दक्षिण हरियाणा: बिजली ट्यूबवेल सिंचाई का किसानों और भूजल स्तर पर गहरा असर!

हरियाणा के बिसोहा गांव (रेवाड़ी जिला) निवासी दीपक पिछले 20 वर्षों से खेती में लगे हैं. वह खेतों में बिजली ट्यूबवेल द्वारा फुव्वारा तकनीक से सिंचाई करते हैं. गांव में खेतों की सिंचाई के लिए अन्य साधन उपलब्ध नहीं हैं. इसी कारण गांव में ज्यादातर किसान सिंचाई के लिए बिजली ट्यूबवेल का प्रयोग करते हैं. दीपक के मुताबिक बिजली ट्यूबवेल से सिंचाई का खर्चा कम पड़ता है. महीने में ट्यूबवेल द्वारा सिंचाई का खर्च 80 रूपए है, जो ज्यादा नहीं है. इसलिए वह सोलर पम्पसेट के बारे में नहीं सोच रहे.

दीपक बताते हैं कि खाली पड़ी जमीन भी ख़राब हो रही है और जमीन का अन्य प्रयोग भी नहीं हो रहा है. इसलिए ट्यूबवेल लगवाकर खेतों में सिंचाई करते हैं. जमीनी पानी भी लगातार खारा हो रहा है और नीचे जा रहा है लेकिन सिंचाई का साधन भी ट्यूबवेल ही है. यहां कोई नहर नहीं है. बिजली ट्यूबवेल से सिंचाई की लागत डीज़ल ट्यूबवेल की तुलना में कम आती है.

अहीरवाल में सिंचाई फुव्वारा तकनीक से ही होती है. गांव के सरपंच नितेश कुमार ने बताया कि फुव्वारा तकनीक द्वारा सिंचाई करने से लाइन बदलने के लिए मजदूर लगाने पड़ते हैं, जिस कारण सिंचाई का खर्च बढ़ जाता है यदि सिंचाई के लिए पानी अन्य स्रोतों द्वारा मिल जाए तो खेतों में खुली सिंचाई की जा सकेगी, जिससे अन्य कई खर्च (पाइपलाइन, मजदूरी आदि) बच जाएंगे.

इस इलाके में ज्यादातर किसान अपना जीवन चलाने के लिए खेती पर निर्भर हैं, लेकिन खेती से लगातार आय कम होती जा रही है. फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पाता तो फसलों की लागत भी पूरी नहीं होती. जब दीपक और बिसोहा के गांव वालों से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (2015) के बारे में पूछा गया तो उन्हें इस योजना के बारे में नहीं पता था.

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत सरकार किसानों को खेत में सिंचाई करने के लिए उचित मात्रा में पानी उपलब्ध करवाने और सिंचाई उपकरणों के लिए सब्सिडी प्रदान करती है. सुनील कुमार शोधार्थी हैं और ग्रामीण एवं औद्योगिक विकास अनुसन्धान केंद्र चंडीगढ़ में काम कर चुके हैं. उनका शोध कार्य “खेती के कार्यो में बिजली के उपयोग” से संबधित है. सुनील कुमार से संबंधित विषय पर बात करने पर उन्होंने बताया कि पेट्रोल तथा डीजल से सिंचाई की लागत ज्यादा है, जिस कारण फसलों की उत्पादन लागत बढ़ती है. सिंचाई लागत कम होने की वजह से किसान बिजली टूबवेल की तरफ ज्यादा रुझान कर रहे हैं, जिससे किसानों के उत्पादन एरिया में भी बढ़ोतरी हुई है. लेकिन उत्पादित फसल चक्र में परिवर्तन नकारात्मक हो रहा है. किसान गहन सिंचाई की फसलों जैसे धान और गेहूं से कम गहन सिंचाई (कम सिंचाई) की फसलों सरसों, बाजरा आदि की तरफ आ रहे हैं, लेकिन बिजली टूबवेल की तरफ ज्यादा रुझान का विपरीत प्रभाव यह हो रहा है कि भूजल ज्यादा प्रयोग होने की वजह से भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है. किसानों को अपने ट्यूबेल पम्प सेट ज्यादा गहरे करवाने पड़ रहे हैं जिससे पम्प सेट की लगता में बढ़ोतरी हो रही है.

देश में भूजल स्तर लगातार कम हो रहा है. डाउन-टू-अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय जल शक्ति व सामाजिक न्याय मंत्री रतन लाल ने मार्च 2020 में संसद में जानकारी दी कि किसान 2001 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1816 घनमीटर थी, जो साल 2021 में 1488 घनमीटर रही और साल 2031 में काम होकर 1367 घनमीटर हो सकती है.

