, प्रति परिवार दिया गया औसत रोजगार 2021-22 में 50 दिनों के मुकाबले 42 दिन,2020-21 में 52 दिन, 2019-20 में 48 दिन और 2018-19 में 51 दिन था. अंग्रेजी अखबार द हिंदू में छपी रिपोर्ट के अनुसार अधिकारियों ने बताया, इस वित्त वर्ष में मनरेगा योजना के तहत रोजगार की मांग में गिरावट आई है. जबकि महामारी के दो वर्षों के विपरीत, जब एक बड़ी आबादी नौकरी छूटने के कारण अपनी आय में कमी को पूरा करने के लिए मनरेगा पर निर्भर थी.

वहीं मनरेगा कार्यकर्ता सरकार के रोजगार की मांग में कमी आने के तर्क को नकारते हुए आरोप लगाते हैं कि मनरेगा प्रणाली में अनेक कमीयां होने के कारण लोगों की इसमें भागीदारी कम हो रही है. प्रेमजी विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले राजेंद्रन नारायणन ने बताया, “ केंद्र से फंड नहीं मिलने से काम की मांग में कमी आई है जिसकी मुख्य वजह वेतन भुगतान में देरी रही है. मनरेगा मजदूरों की हाजिरी के लिए एक ऐप जैसी अनावश्यक तकनीकी जटिलताओं की शुरूआत ने मजदूरों के लिए और अधिक दिक्कतें बढ़ा दी हैं.”

20 जनवरी तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अरुणाचल प्रदेश (63.92%), छत्तीसगढ़ (61.60%), गोवा (18.03%), हरियाणा (59.91%), मणिपुर (14.52%), मेघालय (55.65%) %), अंडमान निकोबार (26.84%) फीसदी रोजगार दे पाया है. मणिपुर अपने अनुमानित 2.5 करोड़ व्यक्ति दिवसों में से केवल 14.52% का उपयोग करके सबसे निचले पायदान पर है. मनरेगा कार्यकर्ता बताते हैं कि छत्तीसगढ़ और मेघालय का प्रदर्शन भी विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि पिछले वर्षों में दोनों राज्यों का रिकॉर्ड मजबूत रहा है.

मनरेगा मजदूरों को नहीं मिली मजदूरी,केंद्र सरकार पर राज्यों का 7500 करोड़ बकाया!

मनरेगा मजदूरों की लंबित राशि का मुद्दा सामने आया है, जिसमें कई संगठनों ने केंद्र सरकार से बकाया भुगतान करने की मांग की. मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) संघर्ष मोर्चा ने केंद्र सरकार पर पश्चिम बंगाल की 7,500 करोड़ रुपये से अधिक की मनरेगा निधि रोकने का आरोप लगाया. नरेगा संघर्ष मोर्चा ने दावा किया कि राज्य में मनरेगा मजदूरों को पिछले साल दिसंबर से मजदूरी का भुगतान नहीं किया गया है और यह उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है. संगठन ने लंबित वेतन को तत्काल जारी करने, पूरी अवधि के लिए प्रति दिन 0.05% की दर से देरी के लिए मुआवजे और नए कार्यों और जॉब कार्डों की शुरुआत की मांग की. राज्य के 7,500 करोड़ रुपये के मनरेगा बकाया में से मजदूरों की 2,744 करोड़ रुपये लंबित है.

वहीं मजदूर किसान शक्ति संगठन के संस्थापक सदस्य निखिल डे ने एक ट्वीट में कहा, “आज 1 साल हो गया है जब बीजेपी ने मनरेगा श्रमिकों को पश्चिम बंगाल से मजदूरी का भुगतान नहीं किया है. 1 करोड़ से ज्यादा मजदूरों पर 2,744 करोड़ रुपये बकाया! कानून कहता है 15 दिन में भुगतान करो. सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि देरी “जबरन श्रम” है. केंद्र का कहना है कि राज्य भ्रष्ट है- इसलिए काट लें फंड!”

अंग्रेजी अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल के पंचायत मंत्री प्रदीप मजूमदार ने आरोप लगाया कि केंद्र की ओर से राज्य सरकार की मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया है. पंचायत मंत्री ने मजूमदार ने कहा, ”पिछले साल से इस योजना के तहत एक पैसा भी जारी नहीं किया गया है. हम धन की मांग कर रहे हैं लेकिन केंद्र इस मामले को देखने को इच्छुक नहीं है.”

वहीं राज्य सरकार ने कई मौकों पर केंद्र पर मनरेगा योजना और जीएसटी बकाया के तहत राज्य को धन जारी नहीं करने का आरोप लगाया है. इसको लेकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कई बार पीएम को पत्र भी लिख चुकी हैं.

गैर-लाभकारी संगठन लिबटेक इंडिया की एक रिपोर्ट में पाया गया कि राज्य में इस योजना के तहत काम करने वाले परिवारों की संख्या में गिरावट आई है. कोरोना काल के दौरान 77 लाख से चालू वित्त वर्ष में 16 लाख रह गया है. मनरेगा के साथ मजदूरी में देरी ग्रामीण परिवारों के लिए गंभीर समस्या है. महामारी के दौरान बड़े शहरों से गांव लौटे मजदूरों के लिए मनरेगा एक वरदान साबित हुआ था.

केंद्र सरकार की SEED योजना विफल, विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों तक नहीं पहुंचा कोई लाभ!

सामाजिक न्याय और अधिकारिता पर बने संसदीय पैनल ने 260 से अधिक विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों को अनुसूचित जाति,अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में वर्गीकृत करने की “बहुत धीमी” प्रक्रिया पर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है. इस साल फरवरी में शुरू की गई SEED (स्कीम फॉर इकोनॉमिक एम्पावरमेंट ऑफ डीएनटी) योजना के तहत सरकार इस समुदाय के लोगों तक लाभ पहुंचाने में विफल रही है.

SEED (स्कीम फॉर इकोनॉमिक एम्पावरमेंट ऑफ डीएनटी) योजना केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री वीरेंद्र कुमार द्वारा विमुक्त घुमंतू समुदाय से जुड़े छात्रों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुफ्त कोचिंग, स्वास्थ्य बीमा, आवास सहायता और आजीविका पहल प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी. इस योजना के लिए 200 करोड़ की राशि आवंटित की गई है जो वित्त वर्ष 2021-22 से वित्त वर्ष 2025-26 तक पाँच वर्षों में खर्च की जानी है.

अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ में छपी रिपोर्ट के अनुसार 26 दिसंबर तक, SEED योजना के तहत कुल 5,400 से अधिक आवेदन प्राप्त हुए हैं, जिनमें से एक भी आवेदन को मंजूरी नहीं दी गई और न ही कोई राशि स्वीकृत की गई है. इस शीतकालीन सत्र में संसद में पेश की गई एक रिपोर्ट में सामाजिक न्याय और अधिकारिता पर बने संसदीय पैनल ने कहा कि इसने पहले भी इन समुदायों के जल्द से जल्द और सटीक वर्गीकरण पर आवश्यक कार्रवाई करने बाबत विभाग की विफलता पर ध्यान दिलाया गया था.

