फसल के दाम की गांरटी नहीं, खेती के कॉरपोरेटाइजेशन पर जोर

केंद्र सरकार ने किसानों के उत्पादों की बेहतर मार्केटिंग के लिए आर्थिक उदारीकरण की दिशा में तीन सुधार किए हैं। इनमें दो सुधारों के लिए पांच जून को राष्ट्रपति ने अध्यादेश जारी किए, क्योंकि इन फैसलों को कानूनी वैधता देने के लिए सरकार संसद सत्र का इंतजार नहीं करना चाहती थी। ये अध्यादेश हैं फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड ऐंड कॉमर्स (प्रमोशन ऐंड फैसिलिटेशन) ऑर्डिनेंस, 2020 और फार्मर्स (एम्पावरमेंट ऐंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस ऐंड फार्म सर्विसेज ऑर्डिनेंस, 2020

तीसरा और जिसे सबसे बड़ा सुधार बताया गया है, वह है आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के दायरे से खाद्यान्न, दालें, तिलहन, खाद्य तेल, आलू और प्याज को बाहर करना। अब इन उत्पादों के लिए कोई स्टॉक लिमिट नहीं होगी और न ही निर्यात पर प्रतिबंध लगेगा। इन उत्पादों की खरीद-बिक्री और देश भर में आवाजाही पर भी कोई प्रतिबंध नहीं होगा। केवल आपदा या आपात स्थिति में इन उत्पादों को स्टॉक लिमिट के दायरे में लाया जा सकेगा। सरकार का तर्क है कि इससे किसानों को बेहतर कीमत मिलेगी।

इन तीनों फैसलों में एक बात साझा है कि कृषि व्यापार और कृषि उत्पादों के संगठित कारोबार यानी कॉरपोरेटाइजेशन को बढ़ावा देना। इन तीनों फैसलों में किसानों को उपज के लाभकारी मूल्य या न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और सुनिश्चित आय की कोई गारंटी नहीं है।

एक दूसरा पेच देखिए। फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड ऐंड कॉमर्स (प्रमोशन ऐंड फैसिलिटेशन) ऑर्डिनेंस, 2020 के तहत सरकार ने किसानों की उपज का नहीं, उत्पादों का जिक्र किया है। यह केवल फसलों से संबंधित नहीं है, बल्कि किसानों के तमाम उत्पाद इस कानून का हिस्सा हैं। इसमें फसलों के अलावा पशुपालन, पॉल्ट्री और दूसरी गतिविधियों के उत्पाद शामिल हैं।

यानी इस कानून का दायरा बहुत व्यापक है। इन उत्पादों को राज्य के भीतर और बाहर किसी भी व्यक्ति, कंपनी, संस्थान, सहकारी समिति, फार्मर प्रोड्यूसर्स ऑर्गनाइजेशन (एफपीओ) को किसान से सीधे खरीदने-बेचने, लाने-ले जाने और स्टोर करने की छूट दी गई है। यह छूट एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (एपीएमसी) एक्ट के तहत बनी राज्य सरकार की कृषि मंडियों के बाहर होगी और इन पर राज्य सरकार कोई शुल्क भी नहीं लगा सकेंगी।

असल में कृषि मार्केटिंग राज्य का विषय है और उसके तहत ही एपीएमसी की व्यवस्था है। लेकिन केंद्र सरकार ने एग्री मार्केटिंग शब्द की बजाय ट्रेड शब्द का इस्तेमाल किया है, जो केंद्र का विषय है। अंतरराज्यीय व्यापार भी केंद्र के अधिकार में आता है।  इसके लिए अभी नियम बनने हैं। उसके बाद निजी क्षेत्र इस कारोबार में उतर सकेगा। वह किसान के खेत से या निजी मंडी स्थापित कर उत्पादों की सीधे खरीद कर सकेगा।