हरियाणा सरकार की रिपोर्ट के अनुसार “हरियाणा के कृषि योग्य भूमि की सिंचाई नहर, डीजल तथा बिजली ट्युबवेल्स आदि के माध्यम से की जाती है. हरियाणा में सिंचित कृषि क्षेत्र का 1154 हजार एकड़ भूमि नहरों द्वारा तथा 1801 हजार एकड़ भूमि टुबवेल्स द्वारा सिंचित किया जाता है. हरियाणा में कुल 821399 बिजली ट्यूबवेल्स तथा डीजल पंप सेट हैं जिसमें 275211 डीजल पंप से तथा 546188 बिजली पंप सेट हैं. रेवाड़ी जिले की बात की जाए तो यहां कुल 13605 ट्यूबवेल तथा पंपसेट हैं जिसमें 3311 डीजल और 10294 बिजली ट्यूबवेल पंपसेट हैं.

मौसम अनुसार फसलों की पैदावार

बिसोहा निवासी दीपक कहते हैं कि खरीफ (ग्रीष्म काल) के मौसम में कपास तथा बाजरा और रबी (शीत काल) मौसम में गेहूं तथा सरसों की फसलों का उत्पादन करते हैं. एक एकड़ में गेंहू की पैदावार 50 से 55 मण (1मण=40 किलोग्राम) है, एक एकड़ में सरसों की पैदावार 20 से 25 मण है, एक एकड़ में बाजरा की पैदावार 20 से 22 मण है, खरीफ की फसलों में 1 से 2 बार सिंचाई करते हैं तथा रबी की फसल सरसों में 2 से 3 बार और गेहूं की फसल में 5 से 7 बार सिंचाई करते हैं, यदि समय पर बारिश हो जाए तो ट्यूबवेल द्वारा 1 या 2 सिंचाई कम करनी पड़ती है. बिसोहा से लगभग 35 किलोमीटर दूर मीरपुर निवासी हरि सिंह अपने खेतों में गेहूं और बाजरा की पैदावार करते हैं. गेहूं में सरसो, बाजरा तथा कपास की तुलना में ज्यादा सिंचाई की जरूरत पड़ती है. एक एकड़ में गेहूं की पैदावार लगभग 38-40 मण (1 मण=40 किलोग्राम) और बाजरा की पैदावार लगभग 18-20 मण होती है.

डॉ अजय कुमार एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर महेन्द्रगढ़ ने बताया कि मिट्टी में सॉइल आर्गेनिक कॉम्पोनेन्ट की कार्बन संरचना होती है जिससे मिट्टी की उपजाऊपन बना रहता है, खारा पानी, रासायनिक खाद, फसल चक्रण आदि से सॉइल आर्गेनिक कम्पोनेंट का अनुपात कम होता जा रहा है. ग्रामीण जनसंख्या की कृषि पर ज्यादा निर्भरता तथा साधन उपलब्धता के कारण फसल चक्रण के बीच अंतर कम होता जा रहा है. पहले किसान फसल चक्र के बीच अंतर करते थे जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति ठीक बनी रहती थी, साथ-साथ जलवायु परिवर्तन से तापमान में जो वृद्धि हो रही है, वह भी फसलों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है. जैसे मार्च 2022 में हीट वेव (ज्यादा तापमान) के कारण गेहूं की पैदावार में 15% से ज्यादा की कमी आयी है.

खारा (नमकीन) पानी और रासायनिक खाद का खेती पर प्रभाव

राजेश कुमार एक एकड़ गेहूँ 70 से 75 किलोग्राम और सरसो में 50 किलोग्राम तथा बाजरा में 25 से 30 किलोग्राम रासायनिक खाद का प्रयोग करते हैं. वह बताते हैं, “रासायनिक खाद के ज्यादा प्रयोग के कारण मिट्टी की पैदावार भी कम हो रही है. देसी खाद (गोबर की खाद) जमीन को तो ठीक रखता है, लेकिन उससे पैदावार पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता. रासायनिक खाद जमीन को तो ख़राब कर रहा है, पर पैदावार पर देसी खाद की तुलना में ज्यादा असर डालता है.”

कृषि विज्ञान केंद्र झज्जर (हरियाण) से संदर्भित विषय में सम्बंधित जानकारी लेने पर उन्होंने बताया कि रेवाड़ी से लगते हुए झज्जर का दो तिहाई पानी खारा (नमकीन) हो गया है, जिससे मिट्टी लवणीय (कैल्सियम, मैग्निसियम और सल्फेट आयन की अधिकता) होती जा रही है. फसल चक्र में रबी सीजन में गेहूं तथा खरीफ सीजन में पेड्डी चावल, बाजरा तथा कपास की फसलों का उत्पादन किया जाता है. रासायनिक खाद का प्रयोग खेत की मिट्टी को कृषि विज्ञान केंद्र की लैब में चेक करवा के करना चाहिए लेकिन ज्यादातर किसान आपस में एक दूसरे से बात करके रासायनिक खाद का प्रयोग करते हैं.