वहीं सरकार के यह कहने के बाद कि काम चल रहा है और 2022 तक पूरा हो जाएगा, पैनल ने कहा कि प्रक्रिया अभी भी बहुत धीमी है. पैनल ने कहा कि,” घुमंतू जनजातियों के वर्गीकरण में देरी से उनकी परेशानियां और बढ़ेगी और वे उनके कल्याण के लिए चलाई गई योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाएंगे.” पैनल ने आगे कहा कि उसे उम्मीद है कि सरकार इस कवायद में तेजी लाएगी और इसे समयबद्ध तरीके से पूरा करेगी और इसके लिए विस्तृत समयसीमा मांगी है.

वहीं संसदीय पैनल की टिप्पणी पर सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग ने कहा, “भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण ने अब तक 48 डीएनटी समुदायों के वर्गीकरण पर रिपोर्ट प्रस्तुत की है. इसके अलावा, 267 समुदायों को अब तक वर्गीकृत नहीं किया गया है, एएनएसआई ने 24 समुदायों पर अध्ययन पूरा कर लिया है, जिनमें जनजातीय अनुसंधान संस्थान 12 समुदायों का अध्ययन कर रहे हैं. इसके अलावा, एएनएसआई 161 समुदायों पर अध्ययन को अंतिम रूप दे रहा है और 2022 के अंत तक शेष समुदायों (लगभग 70) का अध्ययन पूरा करने की उम्मीद है.”

देश में विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय से जुड़ी 1,400 से अधिक जनजातियों वाले 10 करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले इस समूह से इदते आयोग ने 1,262 समुदायों को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची में वर्गीकृत किया था और 267 समुदायों को अवर्गीकृत छोड़ दिया गया था.

विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदायों के विकास और कल्याण बोर्ड (DWBDNC) के अधिकारियों ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि वे SEED योजना के लिए आवेदनों की प्रक्रिया तब तक शुरू नहीं कर सकते जब तक कि राज्य और जिला स्तर की समीक्षा पूरी नहीं हो जाती.

यह योजना ऑनलाइन आवेदन और लाइव स्थिति-ट्रैकिंग के लिए एक प्रणाली के साथ शुरू की गई थी. हालांकि विमुक्त, घुमंतू और अर्ध घुमंतू समुदाय से जुड़े अधिकतर लोग ऑनलाइन सिस्टम को नेविगेट करने में असमर्थ हैं. अधिकारियों ने कहा, मंत्रालय और डीडब्ल्यूबीडीएनसी के अधिकारी आवेदकों को वेब पोर्टल पर साइन अप करने में मदद करने के लिए समुदाय के नेताओं के साथ देश भर में शिविर आयोजित कर रहे हैं. लेकिन जब तक उनके सटीक वर्गीकरण की कवायद पूरी नहीं हो जाती, तब तक आवेदन पर कार्रवाई नहीं की जाएगी.

मजदूर नेता शिव कुमार को पुलिस ने अवैध रूप से हिरासत में रखकर प्रताड़ित किया, न्यायिक जांच में हुआ खुलासा!

हाई कोर्ट की निगरानी में हुई जांच में हरियाणा पुलिस के अधिकरियों द्वारा मजदूर नेता शिव कुमार को अवैध रूप से पुलिस कस्टडी में रखकर प्रताड़ित करने के आरोप सही पाए गए हैं. जनवरी 2021 में पुलिस द्वारा किए गए अत्याचार में मजदूर नेता शिव कुमार की एक आंख की रोशनी चली गई थी. मेडिकल रिपोर्ट में सामने आया था कि उनके शरीर में कईं जगह फ्रैक्चर था और साथ ही उनके नाखून भी उखाड़े गए थे.

फरीदाबाद के जिला और सत्र न्यायाधीश दीपक गुप्ता द्वारा की गई जांच में पाया गया कि मजदूर अधिकार संगठन के अध्यक्ष शिव कुमार को हरियाणा पुलिस ने किसान आंदोलन के दौरान जनवरी 2021 में सोनीपत में अवैध रूप से एक सप्ताह के लिए अपनी हिरासत में रखा था. जांच में मजदूर नेता पर हुई यातना को दबाने के लिए डॉक्टरों और न्यायिक अधिकारियों की मिलीभगत भी सामने आई है. जांच रिपोर्ट के अनुसार अवैध कारावास के दौरान शिव कुमार को “पुलिस द्वारा बुरी तरह से प्रताड़ित किया गया था, जिससे उनके शरीर के विभिन्न हिस्सों पर फ्रैक्चर सहित कई चोटें आई थी”

बता दें कि जबरन वसूली और हत्या के प्रयास के आरोप में शिव कुमार और उनकी साथी कार्यकर्ता नोदीप कौर पर मुकदमा चल रहा है. दोनों मजदूर नेता 2021 में अपने संगठन के बैनर तले सोनीपत के कुंडली औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों की मजदूरी नहीं मिलने के चलते फैक्ट्री मालिकों के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे.

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने पिछले साल मजदूर नेता शिव कुमार के पिता राजबीर द्वारा दायर याचिका पर जांच के आदेश दिए थे. वहीं याचिकाकर्ता के वकील हरिंदर बैंस ने बताया कि पुलिस अत्याचार में शिव कुमार ने अपनी आंख की आधी रोशनी खो दी है. उस पर लगातार समझौता करने का दबाव बनाया जा रहा था लेकिन शिव कुमार और उनका परिवार न्याय के लिए डटा रहा. वहीं वकील ने आगे कहा कि हम अगली सुनवाई में एफआईआर दर्ज करने और सीबीआई जांच कराने की मांग करेंगे.

पंचकुला जिला कोर्ट ने इस मामले पर जुलाई में अपनी जांच पूरी की थी और अगस्त में हाई कोर्ट को रिपोर्ट सौंपी थी. जांच सामने आया कि पुलिस के अपराध को छिपाने के लिए सरकारी डॉक्टरों की मिलीभगत भी थी. हरियाणा के मुख्य सचिव को भेजे गए पत्र का जवाब नहीं मिला है, जिसमें जांच रिपोर्ट पर उनकी प्रतिक्रिया मांगी गई थी. वहीं अधिकारियों ने पूछताछ के दौरान किसी तरह की मिलीभगत से इनकार किया है.

रिपोर्ट के अनुसार, “शिव कुमार की 24 जनवरी 2021 से 2 फरवरी 2021 के दौरान पांच बार जांच की गई, लेकिन सरकारी अस्पताल, सोनीपत के किसी भी डॉक्टर या जेल में तैनात डॉक्टर ने पुलिस अधिकारियों के साथ मिलीभगत के चलते अपनी ड्यूटी नहीं निभाई”

बता दें कि हाई कोर्ट के आदेश पर 20 फरवरी, 2021 को चंडीगढ़ में सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की मेडिकल जांच में शिव कुमार के हाथ और पैर में फ्रैक्चर और उनके पैर की अंगुली पर टूटे हुए नाखून की रिपोर्ट जारी की थी. साथ ही रिपोर्ट में शिव कुमार को मानसिक तनाव देने की बात भी सामने आई थी. रिपोर्ट में कुंडली पुलिस स्टेशन के सब-इंस्पेक्टर शमशेर सिंह को यातना के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार बताया गया है साथ ही उसी पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर रवि कुमार और क्राइम इन्वेस्टिगेशन एजेंसी सोनीपत के रविंदर को अवैध कारावास और यातना में शामिल होने के लिए नामित किया गया है.

