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  • कृषि अध्यादेशों के खिलाफ किसानों ने ट्विटर और ट्रैक्टर को बनाया हथियार

    खेती-किसानी को प्रभावित करने वाले केंद्र सरकार के तीन अध्यादेशों के खिलाफ हरियाणा-पंजाब सहित कई राज्यों में किसानों ने विरोध का बिगुल बजा दिया है। सोमवार को हरियाणा-पंजाब के हजारों किसान ट्रैक्टर लेकर सड़कों पर उतर आए। किसानों का यह विरोध-प्रदर्शन की ट्विटर पर भी खूब चर्चाएं बटोर रहा है।

    किसानों का यह विरोध फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर खरीद की व्यवस्था को कमजोर या खत्म करने की आशंका से उपजा है। पिछले महीने केंद्र सरकार ने किसानों को कहीं भी, किसी को भी उपज बेचने की छूट देने सहित कई मंडी सुधारों को ऐलान करते हुए तीन अध्यादेश जारी किए थे।

    ये अध्यादेश हैं
    – कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश, 2020
    – मूल्‍य आश्‍वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता और कृषि सेवा अध्‍यादेश – 2020
    – आवश्यक वस्तु (संशोधन)अध्यादेश, 2020

    एक राष्ट्र-एक बाजार नारे के साथ लाए गए इन अध्यादेशों के जरिए सरकार किसानों से सीधी खरीद और कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा देना चाहती है। इसके अलावा अनाज, दालों, आलू, प्याज, टमाटर आदि को स्टॉक लिमिट के दायरे से बाहर निकालने का फैसला किया गया है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन अध्यादेशों को किसानों के हित में ऐतिहासिक कदम बताते हुए कृषि क्षेत्र को अनलॉक करने का दावा किया है। केंद्र सरकार ने राज्यों के बीच कृषि व्यापार की कई अड़चनें दूर कर दी हैं। मंडी के बाहर उपज की खरीद-फरोख्त पर मंडी टैक्स भी नहीं देना पड़ेगा।

    लेकिन सवाल ये है कि सरकार के इन दावों के बावजूद किसान सड़कों पर उतरने पर क्यों मजबूर हैं। किसान एक्टिविस्ट रमनदीप सिंह मान के अनुसार, किसानों में भय है कि कृषि अध्यादेशों के जरिए सरकार समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद की व्यवस्था को खत्म करने जा रही है। यह ट्रैक्टर मार्च किसानों के लिए चेतावनी है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से किसी तरह की छेड़छाड़ न की जाए।

    कृषि अध्यादेशों के खिलाफ विरोध के सबसे ज्यादा स्वर पंजाब से उठे हैं जहां कांग्रेस की सरकार है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह कृषि अध्यादेशों को किसान विरोधी बताकर केंद्र सरकार पर दबाव बना रहे हैं। इस मुद्दे पर पंजाब की राजनीति गरमा गई है। पंजाब में आम आदमी पार्टी के विधायक कुलतार सिंह खुद ट्रैक्टर चलाकर विरोध-प्रदर्शन में शामिल हुए। भाजपा के सहयोगी अकाली दल ने किसानों के विरोध-प्रदर्शन का समर्थन तो नहीं किया लेकिन एमएसपी से किसी तरह की छेड़छाड़ न होने देने की बात जरूर कही है।

    कृषि मामलों के विशेषज्ञ देविंदर शर्मा की मानें तो इन तीन अध्यादेशों के साथ एक चौथा अध्यादेश लाकर किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का कानूनी हक दिलाने की जरूरत है। उनका कहना है कि जब सरकार मानती है कि किसानों को कहीं भी बेचने की छूट मिलने से बेहतर दाम मिलेगा तो एमएसपी को कानूनी अधिकार बनाने में क्या दिक्कत है? एमएसपी से नीचे किसी भी खरीद की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

    खेती पर कॉरपोरेट के कब्जे का डर

    कृषि से जुड़े तीनों अध्यादेशों से किसानों को कितना फायदा या नुकसान होगा, इस पर बहस जारी है। सरकार का दावा है कि मुक्त बाजार मिलने से किसान के पास उपज बेचने के ज्यादा विकल्प होंगे, जिससे बिचौलियों की भूमिका घटेगी। इसका लाभ किसानों को मिलेगा। भंडारण की पाबंदियां हटने से कृषि से जुड़े बुनियादी ढांचे में निवेश जुटाने में मदद मिलेगी।

    लेकिन कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा मिलने से खेती पर कॉरपोरेट के कब्जे का डर भी है।

    मंडियों के बाहर खरीद-फरोख्त की छूट मिलने से राज्यों को राजस्व का नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए पंजाब, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य इन अध्यादेशों का विरोध का रहे हैं। प्राइवेट मंडियों और किसान से सीधी खरीद की छूट मिलने से मंडियों का वर्चस्व टूट सकता है। इसलिए कई राज्यों में कृषि उपज के व्यापारी यानी आढ़तिये भी कृषि अध्यादेशों का विरोध कर रहे हैं।

    कई किसान संगठन केंद्र के इन अध्यादेशों को खेती के कॉरपोरेटाइजेशन के तौर पर देख रहे हैं। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संयोजक सरदार वीएम सिंह का कहना है कि ये अध्यादेश सुधारों के नाम पर किसानों की आंखों में धूल झोंकने का काम कर रहे हैं। इनसे न तो किसानों को सशक्त करेंगे और न ही उनकी आमदनी बढ़ा पाएंगे। इनमें कहीं भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) या स्वामीनाथम कमीशन के फॉर्मूले (सी2 के साथ 50 फीसदी मार्जिन) का जिक्र नहीं है।

    यूरोप से मिला ट्रैक्टर मार्च का आइडिया

    हरियाणा और पंजाब के अलावा राजस्थान और मध्यप्रदेश से भी किसानों के ट्रैक्टर मार्च निकालने की खबरें आ रही हैं। सोशल मीडिया के जरिए शुरू हुई यह मुहिम किसी बड़े संगठन के बिना ही दूर-दराज के गांवों तक फैल रही है। किसानों को ट्रैक्टर मार्च का आइडिया कुछ दिनों पहले नीदरलैंड्स में हुए इसी तरह के विरोध-प्रदर्शन से आया था। फिर सोशल मीडिया के माध्यम से इसकी गूंज हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और मध्यप्रदेश तक पहुंच गई।

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