अस्सिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.नवीन कटारिया ने बताया कि दक्षिणी हरियाणा की जमीन में फसल उत्पादन के आवश्यक तत्व (जिंक, कॉपर, मैंगनीज, आयरन,कॉपरआदि) कम मात्रा में पाए जाते हैं इसके साथ-साथ भूजल में फलोरिड, नमक की मात्रा ज्यादा है इसलिए फसल उत्पादन लगातार कम हो रहा है. जिस कारण किसानों को लगातार ज्यादा रासायनिक खाद का प्रयोग करना पड़ रहा है. जो रसायनिक खाद नाइट्रोजन फॉस्फोरस और पोटैशियम के आदर्श अनुपात (4:2:1) से ज्यादा है. फलोरिड और नमक युक्त भूजल दक्षिण हरियणा के जन मानस को भी बहुत ज्यादा प्रभावित कर रहा है, क्योंकि वहां के लोग पेय जल के रूप में भी इसी पानी का उपयोग करते हैं, जिससे मुख्यत दांतों की बीमारी दांतो का पीला पड़ना देखा जा सकता है.

हरियाणा का भूजल स्तर

बिसोहा निवासी हरीश ने 15 वर्ष पहले 150 फीट गहराई में ट्यूबवेल लगवाया था. पहले पांच वर्षों तक अच्छे से पानी चला लेकिन बाद में टूबवेल पानी छोड़ने लगा फिर ट्यूबवेल को दो बार 20- 20 फीट गहरा किया जा चुका है, लेकिन भूजल लगातार नीचे जाने की वजह से अब एक एकड़ फसल की सिंचाई के लिए दो-तीन बार ट्यूबवेल को चलना और बंद करना पड़ता है. जमीन में पानी इकट्ठा हो सके और खेत की सिंचाई पूरी हो सके, इसके लिए 3 किला (एकड़) जमीन की सिंचाई में एक सप्ताह का समय लग जाता है. फसलों को समय पर पानी नहीं मिलने से फसलों की पकावट अच्छी नहीं हो पाती है. जिस कारण खेतो में कुल पैदावार भी कम होती है.

डॉ अजय कुमार के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश होने की प्रवृति बदल रही है. मानसून स्तर में पहले बारिश लगातार होती रहती थी लेकिन अब कभी बहुत ज्यादा और कभी कई दिनों तक बारिश नहीं होती है, जिससे जमीनी पानी का रिचार्ज नहीं हो पाता है. महेन्द्रगढ़ तथा उसके आसपास के एरिया का पानी प्रतिवर्ष 1 मीटर से 3 मीटर तक नीचे जा रहा है, और पानी खारा (नमकीन) हो रहा है. पानी में फ्लोरिड की मात्रा भी बढ़ती जा रही है, इसके कई कारण है जैसे इंडस्ट्रीज से निकलने वाला पानी, ज्यादा फर्टीलिज़ेर का प्रयोग आदि है.

डॉ.नवीन कटारिया ने बताया कि लगातार पानी का उपयोग करने तथा दक्षिण हरियाणा की वातावरणीय पारिस्तिथि शुष्क और रेतीली जमीन होने की वजह से यहां बारिश भी कम मात्रा में होती है, जिससे जमीन से निकलने वाले पानी की पूर्ति वापिस बारिश के पानी से पूरी नहीं हो पाती है. पहले भूजल की पूर्ति गांव में तालाब और जोहड़ों से भी हो जाती थी लेकिन अब गांव में तालाब और जोहड़ लगभग सूख चुके हैं. भूजल में फ्लोराइड के ज्यादा होने के कई कारण हो सकते हैं, दक्षिणी हरियाणा में मुख्य वजह चट्टानों का घुलना है, यह बारिश और भूजल के कारण हो रहा है. कई चट्टानों में फ्लोराइड, एपेटाइट और बिओटिट आदि की मात्रा ज्यादा होती है. इन चट्टानों के अपक्षय (घुलना) से भूजल में फ्लोराइड की मात्रा बढ़ जाती है. खेतों में फसल उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रयोग किये जाने वाले ज्यादा रासायनिक खाद (फॉस्फेट फर्टिलिसेर) से भी फ्लोराइड बढ़ता है.