सरकार का कहना है कि इस नई व्यवस्था से किसानों को ज्यादा  खरीदार मिलेंगे और वह केवल एपीएमसी के लाइसेंसी कारोबारियों के भरोसे नहीं रहेगा। इस तरह प्रतिस्पर्धा बढ़ने से किसानों को उपज का बेहतर दाम मिल सकेगा। इसके तहत पेमेंट की शर्तें तय करने और विवाद के निपटारे के लिए एसडीएम स्तर के अधिकारी या उसके द्वारा नियुक्त आर्बिट्रेशन कमेटी को अधिकृत किया गया है। विवाद अपीलीय प्राधिकरण और राज्य स्तर पर नहीं निपटता है तो केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव के स्तर तक जा सकता है।

जाहिर है, किसानों के उत्पादों को संगठित क्षेत्र के तहत लाने का यह बड़ा कदम है और देश के बड़े कॉरपोरेट यानी रिलायंस, अडाणी, आइटीसी, महिंद्रा ऐंड महिंद्रा, फ्यूचर ग्रुप समेत तमाम दिग्गजों के लिए भारतीय कृषि बाजार में उतरने का रास्ता खुल गया है। लेकिन सबसे अहम बात है दाम। लेकिन इस अहम मसले पर यह अध्यादेश मौन है।

फार्मर्स (एम्पावरमेंट ऐंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस ऐंड फार्म सर्विसेज ऑर्डिनेंस, 2020 के तहत कंपनियों को किसानों के साथ कांट्रैक्ट फार्मिंग और कृषि उत्पादन से जुड़ी सेवाओं के संचालन के प्रावधान किये गये हैं। साथ ही इसमें लैंड लीजिंग का भी प्रावधान है जिसकी अवधि एक फसल सीजन के लेकर पांच साल तक हो सकती है।

इस अध्यादेश के मुताबिक, पहले से निर्धारित कीमत और गुणवत्ता मानकों के आधार पर फसल खरीद का कांट्रैक्ट हो सकता है। इसी तरह किसानों को सेवाएं देने का कांट्रैक्ट हो सकता है जिसमें बीज, खाद, पेस्टिसाइड की बिक्री से लेकर तमाम तरह की कृषि से जुड़ी सेवाएं शामिल हो सकती हैं। इसके तहत कंपनियां, प्रसंस्करण करने वाली कंपनियां, सहकारी संस्थाएं, एफपीओ किसानों के साथ कांट्रैक्ट कर सकते हैं। विवाद होने की स्थिति में लगभग वही व्यवस्था है जो फार्मर्स प्रॉड्यूस ट्रेड ऐंड कॉमर्स (प्रमोशन ऐंड फैसिलिटेशन) ऑर्डिनेंस, 2020 में है। लेकिन यहां भी उपज की कीमत तय करने या किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाने की कोई व्यवस्था नहीं है। किसान को लाभकारी मूल्य कैसे मिलेगा, इसका कोई प्रावधान या पैमाना नहीं है। तीनों कानूनों में सुधारों का जोर प्रतिस्पर्धा के जरिये किसानों को बेहतर दाम मिलने की संभावना पर टिका है।

एक बात चौंकाने वाली है कि चीनी को आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे से बाहर क्यों नहीं किया गया। इसमें दो मसले हैं। एक, गन्ने का एफआरपी तय करने का प्रावधान और उसके भुगतान के लिए शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर इस अधिनियम के तहत आता है। दूसरे, इस समय चीनी उद्योग कुछ मुश्किल में है और माना जा रहा है कि सरकार उसे अभी सुरक्षित रखना चाहती है। वैसे भी किसानों का चीनी मिलों पर भारी-भरकम बकाया है। लेकिन सवाल है कि अगर बाकी चीजों को आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे से बाहर करने पर किसानों को सही दाम मिलेगा तो चीनी को उसके तहत क्यों रखा गया है? जबकि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य में दो साल से गन्ने का दाम स्थिर है। इसी को शायद राजनीति कहते हैं।

साफ तौर पर इन सुधारों का मकसद देश में कृषि का कॉरपोरेटाइजेशन करना है। किसानों को सुनिश्चित आय या फसल के लाभकारी दाम की गारंटी की बजाय कृषि के कॉरपोरेटाइजेशन की कोशिशें  हावी हैं। दिग्गज कंपनियों के मुकाबले किसान कैसे मोलभाव करेगा? इस सौदेबाजी में किसानों के हित कैसे सुरक्षित रहेंगे? इस पर बहुत जोर नहीं दिया गया है। जबकि देश में कामयाब सहकारी संस्थाओं के जरिये किसानों को बेहतर दाम मिलने के उदाहरण मौजूद हैं तो देशव्यापी स्वायत्त सहकारी संगठन खड़ा करने पर जोर क्यों नहीं दिया जा रहा है?