शिव कुमार के अनुसार सोनीपत के प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट ने उन्हें देखे बिना ही अवैध कारावास के बाद उनका पुलिस रिमांड दे दिया था. शिवकुमार के वकील बैंस ने कहा, “रिपोर्ट से पता चलता है कि यहां केवल एक अधिकारी द्वारा किसी को प्रताड़ित नहीं किया गया था बल्कि एक मजिस्ट्रेट सहित पूरी व्यवस्था की मिलीभगत थी. हम माननीय उच्च न्यायालय से दोषियों को दंडित करने का एक उदाहरण स्थापित करने के लिए कहेंगे.

मजदूर नेता शिव कुमार ने बताया, “हिरासत के दौरान मेरी दाहिनी आंख में समस्या हो गई थी जिसका इलाज नहीं किया गया था और अब मुझे दाहिनी आंख से दिखाई नहीं देता है. उन्होंने कहा, ‘प्रशासन पर मामले को निपटाने का काफी दबाव है. लेकिन मैं चाहता हूं कि न्याय हो और दोषियों को सजा मिले.”

6 दिसंबरः मैने इतिहास को नंग धड़ंग देखा !

…अयोध्या आंदोलन के नेताओं के लिए न्यायपालिका नौटंकी कंपनी थी, उनका नारा था “बंद करो यह न्याय का नाटक जन्मभूमि का खोलो फाटक”. बाद में साबित हुआ कि उनकी आस्था भी सत्ता पाने के मंचित की गई नौटंकी थी जिसमें बच्चा बच्चा राम का मंत्र और शंख फूंकने, श्राप देने वाले, बाबर की औलादों को पाकिस्तान भेजने वाले धर्माचार्य-साधु- साध्वियां कलाकार थे, जिसमें जितना अभिनय था वह उतना पद, सम्मान, मेहनताना वगैरा लेकर किनारे लगा.

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कारसेवकों को भारत में मुगल साम्राज्य की नींव डालने वाले बाबर से एतिहासिक प्रतिशोध का सुख भव्य राममंदिर के रूप में पाना था जिसे भुला दिया गया, फिर भी उनकी हिंसक आस्था का प्रेत भटकता रहा तो उन्हें भ्रष्टाचार का झंखाड़ काटकर विकास की सड़क बनाने में झोंक दिया गया. तब हिंदू खून को खौलाकर जवानी को रामकाज में लगाया गया था, अब उस जवानी की अगली पीढ़ी को एक आदमी की भक्ति में लगा दिया गया है. कमाल ये है- भगवान की जगह आदमी ले चुका है लेकिन खून का उबाल वही है.

इस बीच चौथाई सदी बीत चुकी है जो आदमी की छोटी सी जिंदगी में इतना लंबा समय है कि उसे या तो अपने अनुभवों से कोई पक्का नतीजा निकाल लेना चाहिए या मान लेना चाहिए कि उसके दिमाग का पर्याप्त विकास नहीं हुआ है.

...तब मैं लखनऊ में दैनिक जागरण का शावक रिपोर्टर था जिसे एक प्रेसकार्ड दिया गया था, पर्ची दिखाने पर पंद्रह सौ रूपए तनख्वाह मिलती थी.

अखबार के मालिक नरेंद्र मोहन का जितना विस्तृत परिवार था उतने ही फैले धंधे थे. पत्रकारिता की ढाल के पीछे चीनी मिल, पेट्रोल पंप, शिक्षण संस्थान, रूपया सूद पर चलाने समेत कई कारोबार चल रहे थे. उनकी चालक शक्ति मुनाफा थी, नीति अवसरवाद और महत्वाकांक्षा थी तत्कालीन चढ़ती हुई राजनीतिक पार्टी भाजपा के पक्ष में जनमत का व्यापार करके धन कमाना और जल्दी से जल्दी शासक प्रजाति में शामिल होना जिसका अगला दिखता मुकाम राज्यसभा की मेंबरी थी. इसके लिए उन्होंने एक हार्ड टास्क मास्टर यानि गुंडा संपादक तैनात किया था जो सुबह चपरासी, सर्कुलेशन मैनेजर और पत्रकार किसी को भी पीट सकता था, दोपहर में किसी मजबूर महिला पत्रकार का रखैल की तरह इस्तेमाल कर सकता था लेकिन शाम को वह मालिक का ब्रीफकेस थाम कर विनम्र भाव से किसी मंत्री या अफसर से मुलाकात कराने चल देता था, आधी रात को एडिटोरियल मीटिंग बुलाकर पत्रकारिता के आदर्शों की भावभीनी निराई-गुड़ाई करने लगता था (फिर भी वह रीढ़विहीन बौद्धिक नक्काल संपादकों से बेहतर था. उसे मालिकों ने बूढ़े और बीमार हो जाने पर इस्तेमाल हो चुके टिशूपेपर की तरह फेंक दिया).

ऐसे सीनियर थे जो शावकों को संपादक के पैर छूकर उर्जा पाने की शास्त्रीय विधि सिखाते थे, एक हेडलाइन गलत लग जाने पर डरकर रोने लगते थे, रिटायरमेंट के एक दिन पहले जिंदगी का पहला स्कूटर खरीदने की मिठाई बांटते थे, एक प्रूफरीडर करपात्री जी भी थे जो दफ्तर में ही रहते थे, उनके कपड़े होली पर बदले जाते थे और वह दोनों वक्त सिर्फ पूड़ी खाते थे. (इन विचित्र किंतु सत्य कारनामों को मेरे स्वीडिश दोस्त पॉयर स्टालबर्ग ने तीन साल रिसर्च के बाद अपनी किताब लखनऊ डेली-हाऊ ए हिंदी न्यूजपेपर कंस्ट्रक्ट्स सोसाइटी, प्रकाशक-स्टाकहोम स्टडीज इन सोशल एंथ्रोपोलॉजी, में बेबाकी से लिखा है).

मैं छात्र राजनीति से पत्रकारिता में आया था. इस माहौल में भी मुझे यकीन था कि अपने वक्त का सच लिखने और अन्याय के शिकार लोगों की मदद करने का मौका मिल जाएगा. इसकी बुनियाद यह थी कि जब अखबार संकट में आता था तो संपादक को सर्कुलेशन दुरूस्त करने के लिए पत्रकारिता के सरोकारों को साथ ऐसे रिपोर्टर याद आने लगते थे जिनके पास भाषा, कॉमनसेंस और राजनीति की समझ थी.