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की रिपोर्ट के अनुसार “सामान्य मानसून लंबी अवधि का औसत 2005 से 2010 में सामान्य मानसून वर्षा की LPA दर 89.04 सेन्टीमीटर थी, जो 2011 से 2015 के बीच कम होकर 88.75 सेन्टीमीटर तथा 2018 से 2021 के बीच और भी कम होकर 88.6 सेन्टीमीटर हो गया है.”

कृषि विज्ञान केंद्र झज्जर से मिली जानकारी के अनुसार रेवाड़ी जिले से लगे हुए झज्जर जिले में चोवा (जमीनी पानी की उपलब्धता) 20-30 फीट है, लेकिन वह पानी खरा (नमकीन) है, जो किसी उपयोग लायक नहीं है. खेतो में सिंचाई तथा अन्य उपयोग के लिए अच्छे भूजल 80-100 फ़ीट की गहराई पर मिलता है.

पोस्ट ग्रेजुएट गवर्नमेंट कॉलेज तोशाम तथा बिहार सरकार के जीआईएस विभाग में काम कर चुके असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ वीरेंदर सिंह ने बताया कि रेवाड़ी तथा झज्जर भूजल स्तर की उपलब्धता में अन्तर का मुख्य कारण यह है कि रोहतक और झज्जर जिले में पानी के नहरी व्यवस्था अच्छी है, जिससे जमीन को लगातार पानी मिलता रहता है तथा नहरों के पानी रिसाव से भूजल रिचार्ज होता रहता है. इसी कारण यहां पर जलभराव की समस्या भी हो जाती है जबकि रेवाड़ी में नहरी व्यवस्था अच्छी नहीं है. दक्षिणी हरियाणा मुख्यत रेवाड़ी, महेन्द्रगढ़ और मेवात में रेतीली जमीन होने के साथ-साथ पहाड़ी इलाका है. जबकि रेवाड़ी के साथ लगते झज्जर जिले में जमीन मिट्टी युक्त है.

रेवाड़ी में नहरी व्यवस्था अच्छी नहीं है. दक्षिणी हरियाणा की भूगर्भिक संरचना हरियाणा के अन्य भाग से अलग होने की वजह से रोहतक, झज्जर का भूजल भी रेवाड़ी महेन्द्रगढ़ की तरफ नहीं जा पता है, जिस कारण जमीन को पानी भी कम मिल पाता है, जिससे भूजल स्तर लगातार गहरा हो रहा है.

मोंगाबे की रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा के करीब 25.9 प्रतिशत गांव गंभीर रूप से भूजल संकट से जूझ रहे हैं, इसी तरह की स्थिति उतर प्रदेश और बिहार में बन रही है. हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण (HWRA) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार हरियाणा के 319 गांव संभावित जल भराव वाले गांव हैं, जिनमें जल स्तर की गहराई 1.5 से 3 मीटर तक है हरियाणा में 85 गांव ऐसे हैं जो गंभीर रूप से जलजमाव से जूझ रहे हैं, जहां जल स्तर की गहराई 1.5 मीटर से कम है.

(यह स्टोरी स्वतंत्र पत्रकारों के लिए नेशनल फाउंडेशन फ़ॉर इंडिया की मीडिया फेलोशिप के तहत रिपोर्ट की गई है.)

पंचकूला: किसानों के सामने झुकी खट्टर सरकार, सभी मांगे मानी!

किसान आपनी मागों को लेकर सुबह 10 बजे से ही पंचकूला में जुटना शुऱु हो गए थे किसानों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए पुलिस ने कईं जगह पर बैरिकेडिंग कर रखी थी. लेकिन अपने ट्रैक्टरों के साथ हजारों की संख्या में जुटे किसान बैरिकेड्स तोड़कर आगे बढ़ गए. जिसके बाद पंचकूला के उपायुक्त ने मुख्यमंत्री की ओर से बातचीत की जानकारी दी जिसके बाद किसान नेताओं के प्रतिनिधि राजभवन में सीएम खट्टर से मिलने पहुंचे. बातचीत के बाद किसान नेता के प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि सभी मांगों पर सहमति बन गई है.

वार्ता के बाद किसान नेता सुरेश कौथ ने कहा कि शामलात जमीनों के मालिकाना हक के लिए सरकार नए सत्र में कानून लाएगी साथ ही जारी किए गए आदेश पर सरकार कोई एक्शन नहीं लेगी. उन्होंने कहा कि खराब फसलों की गिरदावरी और गन्ना बकाया भुगतान को लेकर भी सकारात्मक बात हुई. वहीं सीएम ने वादा किया कि वर्तमान सत्र में चीनी बिक्री से होने वाली आय से किसानों के बकाया गन्ना बिलों का किया भुगतान जाएगा.