जब सरकार पूरे देश को एक बाजार बनाने के लिए राज्यों की अनदेखी कर नए कानून बना सकती है तो यह काम सहकारी संस्थाओं को नौकरशाही और राजनीति से मुक्त करने के लिए क्यों नहीं किया जा सकता है। बेहतर होता कि सरकार किसानों की आय बढ़ाने के लिए मार्केटिंग की ताकत किसानों और उनके द्वारा स्थापित संस्थानों के हाथ में देती और कॉरपोरेट के साथ मिलकर खुद ढांचागत सुविधाओं पर निवेश करती।

 

कृषि से जुड़े 3 फैसले, जिन्हें ऐतिहासिक बता रही है सरकार

पहला फैसला: स्टॉक लिमिट खत्म 

बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन को मंजूरी दी गई है। इससे दलहन, तिलहन, अनाज, आलू और प्याज आवश्यक वस्तु की सूची से बाहर हो जाएंगे। अब इन पर आपात स्थिति में ही स्टॉक लिमिट लगेगी। सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना है कि इस फैसले से किसानों को लाभ पहुंचेगा और कृषि क्षेत्र का कायाकल्प हो जाएगा। सरकार का मानना है कि आवश्यक वस्तु अधिनियम की वजह से कृषि को नुकसान पहुंचा है।

आवश्यक वस्तु अधिनियम में बदलाव क्यों?

अनाज, दाल, तिलहन, आलू और प्याज जैसी वस्तुएं आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत आती हैं, इसलिए इन पर स्टॉक लिमिट लगती है और तय सीमा से ज्यादा भंडारण या ट्रांसपोर्टेशन नहीं हो सकता है। सरकार की सोच है कि स्टॉक लिमिट की पाबंदी के चलते इन वस्तुओं के कारोबार में निजी निवेश नहीं आ पाया। न ही इनका स्टोरेज और एक्सपोर्ट बढ़ पाया है।

सरकार का मानना है कि कृषि उपज के भंडारण, परिवहन, वितरण और आपूर्ति की पाबंदियां हटने से निजी और विदेशी निवेश को बढ़ावा मिलेगा। इससे कोल्ड स्टोरेज और सप्लाई चेन में निवेश आएगा। इस सब का फायदा किसानों को मिलेगा। इसलिए अब सिर्फ युद्ध या अकाल जैसी आपात स्थिति में ही कृषि उपज पर स्टॉक लिमिट जैसी पाबंदियां लगाई जाएंंगी।

दूसरा फैसला: मंडी में बिक्री की बाध्यता खत्म 

मंत्रिमंडल ने कृषि व्यापार की बाधाएं दूर करने के लिए एक अध्यादेश लाने का निर्णय लिया है। कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि ‘एक राष्ट्र, एक कृषि बाजार’ बनाने के लिए कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य (प्रोत्साहन व सुविधा) अध्यादेश, 2020 को मंजूरी दी गई है। इससे किसानों और व्यापारियों को देेेश में कहीं भी उपज खरीदने-बेचने की छूट मिलेगी।

सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार, कृषि उपज की बिक्री में किसानों को कई बाधाएं आती हैं। उन्हें मंडी में ही पंजीकृत विक्रेताओं को ही उपज बेचनी पड़ती है। इसके अलावा एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच व्यापार में भी कई रुकावटें हैं। सरकार इन बाधाओं को दूर करने जा रही है।

मंडी के बाहर भी उपज बेचने की छूट मिलने से किसानों के पास ज्यादा विकल्प होंगे और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी जिससे किसानों को बेहतर दाम मिल सकेगा। इस अध्यादेश के जरिए ई-ट्रेडिंग को बढ़ावा देने की बात भी कही गई है।