दिसंबर 1992 के पहले हफ्ते में ऐसा ही एक मौका आया जब भरेपूरे व्यूरो को दरकिनार कर भाऊ राघवेंद्र दुबे, मुझे और दिनेश चंद्र मिश्र को अयोध्या कवर करने भेज दिया गया. चलते समय जो निर्देश दिए गए उन्हें मैने एक कान से सुना दूसरे से निकाल दिया क्योंकि पिछले ही साल मैने बनारस का दंगा एक लोकल इवनिंगर के लिए कवर किया था तब मैने दैनिक जागरण, आज, स्वतंत्र भारत जैसे अखबारों की अफवाह फैलाने और एतिहासिक तथ्यों को तोड़मरोड़ कर सांप्रदायिक उन्माद फैलाने की कलाकारी और प्रेस काउंसिल आफ इंडिया की लाचारी का मजाक बनाते देखा था.

अयोध्या के मठों और अखाड़ों में आरएसएस, भाजपा, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, शिवसेना और भांति भांति के धर्माचार्यों के संयुक्त कारखाने चल रहे थे जिनमें या तो सांप्रदायिक उन्माद का उत्पादन हो रहा था या विराट भ्रम का. लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल, महंत रामचंद्रदास समेत मंदिर आंदोलन के सभी नेता लीलाधर हो चुके थे. वे एक ही सांस में सुनियोजित रणनीति के तहत दो या अधिक बातें कह रहे थे- हम अदालत का सम्मान करते हैं लेकिन मंदिर आस्था का प्रश्न है जिसका फैसला अदालत नहीं कर सकती. राममंदिर चुनावी मुद्दा नहीं है लेकिन धर्म का राजनीति पर अंकुश नहीं रहा तो वह पतित हो जाएगी. कारसेवा प्रतीकात्मक होगी लेकिन मंदिर का निर्माण किए बिना कारसेवक वापस नहीं जाएंगे.

दूसरी ओर साध्वी ऋतंभरा, उमा भारती और विनय कटियार समेत बीसियों हाथों में दिन रात गरजते माइक थे जो पाकिस्तान में तोड़े गए मंदिरों की तस्वीरकशी करते हुए कारसेवकों को लगातार बानर सेना में बदल कर बाबर की औलादों को सबक सिखाने का अंतिम अवसर न चूकने देने की कसम दिला रहे थे. उन्माद इस स्तर पर पहुंचा दिया गया था कि अस्सी साल की बुढ़िया औरतें भी जो घरों में अपने हाथ से एक गिलास पानी भी न लेती होंगी “जिस हिंदू का खून न खौला खून नहीं वह पानी है” की धुन पर अपने कपड़ों से बेखबर नाचने लगीं लेकिन भ्रम भी ऐसा था कि कारसेवक रातों में अधीर होकर चंदा वापस मांगने लगते थे और ईंटे गठरी में लेकर वापस घर जाने की तैयारी करने लगते थे. मैने अपनी रिपोर्टों को इसी भ्रम और उन्माद के तथ्यों के सहारे नेताओं की कथनी-करनी के अंतर पर केंद्रित किया जो काफी एडिट करने के बाद बिल्कुल निरापद बनाकर छापी जाती थीं या रद्दी की टोकरी में डाल दी जाती थीं.

एक दिन सुबह का अखबार देखकर मेरे होश उड़ गए हम लोगों की संयुक्त बाईलाइन के साथ जाने किसकी लिखी एक काल्पनिक खबर बैनर के रूप में छपी थी- अयोध्या में मंदिर का अबाध निर्माण शुरू. मुझे उसी समय इंट्यूशन की तरह लगा कि इन भ्रमों के पीछे जिस छापामार योजना को छिपाने की कोशिश की जा रही है उसका पता मेरे अखबार को है और अंततः इस बार संविधान, न्यायपालिका वगैरह सबके सम्मान का स्वांग करते हुए विवादित ढांचे को ढहा दिया जाएगा. (एक से छह दिसंबर के बीच क्या हुआ यह लिखने की जरूरत नहीं है क्योंकि इसी साइट पर भाऊ राघवेंद्र दुबे लिख चुके हैं)

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छह दिसंबर की दोपहर बाबरी मस्जिद के गुम्बदों के गिरने का समय दर्ज करते हुए, सन्निपात में चिघ्घाड़ते, बड़बड़ाते पागल हो गए लोगों के चेहरे देखते हुए, दंगे में जलते हुए घरों के बीच फैजाबाद की ओर किसी से उधार ली गई मोटरसाइकिल पर भागते हुए, खबर लिखते हुए, कारसेवकों की पिटाई के दर्द के सुन्न हो जाने तक पीते हुए मैं यही अपने मन में बिठाता रहा कि लोकतंत्र एक नाटक है, आदमी अब भी पत्थर युग जितना ही बर्बर है, देश में कुछ निर्णायक रूप से बदल चुका है, असल मुद्दों को दफन कर की जाने वाली शार्टकट धार्मिक जहालत की कुर्सी दिलाऊ राजनीति को सदियों लंबा नया मैदान मिल गया है…मैं हैरान था क्योंकि इसी से जुड़ा एक व्यक्तिगत उपलब्धि जैसा भाव भी उमड़ रहा था- मैने सभ्यता का दूध नहीं खून पीते लंबे दांतो और टपकते पंजों वाले इतिहास को नंगधड़ंग अट्टहास करते देख लिया है.

उस छह दिसंबर को दुनिया पर गिरती चटक ऐसी ही धूप थी और मैं भी वहीं था. बाबरी मस्जिद गिरने से ज्यादा दंगे के बीच फैजाबाद पहुंच कर अपनी खबर भेजने के लिए परेशान. अकेला अनप्रोफेशनल काम यह किया जब कारसेवक मुझ पर झपटे तो मैने भी जवाब में एक दो को मारा। इसके बाद मैं कितने पैरो के नीचे कुचला गया नहीं पता अगर राघवेन्द्र दुबे (भाऊ) नहीं होते तो शायद मर जाता। आज सोच रहा हूं कि बीते बीस सालों की प्रोफेशनल तटस्थता का क्या हासिल रहा। मेरे भीतर का कितना बड़ा हिस्सा ये पत्तरकारिता लकवाग्रस्त कर गई है. उस समय भी जिनके लिए (अखबार था दैनिक जागरण) तटस्थ हुआ जा रहा था वे मंदिर बनवा रहे थे और राज्यसभा जा रहे थे। तब से तमाम चावला, चौधरी और अहलूवालिया बेशुमार बढ़े हैं जो प्रोफेशनल एथिक्स सिखाते हुए डकैतों की तरह माल बटोर रहे हैं.

तटस्थता पत्तरकारिता की सजावट है उससे भी अधिक पाखंड है.