किसानों की मुख्य मांगें

  1. देह शामलात, जुमला मुस्तका, पट्टे वाली व अन्य इस प्रकार की सभी जमीनों के किसानों को पक्के तौर पर मालिकाना हक देने के लिए नया कानून बनाया जाए.
  2. धान के बोने पौधे रहने की वजह से किसानों को हुए नुकसान का पूरे हरियाणा में उचित मुआवजा दिया जाए.
  3. 2022 में जलभराव से खराब हुई फसलों की स्पेशल गिरदावरी करवाकर उचित मुआवजा दिया जाए और पिछले साल के फसल मुआवजा का जल्दी से जल्दी किसानों के खातों में भुगतान किया जाए.
  4. लंपी वायरस से पशुओं में फैली महामारी के कारण किसानों के मरे हुए पशुओं के लिए उचित मुआवजा दिया जाए और जरूरी कदम सरकार द्वारा उठाए गए.
  5. नारायणगढ़ शुगर मिल के लगभग 62 करोड बकाया राशि का भुगतान जल्दी से जल्दी किया जाए.
  6. धान की फसल में “मेरी फसल मेरा ब्योरा” पोर्टल पर रजिस्टर्ड फसल की प्रति एकड़ लिमिट 25 से बढ़ाकर 35 कुंटल की जाए और 20 सितंबर से धान की खरीद पूरे हरियाणा में शुरू की जाए.
  7. सरकार द्वारा मोटे धान पर 20% एक्सपोर्ट ड्यूटी लगाई गई है उसको खत्म किया जाए, इसकी वजह से किसान को फसल की अच्छी कीमत नहीं मिलेगी.
  8. ट्यूबवेल कनेक्शन बिना देरी बिना शर्त जल्द दिए जाए.

मुख्यमंत्री निवास का घेराव करने पहुंच रहे हजारों किसान!

किसान आए दिन अपनी मांगों को लेकर प्रदेश के अलग अलग हिस्सों में सक्रिय दिखाए देते हैं आज भी हजारों की संख्या में किसान सीएम निवास का घेराव करने के लिए पंचकूला में जुटे. किसान जुमला मालिकान, देह शामलात और पट्टी शामलात जमीनों के अधिग्रहण के नये नियम को रद्द करने, नारायणगढ़ चीनी मील के गन्ना किसानों के 62 करोड़ बकाया का भुगतान करने, धान की फसल में बौनेपन की बीमारी के कारण हुए नुकसान के मुआवजे और लंपी वायरस बीमारी के कारण पशुपालकों के नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजे की मांग को लेकर मुख्यमंत्री आवास घेरने पहुंचे.

किसान संगठन बीकेयू शहीद भगत सिंह की अगुवाई में अंबाला और आस-पास के हजारों किसान अपनी मांगों को लेकर मुख्यमंत्री आवास का घेराव करने के लिए जुटे हैं. किसान संगठन बीकेयू शहीद भगत सिंह के नेता अमरजीत मोहरी ने बताया कि धान में बौनेपन की वजह से किसानों का बारी नुकसान हुआ है. फसल नुकसान के मुआवजे की मांग, जुमला मालिकान, देह शामलात जमीनों के अधिग्रहण को रद्द करने और गन्ना किसानों के 62 करोड़ बकाया राशि के भुगतान के लिए मुख्यमंत्री आवास का घेराव किया जाएगा.

किसानों से 60 रुपये किलो खरीदा सेब दिल्ली में 500 रुपये प्रति किलो तक बेच रही कंपनियां!

दिल्ली के मॉल में 491 रुपये प्रतिकिलों के हिसाब से बिक रहे सेब की खबर ने हिमाचल और कश्मीर के सेब किसानों की नींद उड़ा दी है. दरअसल कल से एक फोटो वायरल हो रही है जिसमें एक किलो सेब का भाव 491 रुपए लिखा है. जिसके बाद से बहस छिड रही है कि जिस सेब के लिए किसानों को 60 रुपये किलो का भाव दिया जा रहा है उसी क्वालिटी का सेब देश की राजधानी में प्राइवेट कंपनियों द्वारा 500 रुपए प्रतिकिलो तक बेचा जा रहा है.

इसको लेकर कृषि विशेषज्ञ दविंदर शर्मा ने ट्विट करते हुए लिखा कि, दिल्ली में सुपरमार्केट सामान्य गुणवत्ता वाले सेब को 491 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेच रही है, जबकि किसानों को इसी सेब के लिए औसतन 60 रुपये किलो मिलता है.