इस सबसे किसान का भला होगा या ट्रेडर्स या बड़े रिटेलर का यह देखने वाली बात है।

तीसरा फैसला: कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का रास्ता

किसानों और प्रोसेसर, एग्रीगेटर, होलसेलर, रिटेलर और एक्सपोर्टर के बीच कारोबार को आसान बनाने के लिए भी केंद्र सरकार एक अध्यादेश लेकर आ रही है।

माना जा रहा है कि यह अध्यादेश कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग का रास्ता साफ कर सकता है। वैसे, कहा ये जा रहा है कि इससे किसानों को नई तकनीक का लाभ मिलेगा और जोखिम घटने के साथ-साथ मार्केटिंग का खर्च भी घटेगा। किसान बिचौलियों को हटाकर अपने माल की डायरेक्ट मार्केटिंग कर सकेंगे।

फिलहाल ये सब दावे हैं। असल में क्या होगा, वो देखने वाली बात है। वैसे किसानों से पहले उद्योग जगत ने सरकार के इन फैसलों का स्वागत किया है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन फैसलों का लाभ किसानों को मिलेगा या व्यापारियों को या फिर ऑनलाइन रिटेल की दिग्गज कंपनियों को? डर यह है कि कहीं किसानों को मंडी से मुक्त करने के नाम पर मंडियों की रही-सही व्यवस्था भी ध्वस्त न हो जाए। क्योंकि कई साल पहले बिहार ने मंडी एक्ट खत्म किया था, वहां किसानों की हालत और भी बदतर है।

सवाल यह भी है कि जो मुक्त बाजार, जो ऑनलाइन तकनीक, जो मार्केट रिफॉर्म्स अमेरिका में भी किसानों की आमदनी नहीं बढ़ा पाए, उसी रास्ते पर चलकर भारत में किसानों का कल्याण कैसे होगा?

सरकार भले ही इन कृषि सुधारों को ऐतिहासिक बता रही है, लेकिन कृषि सुधार की इन बातों में किसान को उपज का सही दाम दिलाने और सुनिश्चित आय का जिक्र तक नहीं है।

 

 

 

 

किसान को नकद मदद चाहिए, ‘डिरेगुलेशन’ का झुनझुना नहीं

हमारे किसानों को स्वतंत्र करें। वो कोविड-19 के प्रभाव को कम करने में मददगार साबित हो सकते हैं। यहां पर स्वतंत्र करने का मतलब है कि उनकी सप्लाई चेन की रुकावटों को दूर किया जाए। जी हां, वही ‘सप्लाई चेन’ जिसका उल्लेख प्रधानमंत्री जी ने 12 मई को दिए अपने भाषण में 9 बार किया था। इसके बाद, वित्त मंत्री ने ‘फार्म-गेट इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए 1 लाख करोड़ रु. के एग्री इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड’ तथा आवश्यक वस्तु अधिनियम एवं एपीएमसी एक्ट में संशोधन के लिए एक ‘लीगल फ्रेमवर्क’ के निर्माण की घोषणा की। कागजों पर देखें, तो ये सही दिशा में उठाए गए साहसी कदम मालूम पड़ते हैं, लेकिन आज फैली महामारी के संदर्भ में इनसे किसानों को कोई राहत नहीं मिलेगी।

कृषि सेक्टर में जान फूंकने का मौजूदा सरकार का पिछला रिकॉर्ड काफी निराशाजनक रहा है। साल 2004-05 से 2013-14 के बीच भारत की औसत कृषि जीडीपी वृद्धि 4 प्रतिशत थी, जो 2014-15 से 2018-19 के बीच गिरकर 2.9 प्रतिशत रह गई।