.अनिल यादव

(अनिल यादव हिंदी के चर्चित लेखक और पत्रकार हैं। 6 दिसंबर को वे दैनिक जागरण की रिपोर्टिंग टीम के सदस्य बतौर  अयोध्या में मौजूद थे । अनिल इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। वह भी कोई देश है महाराज, सोनम गुप्ता बेवफा है, कीड़ाजड़ी, नगरवधुएं अखबार नहीं पढ़तीं और गोसेवक उनकी काफ़ी चर्चित किताबें हैं. )

साभार: मीडियाविजिल

सफाई कर्मचारियों के आंदोलन पर सरकार के कान बंद! स्कूली बच्चों और खिलाड़ियों से उठवा रही कूड़ा

सफाई कर्मचारियों की हड़ताल से प्रदेश के विभिन्न शहरों में कूड़ा-करकट जमा हो गया है. स्थिति दिनों दिन खराब होती जा रही है. ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रदेशभर में अपनी मांगों को पूरा करने के लिए सफाई कर्मचारी 19 अक्टूबर से हड़ताल पर हैं. शुक्रवार को हर जिले में शहरी स्थानीय निकाय मंत्री कमल गुप्ता का पुतला फूंका गया. कर्मचारियों ने नगर निगम कार्यालयों से सरकार विरोधी नारेबाजी करते हुए मार्च निकाले.

लगभग हर शहर की सभी सड़कों पर कूड़े के ढेर देखे जा सकते हैं. कूड़े के ढेर से उठ रही दुर्गंध ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है. हरियाणा के शहर दीवाली पर भी कूड़े के ढेरों से अटे रहे.

इस मामले को लेकर सफाई कर्मचारी राजेश ने हमें बताया, “हरियाणा में सरकार ने सफाई के लिए निजी कंपनियों को सफाई का ठेका दे रखा है जो हम सफाई कर्मचारियों का शोषण करती हैं और समय पर पूरे पैसे भी हमें नहीं देती हैं. जब काम हम सरकार का और पब्लिक का कर रहे हैं तो हमारा शोषण निजी ठेकेदार क्यों करे. सरकार हमें पक्का करे.”

नगरपालिका कर्मचारी संघ हरियाणा के प्रदेशाध्यक्ष नरेश कुमार शास्त्री ने कहा कि कर्मचारी मजबूती से हड़ताल पर डटे हुए हैं, बीते सोमवार को दीपावली के पर्व पर हड़ताली कर्मचारियो ने काले झंडों व उल्टी झाड़ू के साथ राज्य भर में प्रदर्शन कर काली दिवाली मनाई है. हड़ताल को विफल करने के तमाम प्रयासों के बावजूद 57 नगर पालिकाओं, 22 नगर परिषदों व 11 नगर निगमों के सफाई, सीवर फायर व तृतीय व चतुर्थ श्रणी के लगभग चालीस हजार कच्चे व पक्के कर्मचारी हड़ताल पर डटे हुए हैं.

सीटू हरियाणा की प्रधान सुरेखा ने कहा कि सरकार हड़ताली कर्मचारियों की मांगों का तुरंत समाधान करें वरना आंदोलनकारियों के समर्थन में सीटू से जुड़ी तमाम यूनियनें 31 अक्टूबर को सभी जिलों में प्रदर्शन करेंगी.

शहरी स्थानीय निकाय मंत्री कमल गुप्ता और सफाई कर्मचारी संघ के एक प्रतिनिधिमंडल के बीच 28 अक्टूबर को हिसार में बैठक बेनतीजा रही. कर्मचारियों के प्रतिनिधिमंडल ने कथित तौर पर बैठक को बीच में ही छोड़ दिया. हिसार में सफाई कर्मचारी संघ के प्रमुख राजेश ने कहा कि उन्होंने मंत्री के साथ कुछ बिंदुओं पर चर्चा की, लेकिन एक समझौते पर पहुंचने में विफल रहे. उन्होंने अधिकारियों को कल (29 अक्टूबर) तक का अल्टीमेटम दिया था, जिसके बाद वे अपनी भविष्य की कार्रवाई का खाका तैयार करेंगे.

मंत्री ने बाद में कहा कि कुछ कर्मचारी बातचीत नहीं करना चाहते हैं और इस मुद्दे पर कोई फैसला नहीं हो सका है. मंत्री ने कर्मचारियों को डराते हुए पत्रकारों को बताया कि “कानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश करने वाले कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी. हम अभी भी बातचीत के लिए तैयार हैं.”

19 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल कर रहे सफाई कर्मियों की आवाज सरकार सुनने को तैयार नहीं है, बल्कि सफाई के वैकल्पिक उपाय कर रही है, जिससे गुस्साए कर्मचारियों ने अब नगर निगम गुरुग्राम (एमसीजी) की सड़कों पर सफाई करने वाली मशीनों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है ताकि शहरों में जमा हजारों टन कचरे को साफ करने से रोका जा सके.

प्रदर्शनकारियों को दूर रखने के लिए पुलिस कंट्रोल रूम (पीसीआर) वाहनों को सभी स्वीपिंग मशीन के साथ तैनात किया गया है. गुड़गांव के एमसीजी के संयुक्त आयुक्त नरेश कुमार ने कहा कि अधिकारियों ने 500 टन से अधिक कचरा साफ कर दिया है, लेकिन नगर निकाय की टीमें लगातार खतरे में हैं.

नरेश कुमार ने बताया, “प्रदर्शनकारी न केवल श्रमिकों को बल्कि मशीनों को भी निशाना बना रहे हैं. वे इन्हें नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि हम कचरा साफ न कर सकें. अब हमें रोड स्वीपिंग मशीनों की सुरक्षा के लिए पीसीआर वाहन मिल गए हैं. प्रदर्शनकारी दिन-ब-दिन के साथ आक्रामक होते जा रहे हैं.”

बड़े अफसर सफाई करवाने की अलग अलग तरह की कोशिशें कर रहे हैं. इन्हीं कोशिशों में सीएम सिटी करनाल के अफसरों ने तो स्कूली बच्चों को सफाई करने में लगा दिया. शहर के विभिन्न स्कूलों के एनएसएस वॉलेंटियर्स ने अपने स्कूलों के आसपास सफाई की, जबकि खेल विभाग के खिलाड़ियों और कर्मचारियों ने कोर्ट कॉम्पलेक्स की सफाई के लिए झाड़ू लगाई.

केएमसी आयुक्त अजय सिंह तोमर के आदेश के बाद, सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल फॉर बॉयज़, श्री राम चरित मानस सीनियर सेकेंडरी स्कूल, टैगोर बाल निकेतन और वीयूएमएम जैन पब्लिक स्कूल के एनएसएस वॉलेंटियरों के अलावा खेल विभाग के खिलाड़ियों, कर्मचारियों और कोचों ने इसमें भाग लिया.

टैगोर बाल निकेतन के प्रधानाचार्य राजन लांबा ने कहा, “हमारे छात्रों ने स्कूल के पास की सड़कों की सफाई की और हम आने वाले दिनों में भी इसी भावना के साथ जारी रखेंगे.”