बता दें कि सेब का उचित भाव न मिलने के कारण हिमाचल के किसान पिछले दो महीने से आंदोलन कर रहे हैं. किसानों ने अडानी की एग्रीफ्रेस कंपनी पर आरोप लगाया है कि कंपनी सेब के रेट निकालने में अपनी मोनोपॉली चला रही है और कंपनी अपनी मनमर्जी से सेब के दाम घटा रही है. अ़डानी की कंपनी हिमाचल में तीन कोल्ट स्टोर स्थापित कर चुकी है. प्राइवेट कंपनी किसानों से कम भाव में सेब खरीदकर स्टोर करके ज्यादा भाव में बेचने का काम कर रही है. इसके चलते न तो किसानों को उचित दाम मिल रहा है और न ही ग्राहकों को किसी तरह का फायदा हो रहा है.

कॉर्पोरेट टैक्स छूट से अमीरों को ही रेवड़ियां!

आर्थिक जगत की साप्ताहिक पत्रिका के दिसंबर, 2020 के अंक में बताया गया कि किस तरह पिछले 50 सालों से अमीरों को मिलने वाली टैक्स-छूट का अपेक्षित प्रभाव समाज की निचली सतह तक नहीं पहुंच पाया. परिष्कृत सांख्यिकीय कार्यविधि का उपयोग करते हुए और 18 विकसित मुल्कों द्वारा अपनाई आर्थिक नीतियों के परिप्रेक्ष्य में, लंदन के किंग्स कॉलेज के दो अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि अधिकांश लोग जो तर्क सदा देते आए हैं, जाहिर है वह प्रयोग-सिद्ध सबूतों के बिना है.

प्रमाण अब सामने है. जहां बहुत से भारतीय अर्थशास्त्रियों द्वारा कॉर्पोरेट टैक्स घटाने की जरूरत को न्यायोचित ठहराने का यत्न किया जाता है वहीं उक्त अध्ययन, कुछ अन्य भी, निर्णयात्मक तौर पर दर्शाते हैं कि न तो टैक्स में छूट देने से अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी हुई व न ही इससे और ज्यादा रोजगार के अवसर पैदा करने में मदद मिली. यह अगर कहीं मददगार हुए तो केवल आर्थिक असमानता का पाट और चौड़ा करने में, क्योंकि आसानी से मिला पैसा अति-धनाढ्यों ने अपनी जेब में रख लिया.

भारत में जहां इन दिनों ‘रेवड़ी संस्कृति’ को लेकर बहुत चर्चा चली हुई है और अधिकांश अखबारों में किसान सहित गरीब तबके को मुफ्त की सुविधाओं या वस्तुएं देने के खिलाफ लेख आ रहे हैं वहीं कॉर्पोरेट्स जगत की भारी-भरकम कर्ज माफी, जो किसी भी तरह खाए-अघाए अमीरों को मिठाई देने से कम नहीं है, पर कोई चर्चा नहीं हो रही. सिवाय इक्का-दुक्का टीकाकारों द्वारा जिक्र किए जाने के, जिस तरह और मात्रा में कॉर्पोरेट्स को मिलने वाली सब्सिडी, ऋण-माफी, टैक्स-हॉलीडे, प्रोत्साहन राशि, कर-छंटाई इत्यादि बांटे जा रहे हैं, उलटा इसका महिमामंडन किया जा रहा है.

हालांकि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने भी ‘गैर-जरूरी मुफ्त की चीजों-सेवाओं’ को पूरी तरह परिभाषित नहीं किया है, लेकिन वैश्विक अध्ययन पक्के तौर पर स्थापित करता है कि भारत में भी कॉर्पोरेट्स को दी जाने वाली कर-कटौती शायद इसी श्रेणी में आती है. एक साक्षात्कार में, कोलंबिया यूनिवर्सिटी के जाने-माने अर्थशास्त्री जेफरी सैच्स से एक बार पूछा गया था कि भारी-भरकम टैक्स छूटों का क्या हुआ जबकि इन्होंने न तो औद्योगिक उत्पादन बढ़ाया और न ही अतिरिक्त रोजगार पैदा किए, इस पर उनका संक्षिप्त उत्तर था ‘टैक्स रियायतों से बचा पैसा शीर्ष कंपनियों के कर्ता-धर्ताओं की जेब में जाता है’.