कृषि देश का सबसे बड़ा निजी क्षेत्र है, लेकिन केंद्र सरकार ने अनेक पाबंदियां लगाकर कृषि क्षेत्र को पूरी क्षमता का इस्तेमाल करने से रोक रखा है। कृषि को नियंत्रित करने की मानसिकता दो ऐतिहासिक कारणों से है। पहला, जब तक हरित क्रांति ने हमें आत्मनिर्भर नहीं बनाया, तब तक भारत खाद्यान्न के लिए विकसित देशों पर निर्भर था। हमारे किसान सूखा, बारिश जैसी हर चुनौती का सामना करते हैं फिर भी हर साल खाद्यान्न उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है। अनाज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) सरकार का दायित्व है, ताकि किसानों को ‘कृषि उत्पादन व उत्पादकता में वृद्धि’ होने पर भी स्थिर व उचित दाम मिल सके।

दूसरा, भारत की राजनैतिक अर्थव्यवस्था में किसानों को उचित दाम 1960 के बाद एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया क्योंकि बड़े किसान राजनैतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो चुके थे। किसानों ने अपनी नवअर्जित राजनैतिक शक्ति का उपयोग सरकारी हस्तक्षेप से ऊंचे व ज्यादा स्थिर दाम पाने के लिए किया, जिससे भारत दुनिया में खाद्यान्न का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन गया। इस प्रकार सालों से खाद्यान्न आयात करने की भारत की समस्या का अंत हुआ। हमारे लिए रिकॉर्ड स्तर पर खाद्यान्न का उत्पादन गर्व की बात है क्योंकि इसके साथ इतिहास जुड़ा हुआ है। किसी भी कृषि रिपोर्ट में सरकार सबसे पहले इसी का उल्लेख करती है।

खेत से लेकर खाने की मेज तक कृषि सेक्टर पर वास्तविक नियंत्रण सरकार के हाथ में है। प्रतिबंधात्मक स्वामित्व, लीज़ एवं टीनेंसी कानून के रूप में सरकार का पूरा ‘कैपिटल कंट्रोल’ है। अपनी जमीन निजी लोगों को बेचने या किराये पर देने में किसान के सामने कई बाधाएं हैं। खाद-बीज के दाम और पानी-बिजली पर सब्सिडी पर सरकारी नियंत्रण के रूप में सरकार का ‘इनपुट कंट्रोल’ रहता है। कृषि उपकरणों एवं कलपुर्जों पर जीएसटी भी एक तरह का नियंत्रण ही है।

आवश्यक वस्तु अधिनियम कृषि उत्पाद का मूल्य और मात्रा को नियंत्रित करता है। एपीएमसी एक्ट कृषि उपजों की खरीद-फरोख्त की ऐसी व्यवस्था है, जिसमें एकाधिकार, बिचौलिये और कमीशनबाजी हावी है। दुनिया के साथ भारत के किसानों के स्वतंत्र व्यापार को बाधित करने के लिए अनेक व्यापारिक प्रतिबंध हैं।

किसानों के कल्याण के लिए काम करने वाले अनेक विशेषज्ञ एवं नीति-निर्माताओं का मानना है कि भारतीय कृषि को धीरे-धीरे खोला जाना चाहिए। देश की आधी आबादी की आर्थिक स्थिति और पूरे देश की खाद्य सुरक्षा कृषि पर निर्भर है। इसलिए इस सेक्टर के लिए एक स्थिर व संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, न कि डिरेगुलेशन के झुनझुने की। वित्त मंत्री की हाल की घोषणाओं में न तो किसानों को स्वतंत्र करने के लिए कोई ठोस प्रगतिशील नीतिगत उपाय दिए गए और न ही किसी सुधार का रोड मैप है। इन घोषणाओं में सुर्खियां बटोरने के लिए केवल ‘पैकेज’ दिए जाने की औपचारिकता पूरी कर दी।

इसके अनेक कारण हैं। कृषि राज्य का विषय है। केंद्र सरकार ज्यादा से ज्यादा एक ‘मॉडल कानून’ बना सकती है, जिसे सभी राज्य अपनाएं। लेकिन इन्हें अपनाना है या नहीं, यह राज्यों के ऊपर है। केंद्र सरकार ने ‘लिबरलाईज़िंग लैंड लीज़ मार्केट्स एंड इंप्लीमेंटेशन ऑफ मॉडल एग्रीकल्चरल लैंड लीज़ एक्ट, 2016’ पारित करके ऐसा किया भी था। लेकिन यह कानून सत्ताधारी दल के नेतृत्व वाले राज्यों सहित बहुत कम राज्यों ने अपनाया। इसलिए ‘कैपिटल कंट्रोल’ हटाए जाने का उपाय सफल नहीं हो सका।