हड़ताल से सीएम सीटी में सफाई कार्य प्रभावित हुआ है. हालांकि केएमसी ने सड़कों की सफाई और कचरा उठाने के लिए लगभग 100 निजी कर्मचारियों को तैनात किया है, लेकिन विरोध करने वाले कर्मचारी बाधा उत्पन्न कर रहे हैं. केएमसी को पुलिस की मदद लेनी पड़ी और तीन दिन पहले निजी कर्मचारियों को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने से रोकने के लिए 24 लोगों को गिरफ्तार भी किया गया.

सफाई कर्मचारियों की इस हड़ताल का समर्थन पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा ने भी किया है. उन्होंने कहा, “कांग्रेस सरकार के दौरान उन्होंने 11 हजार सफाई कर्मियों की भर्ती की थी. भविष्य में फिर से सरकार बनने पर इन तमाम कर्मचारियों को पक्का किया जाएगा.”

दक्षिण हरियाणा: बिजली ट्यूबवेल सिंचाई का किसानों और भूजल स्तर पर गहरा असर!

हरियाणा के बिसोहा गांव (रेवाड़ी जिला) निवासी दीपक पिछले 20 वर्षों से खेती में लगे हैं. वह खेतों में बिजली ट्यूबवेल द्वारा फुव्वारा तकनीक से सिंचाई करते हैं. गांव में खेतों की सिंचाई के लिए अन्य साधन उपलब्ध नहीं हैं. इसी कारण गांव में ज्यादातर किसान सिंचाई के लिए बिजली ट्यूबवेल का प्रयोग करते हैं. दीपक के मुताबिक बिजली ट्यूबवेल से सिंचाई का खर्चा कम पड़ता है. महीने में ट्यूबवेल द्वारा सिंचाई का खर्च 80 रूपए है, जो ज्यादा नहीं है. इसलिए वह सोलर पम्पसेट के बारे में नहीं सोच रहे.

दीपक बताते हैं कि खाली पड़ी जमीन भी ख़राब हो रही है और जमीन का अन्य प्रयोग भी नहीं हो रहा है. इसलिए ट्यूबवेल लगवाकर खेतों में सिंचाई करते हैं. जमीनी पानी भी लगातार खारा हो रहा है और नीचे जा रहा है लेकिन सिंचाई का साधन भी ट्यूबवेल ही है. यहां कोई नहर नहीं है. बिजली ट्यूबवेल से सिंचाई की लागत डीज़ल ट्यूबवेल की तुलना में कम आती है.

अहीरवाल में सिंचाई फुव्वारा तकनीक से ही होती है. गांव के सरपंच नितेश कुमार ने बताया कि फुव्वारा तकनीक द्वारा सिंचाई करने से लाइन बदलने के लिए मजदूर लगाने पड़ते हैं, जिस कारण सिंचाई का खर्च बढ़ जाता है यदि सिंचाई के लिए पानी अन्य स्रोतों द्वारा मिल जाए तो खेतों में खुली सिंचाई की जा सकेगी, जिससे अन्य कई खर्च (पाइपलाइन, मजदूरी आदि) बच जाएंगे.

इस इलाके में ज्यादातर किसान अपना जीवन चलाने के लिए खेती पर निर्भर हैं, लेकिन खेती से लगातार आय कम होती जा रही है. फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पाता तो फसलों की लागत भी पूरी नहीं होती. जब दीपक और बिसोहा के गांव वालों से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (2015) के बारे में पूछा गया तो उन्हें इस योजना के बारे में नहीं पता था.

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत सरकार किसानों को खेत में सिंचाई करने के लिए उचित मात्रा में पानी उपलब्ध करवाने और सिंचाई उपकरणों के लिए सब्सिडी प्रदान करती है. सुनील कुमार शोधार्थी हैं और ग्रामीण एवं औद्योगिक विकास अनुसन्धान केंद्र चंडीगढ़ में काम कर चुके हैं. उनका शोध कार्य “खेती के कार्यो में बिजली के उपयोग” से संबधित है. सुनील कुमार से संबंधित विषय पर बात करने पर उन्होंने बताया कि पेट्रोल तथा डीजल से सिंचाई की लागत ज्यादा है, जिस कारण फसलों की उत्पादन लागत बढ़ती है. सिंचाई लागत कम होने की वजह से किसान बिजली टूबवेल की तरफ ज्यादा रुझान कर रहे हैं, जिससे किसानों के उत्पादन एरिया में भी बढ़ोतरी हुई है. लेकिन उत्पादित फसल चक्र में परिवर्तन नकारात्मक हो रहा है. किसान गहन सिंचाई की फसलों जैसे धान और गेहूं से कम गहन सिंचाई (कम सिंचाई) की फसलों सरसों, बाजरा आदि की तरफ आ रहे हैं, लेकिन बिजली टूबवेल की तरफ ज्यादा रुझान का विपरीत प्रभाव यह हो रहा है कि भूजल ज्यादा प्रयोग होने की वजह से भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है. किसानों को अपने ट्यूबेल पम्प सेट ज्यादा गहरे करवाने पड़ रहे हैं जिससे पम्प सेट की लगता में बढ़ोतरी हो रही है.

देश में भूजल स्तर लगातार कम हो रहा है. डाउन-टू-अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय जल शक्ति व सामाजिक न्याय मंत्री रतन लाल ने मार्च 2020 में संसद में जानकारी दी कि किसान 2001 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1816 घनमीटर थी, जो साल 2021 में 1488 घनमीटर रही और साल 2031 में काम होकर 1367 घनमीटर हो सकती है.

हरियाणा सरकार की रिपोर्ट के अनुसार “हरियाणा के कृषि योग्य भूमि की सिंचाई नहर, डीजल तथा बिजली ट्युबवेल्स आदि के माध्यम से की जाती है. हरियाणा में सिंचित कृषि क्षेत्र का 1154 हजार एकड़ भूमि नहरों द्वारा तथा 1801 हजार एकड़ भूमि टुबवेल्स द्वारा सिंचित किया जाता है. हरियाणा में कुल 821399 बिजली ट्यूबवेल्स तथा डीजल पंप सेट हैं जिसमें 275211 डीजल पंप से तथा 546188 बिजली पंप सेट हैं. रेवाड़ी जिले की बात की जाए तो यहां कुल 13605 ट्यूबवेल तथा पंपसेट हैं जिसमें 3311 डीजल और 10294 बिजली ट्यूबवेल पंपसेट हैं.

मौसम अनुसार फसलों की पैदावार

बिसोहा निवासी दीपक कहते हैं कि खरीफ (ग्रीष्म काल) के मौसम में कपास तथा बाजरा और रबी (शीत काल) मौसम में गेहूं तथा सरसों की फसलों का उत्पादन करते हैं. एक एकड़ में गेंहू की पैदावार 50 से 55 मण (1मण=40 किलोग्राम) है, एक एकड़ में सरसों की पैदावार 20 से 25 मण है, एक एकड़ में बाजरा की पैदावार 20 से 22 मण है, खरीफ की फसलों में 1 से 2 बार सिंचाई करते हैं तथा रबी की फसल सरसों में 2 से 3 बार और गेहूं की फसल में 5 से 7 बार सिंचाई करते हैं, यदि समय पर बारिश हो जाए तो ट्यूबवेल द्वारा 1 या 2 सिंचाई कम करनी पड़ती है. बिसोहा से लगभग 35 किलोमीटर दूर मीरपुर निवासी हरि सिंह अपने खेतों में गेहूं और बाजरा की पैदावार करते हैं. गेहूं में सरसो, बाजरा तथा कपास की तुलना में ज्यादा सिंचाई की जरूरत पड़ती है. एक एकड़ में गेहूं की पैदावार लगभग 38-40 मण (1 मण=40 किलोग्राम) और बाजरा की पैदावार लगभग 18-20 मण होती है.