आइए पहले देखें कि कुछ मुख्य अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंकों ने जो अतिरिक्त मुद्रा छापी वह किस तरह अति धनाढ्यों की जेबों में गई. 2008-09 में जब वैश्विक मंदी बनी थी, तब से लेकर यह हल, जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में ‘मात्रात्मक उपाय’ कहा जाता है, इसके तहत अमीर मुल्कों ने 25 ट्रिलियन डॉलर मूल्य की अतिरिक्त मुद्रा छापी, जिसे कम ब्याज वाले ‘फेडरल बॉन्ड्स’ के रूप में जारी किया गया, इनकी ब्याज दरें काफी समय तक अधिकांशतः औसत दर से 2 फीसदी कम रही और अमीरों को उपलब्ध थी. उन्होंने इस धन को उभरती अर्थव्यवस्थाओं में निवेश किया और हमने देखा कि इससे उनकी शेयर मार्केट में कैसे एकदम उछाल आया. लेकिन एक तो ब्याज दरों में हालिया वृद्धि ने पहले ही उथल-पुथल मचा दी थी तिस पर संघीय नीतियों में कड़ाई होने से सूद की दरों में 4 प्रतिशत का इजाफा होने की उम्मीद है, लगता है कि अभी तक जिस तरह आजाद होकर स्टॉक मार्केट ने खेल का आनंद का लिया है, अब उस पर लगामें कसने वाली हैं और ऐसा करने की बहुत जरूरत भी है.

एक लेख में स्टेनले मार्गन के रूचिर शर्मा ने विस्तार से समझाया है कि किस तरह कोरोना महामारी के दौरान छापी गई 9 ट्रिलियन डॉलर मूल्य की अतिरिक्त मुद्रा, जिसका उद्देश्य लड़खड़ाई अर्थव्यवस्था को संभालना था, यह करने की बजाय स्टॉक मार्केट के रास्ते अति-अमीरों की जेबों में चली गई. यह भारी-भरकम पैसा ही असल में ‘रेवड़ी’ है.

भारत में, 2008-09 की वैश्विक आर्थिक मंदी के दौरान, तीन चरणों में 1.8 लाख करोड़ की अतिरिक्त मुद्रा छापी गई थी. सामान्य रूप में यह राहत उपाय एक साल या उसके आसपास वक्त तक खत्म कर दिया जाना चाहिए था. किंतु एक खबर के मुताबिक ‘कोई नल बंद करना भूल गया’, परिणामस्वरूप ‘राहत’ जारी रही. दूसरे शब्दों में, उद्योगों को 10 साल की अवधि में लगभग 18 लाख करोड़ की आर्थिक खैरात मिली. इसकी बजाय अगर यही धन कृषि में लगाया जाता तो किसानों को प्रधानमंत्री किसान योजना के अंतर्गत मिलने वाले 18 हजार रुपये वार्षिक सीधी आर्थिक सहायता के अलावा मदद मिल जाती.

इतना ही नहीं, पिछले समय के बजट दस्तावेजों में ‘राजस्व माफी’ नामक एक अन्य श्रेणी भी थी. प्रसन्ना मोहंती अपनी किताब ‘एक बिसरा वादा : भारतीय अर्थव्यवस्था को किसने पटरी से उतारा’, इसमें स्पष्ट समझाते हैं कि कैसे अपरोक्ष कराधान को ‘सशर्त’ और ‘बिना शर्त’ श्रेणियों में बांटकर सकारात्मक रूप दिया गया. फलस्वरूप 2014-15 में कॉर्पोरेट्स को ऋण माफी के जरिए मिला 5 लाख करोड़ से ज्यादा किताबों में दिखा, लेकिन बाद में इसे उपरोक्त वर्णित आंकड़ेबाजी से सिकोड़कर 1 लाख करोड़ दर्शा दिया गया. इस विशालकाय कर-माफी और छूट को छिपाने के लिए नया मासूम-सा तकनीकी नाम दिया : ‘कर प्रोत्साहन का राजस्व पर प्रभाव’.

सितंबर 2019 में एक अन्य टैक्स माफी के रूप में 1.45 लाख करोड़ रुपये उद्योगों को दिए गए. यह वह समय था जब ज्यादातर अर्थशास्त्री सरकार को ग्रामीण बाजार में मांग को बढ़ाने के लिए आर्थिक राहत देने की सलाह दे रहे थे. एक ओर कर्ज-संस्कृति को बिगाड़ने का दोष किसानों के माफ किए गए 2.53 लाख करोड़ पर मढ़ा जाता है तो वहीं यह वितंडा फैलाया जाता है कि कॉर्पोरेट जगत की कर्ज माफी से अर्थव्यवस्था को बल मिलता है. हाल ही में संसद को सूचित किया गया है कि पिछले 5 सालों में कॉर्पोरेट जगत का 10 लाख करोड़ बकाया ऋण माफ किया गया है. किसानों की कर्ज माफी की बनिस्बत, जिसमें बैंकों का बकाया राज्य सरकारें भरती हैं, कॉर्पोरेट्स का सारा ऋण सिरे से छोड़ दिया जाता है. इतना ही नहीं ऐसे लगभग 10 हजार से ज्यादा लोगों की सूची है जो कर्ज चुकाने की हैसियत रखने के बावजूद जान-बूझकर नहीं चुका रहे. कुछ महीने पहले, पंजाब सरकार ने कर्ज न चुकाने वाले लगभग 2000 किसानों के खिलाफ जारी हुए वारंट रद्द किए हैं, हैरानी है कि फिर स्वैच्छिक कर्ज-खोर कैसे बख्शे जा रहे हैं.

