वर्ल्‍ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में लगातार पिछड़ता क्यों जा रहा है भारत?

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार के मंत्री, उनकी भारतीय जनता पार्टी के नेता और उनके समर्थक अक्सर यह कहते दिखते हैं कि पिछले कुछ सालों में भारत ने कितने वैश्विक सूचकांकों में प्रगति दर्ज की है।

अक्सर ये लोग ईज ऑफ डूइंग बिजनेस यानी कारोबार करने की सहूलियत से संबंधित रिपोर्ट का हवाला देते हैं। इसमें भारत ने काफी सुधार किया है। ऐसे ही कुछ और सूचकांक हैं जो आर्थिक प्रगति से संबंधित हैं, उनमें भी भारत की स्थिति सुधरी हुई दिखती है।

लेकिन सामाजिक जीवन और जीवन स्तर में सुधार से संबंधित सूचकांकों में भारत की स्थिति लगातार खराब हो रही है। अभी पिछले दिनों वर्ल्‍ड हैप्पीनेस इंडेक्स यानी वैश्विक खुशहाली रिपोर्ट सामने आई।

संयुक्त राष्ट्र की संस्था सस्टेनेबल डेवलपमेंट साॅल्यूशंस नेटवर्क यह रिपोर्ट तैयार करती है। इस रिपोर्ट में 156 देशों में खुशहाली के स्तर का मूल्यांकन किया जाता है। इसके लिए इस संस्था ने छह मानक तैयार किए हैं। इन मानकों में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद, सामाजिक सहयोग, भ्रष्टाचार में कमी, सामाजिक स्वतंत्रता, स्वस्थ्य जीवन की संभावना शामिल हैं।

इन मानकों पर भारत में खुशहाली की स्थिति का आकलन करके इस संस्था ने बताया है कि 1546 देशों की इस सूची में भारत का स्थान 140वां है। पिछले साल भारत 133वें स्थान पर था। इसका मतलब यह हुआ कि पिछले एक साल में भारत रैंकिंग के मामले में सात पायदान नीचे आया है।

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि फिनलैंड दुनिया का सबसे खुशहाल देश है। हैरानी की बात तो यह भी है कि भारत से अच्छी रैंकिंग भारत के पड़ोसियों की है। पाकिस्तान इस सूची में 67वें स्थान पर है। चीन का स्थान 93वां है। वहीं बांगलादेश विश्व के खुशहाल देशों में 125वें स्थान पर है।

दरअसल, 2013 के बाद से वैश्विक खुशहाली रिपोर्ट में भारत की स्थिति लगातार खराब हो रही है। 2013 में भारत 111वें स्थान पर था। लेकिन सुधार की बजाए 2015 में भारत और पीछे चला गया और 117वें स्थान पर रहा। 2016 में भारत 118वें स्थान पर पहुंच गया। 2017 में और गिरावट हुई और भारत 122वें स्थान आ गया। 2018 में फिसलन और तेज हुई और भारत 133वें स्थान पर पहुंच गया। 2019 में भारत का 140वां स्थान है।

अब सवाल उठता है कि आखिर भारत के साथ ऐसी क्या समस्या है कि खुशहाली के मामले में देश लगातार पिछड़ता जा रहा है। इसके लिए इस सूचकांक के पैमानों के हिसाब से भारत की स्थिति को देखना होगा।

प्रति व्यक्ति जीडीपी की बात करें तो इसमें आंकड़ों में तो भारत में तेजी दिखती है लेकिन जमीनी स्तर पर जो आर्थिक गैरबराबरी है, उससे जीडीपी में बढ़ोतरी का कोई खास फायदा खुशहाली के स्तर पर नहीं दिखता। ऐसे ही स्वस्थ्य जीवन का मसला है। सरकार की कोशिशों के बावजूद जन स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति देश में बुरी है। न तो जन स्वास्थ्य सेवाओं का व्यापक प्रसार है और न ही इन केंद्रों पर जरूरत की सेवाएं उपलब्ध हैं, ऐसे में बेहतर स्वास्थ्य के मोर्चे पर देश लगातार पिछड़ता ही जा रहा है।

सामाजिक सहयोग का तात्पर्य यह है कि अगर किसी व्यक्ति के सामने कोई मुसीबत आ जाए तो उसकी मदद की क्या व्यवस्था है। इसके लिए व्यक्ति और परिवार के स्तर पर क्या व्यवस्था और सरकार के स्तर पर इसके लिए सांस्थानिक व्यवस्थाएं क्या हैं। इस मोर्चे पर देखा जाए तो भारत में बहुत सुखद तस्वीर नहीं दिखती। अगर ऐसा होता तो बड़ी संख्या में किसान हर साल खुदकुशी करने को विवश नहीं होते।

भ्रष्टाचार की स्थिति से देश का हर व्यक्ति वाकिफ है। इस मोर्चे पर अपेक्षित सुधार नहीं हो पा रहा है। इसकी वजह से आम लोगों के लिए जरूरी सुविधाएं हासिल कर पाना मुश्किल हो गया। भ्रष्टाचार को लेकर जो वैश्विक रिपोर्ट आती हैं, उसमें भारत की बुरी स्थिति इस बात का प्रमाण है कि अभी इस मोर्चे पर भारत को काफी कुछ करने की जरूरत है।

व्यक्तिगत और सामाजिक स्वतंत्रता के मामले में भी स्थिति उतनी अच्छी नहीं है जितनी होनी चाहिए। कई बातों में पुलिसिंग भारत में होती है। यह रवैया वेश-भूषा से लेकर खान-पान तक में अपनाया जा रहा है। एक खास तरह की सोच को लोगों पर जबरन थोपने की कोशिश भी होती है।

हमें समझना होगा कि जब तक इन मोर्चों पर स्थितियों में सुधार नहीं होगा तब तक न तो भारत में खुशहाली बढ़ेगी और न ही वैश्विक खुशहाली रिपोर्ट में भारत की स्थिति सुधरेगी।