कृषि वस्तुओं की मार्केटिंग भी राज्य का विषय है। ‘केंद्र सरकार द्वारा किसान को अपना उत्पाद आकर्षक मूल्य में बेच पाने के पर्याप्त विकल्प प्रदान करने के लिए एक कानून बनाए जाने’ तथा ‘स्वतंत्र अंतर्राज्यीय व्यापार की बाधाओं’ को दूर किए जाने की घोषणा करते हुए, वित्तमंत्री जी यह बताना भूल गईं कि यह केवल एक मॉडल कानून होगा, जिसे अपनाना या न अपनाना राज्य के ऊपर निर्भर करेगा, जैसा कि लैंड लीज़ एक्ट में हुआ था।

केंद्र सरकार के लिए दूसरा विकल्प ‘समवर्ती सूची’ की वस्तुओं में आश्रय लिया जाना है, जिसमें ‘खाद्य सामग्री’, ‘रॉ कॉटन’, ‘रॉ जूट’ एवं ‘पशु आहार’ सूचीबद्ध हैं। उसके लिए भी संविधान के अनुच्छेद 301 के तहत एक और कानून को पारित करना होगा।

वित्तमंत्री ने घोषणा की है कि किसानों को प्रोसेसर्स, एग्रीगेटर्स, बड़े रिटेलर्स, एक्सपोर्टर्स आदि से जुड़ने के लिए एक सुविधाजनक कानूनी ढांचा बनाया जाएगा। यह कागज पर बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह एक विस्तृत नीतिगत घोषणा है, जिसका कोई विवरण, रोडमैप या संस्थागत फ्रेमवर्क नहीं दिया गया है।

देश में फैली इस महामारी के दौरान, संसद या इसकी स्टैंडिंग कमेटी वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से भी काम नहीं कर रही हैं। कोई संवैधानिक निगरानी नहीं है। कोई भी विधेयक जन परामर्श के लिए नहीं रखा गया। इसलिए अध्यादेश लाने से कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं होगा। सरकार को संसद के मानसून सत्र में संपूर्ण कानूनी प्रारूप प्रस्तुत करना होगा। यह राज्यों से परामर्श लिए नहीं हो सकेगा। बिना संस्थागत प्रारूप के आनन-फानन में नीति थोपने का परिणाम वही होगा, जो बिना योजना के त्रुटिपूर्ण जीएसटी लागू करने का हुआ है।

‘प्राईस एवं ट्रेड कंट्रोल’ को आंशिक रूप से हटाया जाना भी आधा अधूरा उपाय है। कृषि को नियंत्रण मुक्त करने के लिए संपूर्ण ढांचा बदलना होगा। साथ ही लागत और पूंजी संबंधी नियंत्रणों को समाप्त करना होगा। इसके लिए काफी व्यापक योजना और संस्थागत ढांचे की जरूरत होगी। केंद्र सरकार द्वारा प्रारंभ की गई ई-नाम मंडियां बुनियादी ढांचे की योजना के अभाव में विफल साबित हुई हैं।

कोविड-19 के संकट में जब अर्थव्यवस्था संकट में है और किसानों को लागत के लिए पैसे की जरूरत है, ऐसे में उन्हें पुख्ता मदद दिए बिना अधूरी स्वतंत्रता देना उनका उपहास उड़ाने के बराबर है। अच्छा तो यह होता कि पहले उन्हें आर्थिक सहयोग दिया जाए और उसके बाद संस्थागत सुधारों की शुरुआत की जाए।

(लेखक तक्षशिला इंस्टीट्यूट, बैंगलोर में पब्लिक पॉलिसी का अध्ययन कर रहे हैं। लेख में अभिव्यक्त किए गए विचार उनके अपने हैं। लेख का इंग्लिश रूपांतरण सीएनएन न्यूज़18 में प्रकाशित हुआ था।)