डॉ अजय कुमार एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर महेन्द्रगढ़ ने बताया कि मिट्टी में सॉइल आर्गेनिक कॉम्पोनेन्ट की कार्बन संरचना होती है जिससे मिट्टी की उपजाऊपन बना रहता है, खारा पानी, रासायनिक खाद, फसल चक्रण आदि से सॉइल आर्गेनिक कम्पोनेंट का अनुपात कम होता जा रहा है. ग्रामीण जनसंख्या की कृषि पर ज्यादा निर्भरता तथा साधन उपलब्धता के कारण फसल चक्रण के बीच अंतर कम होता जा रहा है. पहले किसान फसल चक्र के बीच अंतर करते थे जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति ठीक बनी रहती थी, साथ-साथ जलवायु परिवर्तन से तापमान में जो वृद्धि हो रही है, वह भी फसलों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है. जैसे मार्च 2022 में हीट वेव (ज्यादा तापमान) के कारण गेहूं की पैदावार में 15% से ज्यादा की कमी आयी है.

खारा (नमकीन) पानी और रासायनिक खाद का खेती पर प्रभाव

राजेश कुमार एक एकड़ गेहूँ 70 से 75 किलोग्राम और सरसो में 50 किलोग्राम तथा बाजरा में 25 से 30 किलोग्राम रासायनिक खाद का प्रयोग करते हैं. वह बताते हैं, “रासायनिक खाद के ज्यादा प्रयोग के कारण मिट्टी की पैदावार भी कम हो रही है. देसी खाद (गोबर की खाद) जमीन को तो ठीक रखता है, लेकिन उससे पैदावार पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता. रासायनिक खाद जमीन को तो ख़राब कर रहा है, पर पैदावार पर देसी खाद की तुलना में ज्यादा असर डालता है.”

कृषि विज्ञान केंद्र झज्जर (हरियाण) से संदर्भित विषय में सम्बंधित जानकारी लेने पर उन्होंने बताया कि रेवाड़ी से लगते हुए झज्जर का दो तिहाई पानी खारा (नमकीन) हो गया है, जिससे मिट्टी लवणीय (कैल्सियम, मैग्निसियम और सल्फेट आयन की अधिकता) होती जा रही है. फसल चक्र में रबी सीजन में गेहूं तथा खरीफ सीजन में पेड्डी चावल, बाजरा तथा कपास की फसलों का उत्पादन किया जाता है. रासायनिक खाद का प्रयोग खेत की मिट्टी को कृषि विज्ञान केंद्र की लैब में चेक करवा के करना चाहिए लेकिन ज्यादातर किसान आपस में एक दूसरे से बात करके रासायनिक खाद का प्रयोग करते हैं.

अस्सिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.नवीन कटारिया ने बताया कि दक्षिणी हरियाणा की जमीन में फसल उत्पादन के आवश्यक तत्व (जिंक, कॉपर, मैंगनीज, आयरन,कॉपरआदि) कम मात्रा में पाए जाते हैं इसके साथ-साथ भूजल में फलोरिड, नमक की मात्रा ज्यादा है इसलिए फसल उत्पादन लगातार कम हो रहा है. जिस कारण किसानों को लगातार ज्यादा रासायनिक खाद का प्रयोग करना पड़ रहा है. जो रसायनिक खाद नाइट्रोजन फॉस्फोरस और पोटैशियम के आदर्श अनुपात (4:2:1) से ज्यादा है. फलोरिड और नमक युक्त भूजल दक्षिण हरियणा के जन मानस को भी बहुत ज्यादा प्रभावित कर रहा है, क्योंकि वहां के लोग पेय जल के रूप में भी इसी पानी का उपयोग करते हैं, जिससे मुख्यत दांतों की बीमारी दांतो का पीला पड़ना देखा जा सकता है.

हरियाणा का भूजल स्तर

बिसोहा निवासी हरीश ने 15 वर्ष पहले 150 फीट गहराई में ट्यूबवेल लगवाया था. पहले पांच वर्षों तक अच्छे से पानी चला लेकिन बाद में टूबवेल पानी छोड़ने लगा फिर ट्यूबवेल को दो बार 20- 20 फीट गहरा किया जा चुका है, लेकिन भूजल लगातार नीचे जाने की वजह से अब एक एकड़ फसल की सिंचाई के लिए दो-तीन बार ट्यूबवेल को चलना और बंद करना पड़ता है. जमीन में पानी इकट्ठा हो सके और खेत की सिंचाई पूरी हो सके, इसके लिए 3 किला (एकड़) जमीन की सिंचाई में एक सप्ताह का समय लग जाता है. फसलों को समय पर पानी नहीं मिलने से फसलों की पकावट अच्छी नहीं हो पाती है. जिस कारण खेतो में कुल पैदावार भी कम होती है.

डॉ अजय कुमार के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश होने की प्रवृति बदल रही है. मानसून स्तर में पहले बारिश लगातार होती रहती थी लेकिन अब कभी बहुत ज्यादा और कभी कई दिनों तक बारिश नहीं होती है, जिससे जमीनी पानी का रिचार्ज नहीं हो पाता है. महेन्द्रगढ़ तथा उसके आसपास के एरिया का पानी प्रतिवर्ष 1 मीटर से 3 मीटर तक नीचे जा रहा है, और पानी खारा (नमकीन) हो रहा है. पानी में फ्लोरिड की मात्रा भी बढ़ती जा रही है, इसके कई कारण है जैसे इंडस्ट्रीज से निकलने वाला पानी, ज्यादा फर्टीलिज़ेर का प्रयोग आदि है.

डॉ.नवीन कटारिया ने बताया कि लगातार पानी का उपयोग करने तथा दक्षिण हरियाणा की वातावरणीय पारिस्तिथि शुष्क और रेतीली जमीन होने की वजह से यहां बारिश भी कम मात्रा में होती है, जिससे जमीन से निकलने वाले पानी की पूर्ति वापिस बारिश के पानी से पूरी नहीं हो पाती है. पहले भूजल की पूर्ति गांव में तालाब और जोहड़ों से भी हो जाती थी लेकिन अब गांव में तालाब और जोहड़ लगभग सूख चुके हैं. भूजल में फ्लोराइड के ज्यादा होने के कई कारण हो सकते हैं, दक्षिणी हरियाणा में मुख्य वजह चट्टानों का घुलना है, यह बारिश और भूजल के कारण हो रहा है. कई चट्टानों में फ्लोराइड, एपेटाइट और बिओटिट आदि की मात्रा ज्यादा होती है. इन चट्टानों के अपक्षय (घुलना) से भूजल में फ्लोराइड की मात्रा बढ़ जाती है. खेतों में फसल उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रयोग किये जाने वाले ज्यादा रासायनिक खाद (फॉस्फेट फर्टिलिसेर) से भी फ्लोराइड बढ़ता है.

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की रिपोर्ट के अनुसार “सामान्य मानसून लंबी अवधि का औसत 2005 से 2010 में सामान्य मानसून वर्षा की LPA दर 89.04 सेन्टीमीटर थी, जो 2011 से 2015 के बीच कम होकर 88.75 सेन्टीमीटर तथा 2018 से 2021 के बीच और भी कम होकर 88.6 सेन्टीमीटर हो गया है.”

कृषि विज्ञान केंद्र झज्जर से मिली जानकारी के अनुसार रेवाड़ी जिले से लगे हुए झज्जर जिले में चोवा (जमीनी पानी की उपलब्धता) 20-30 फीट है, लेकिन वह पानी खरा (नमकीन) है, जो किसी उपयोग लायक नहीं है. खेतो में सिंचाई तथा अन्य उपयोग के लिए अच्छे भूजल 80-100 फ़ीट की गहराई पर मिलता है.

पोस्ट ग्रेजुएट गवर्नमेंट कॉलेज तोशाम तथा बिहार सरकार के जीआईएस विभाग में काम कर चुके असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ वीरेंदर सिंह ने बताया कि रेवाड़ी तथा झज्जर भूजल स्तर की उपलब्धता में अन्तर का मुख्य कारण यह है कि रोहतक और झज्जर जिले में पानी के नहरी व्यवस्था अच्छी है, जिससे जमीन को लगातार पानी मिलता रहता है तथा नहरों के पानी रिसाव से भूजल रिचार्ज होता रहता है. इसी कारण यहां पर जलभराव की समस्या भी हो जाती है जबकि रेवाड़ी में नहरी व्यवस्था अच्छी नहीं है. दक्षिणी हरियाणा मुख्यत रेवाड़ी, महेन्द्रगढ़ और मेवात में रेतीली जमीन होने के साथ-साथ पहाड़ी इलाका है. जबकि रेवाड़ी के साथ लगते झज्जर जिले में जमीन मिट्टी युक्त है.

रेवाड़ी में नहरी व्यवस्था अच्छी नहीं है. दक्षिणी हरियाणा की भूगर्भिक संरचना हरियाणा के अन्य भाग से अलग होने की वजह से रोहतक, झज्जर का भूजल भी रेवाड़ी महेन्द्रगढ़ की तरफ नहीं जा पता है, जिस कारण जमीन को पानी भी कम मिल पाता है, जिससे भूजल स्तर लगातार गहरा हो रहा है.

मोंगाबे की रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा के करीब 25.9 प्रतिशत गांव गंभीर रूप से भूजल संकट से जूझ रहे हैं, इसी तरह की स्थिति उतर प्रदेश और बिहार में बन रही है. हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण (HWRA) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार हरियाणा के 319 गांव संभावित जल भराव वाले गांव हैं, जिनमें जल स्तर की गहराई 1.5 से 3 मीटर तक है हरियाणा में 85 गांव ऐसे हैं जो गंभीर रूप से जलजमाव से जूझ रहे हैं, जहां जल स्तर की गहराई 1.5 मीटर से कम है.

(यह स्टोरी स्वतंत्र पत्रकारों के लिए नेशनल फाउंडेशन फ़ॉर इंडिया की मीडिया फेलोशिप के तहत रिपोर्ट की गई है.)

हिसार में भीम आर्मी और पुलिस का टकराव, 25 घायल

हरियाणा के हिसार जिले में भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं पर 21 सितंबर की शाम को हिसार पुलिस ने मिनी सचिवालय घेरने के चलते लाठीचार्ज कर दिया. लाठीचार्ज से गुस्साए प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर पुलिस कर्मियों पर पथराव किया, जिसमें भीम आर्मी के करीब 20 कार्यकर्ता और कुछ पुलिसकर्मी घायल हो गए. घायल पुलिसकर्मियों को यहां सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जबकि घायल प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने तीतर-बीतर कर दिया.

डीएसपी नारायण चंद ने अपने एक ब्यान में कहा कि प्रदर्शनकारियों ने मिनी सचिवालय में जबरन घुसने की कोशिश की और पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया.

पुलिस अफसरों के ब्यान के उल्ट भीम आर्मी के जिला प्रवक्ता संत लाल अंबेडकर का कहना है कि पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, जिससे उनके 20-25 कार्यकर्ता घायल हो गए. उन्होंने कहा कि असामाजिक तत्व पथराव में शामिल हैं. उन्होंने पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग की.

यह घटना उस समय की है जब बिजली मंत्री रंजीत सिंह मिनी सचिवालय में बैठक कर रहे थे. उस समय लगभग 100 प्रदर्शनकारियों ने कापड़ो गांव में मृत पाए गए व्यक्ति की हत्या का मामला दर्ज करने की मांग को लेकर सिविल अस्पताल से मिनी सचिवालय तक विरोध मार्च निकाला. अनुसूचित जाति समुदाय से ताल्लुक रखने वाला विक्रम करीब 14 दिन पहले कापड़ो गांव के पास मृत पाया गया था.

प्रदर्शनकारियों ने उपायुक्त को एक ज्ञापन सौंपने की योजना बनाई और शहर में मार्च निकाला. जब वे मिनी सचिवालय के पास पहुंचे तो पुलिस ने उन्हें रोक लिया. डीएसपी नारायण चंद ने पत्रकारों को बताया, “पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को 10 मिनट इंतजार करने को कहा था ताकि एक प्रशासनिक अधिकारी वहां आकर ज्ञापन स्वीकार कर सके और उनसे बातचीत कर सके. हालांकि, प्रदर्शनकारियों ने मिनी सचिवालय में जबरन घुसने की कोशिश की और पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया. घटना में करीब 10-15 पुलिसकर्मियों को चोटें आई हैं.”

एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि यह एक पूर्व नियोजित हमला था क्योंकि प्रदर्शनकारी अपने साथ पत्थर और कांच की बोतलें ले जा रहे थे.

इस प्रदर्शन में शामिल रहे साहिल ने बताया, “हम लोग डीसी साहब को बस ज्ञापन सौपंना चाहते थे, लेकिन पुलिस ने हमें मिनी सचिवालय तक भी नहीं पहुंचने दिया और पहले ही रोक लिया. जब हमने ज्ञापन की बात की तो पुलिस ने हमारे ऊपर लाठीचार्ज कर दिया और हमें जातिसूचक गालियां देते हुए हमारी पिटाई की. हमारे साथी सरकारी अस्पताल जाना चाहते थे ताकि मेडिकल करवाया जा सके, लेकिन पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. हमारी मांग है कि गिरफ्तार किए गए प्रदर्शनकारियों को रिहा किया जाए.”