साभार- दैनिक ट्रिब्यून

किसानों ने बीजेपी सांसद को घेरा, फसल के मुआवजे की रखी मांग!

आदमपुर, बालसमंद और खीरी चोपटा के किसानों ने आज आदमपुर के पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस में हिसार से बीजेपी सांसद बृजेंद्र सिंह का विरोध किया. किसानों ने बीजेपी सांसद को काले झंडे दिखाते हुए नारेबाजी भी की. किसान आदमपुर के तहसील कार्यालय में पिछले तीन महीने से कपास की फसल के नुकसान के मुआवजे की मांग को लकेर धरना दे रहे हैं.

धरना दे रहे किसानों ने बीजेपी सांसद बृजेंद्र सिंह से शिकायत की कि सरकार ने उन्हें 2020 और 2021 में खराब हुई कपास की फसल के नुकसान का मुआवजा नहीं दिया है. वहीं एक किसान नेता ने सांसद को बताया कि किसान पिछले तीन साल से खरीफ सीजन की फसल में नुकसान झेल रहे हैं लेकिन सरकार की ओर से किसानों को कोई मुआवजा नहीं दिया गया है.

किसानों ने सासंद से शिकायत करते हुए कहा कि सरकार ने 2020 के लिए मुआवजे को मंजूरी दी थी, लेकिन यह आज तक किसानों को नहीं दिया गया है. हमें पिछले तीन साल का मुआवजा मिलने की उम्मीद नहीं दिख रही और इस साल फिर से जिले के कई हिस्सों में ज्यादा जलभराव के कारण कपास को भारी नुकसान हुआ है. किसानों ने कहा कि उन्होंने मुआवजे के भुगतान को लेकर कृषि मंत्री जेपी दलाल समेत अन्य नेताओं से भी मुलाकात की है लेकिन कोई समाधान नहीं हुआ.

वहीं किसानों से घिरे सांसद ने कहा कि उन्होंने पहले भी राज्य सरकार के समक्ष किसानों की मांग उठाई थी और आगे भी उठाउंगा.

फसल अवशेष जलाने से रोकने के लिए खर्च किये 693 करोड़, कृषि विशेषज्ञों ने जताई घोटाले की आशंका!

हरियाणा सरकार द्वारा पिछले चार साल में फसल अवशेष प्रबंधन के नाम पर खेतों में लगाई जाने वाली आग को रोकने के लिए 693.25 करोड़ रुपये खर्च कर दिये हैं. सरकार ने फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत किसानों को सब्सिडी देते हुए 31,466 कस्टम हायरिंग सेंटर (सीएचसी) स्थापित करने और 41,331 किसानों को धान की पुआल के निपटान के लिए वैकल्पिक तरीके अपनाने के लिए मशीनरी देने का दावा किया है.

एक तरफ सरकार फसल के अवशेष को जलाने से रोकने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा कर रही थी वहीं कृषि विभाग के आंकड़े कुछ और ही तस्वीर बया कर रहे हैं. कृषि विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 2021 में 14.63 लाख हेक्टेयर में हुई धान की खेती में से 3.54 लाख हेक्टेयर में फसल के जले हुए अवशेष की बात सामने आई है. इसके साथ ही फसल के अवशेष जलाने का क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा है. पिछले चार वर्षों में फसल के अवशेष जलाए जाने का रकबा 2021 में सबसे ज्यादा रहा है. 2018 में 2.45 लाख हेक्टेयर, 2019 में 2.37 लाख हेक्टेयर और 2020 में 2.16 लाख हेक्टेयर में फसल के अवशेष जलाए गए थे.

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय से आरटीआई के माध्यम से प्राप्त जानकारी से पता चला है कि केंद्र ने 2018-19 में 137.84 करोड़ रुपये जारी किए, जिसमें से 132.86 करोड़ रुपये खर्च किये गए. इसी तरह, 2019-20 में 192.06 करोड़ रुपये जारी किए गए, जिसमें से 101.49 करोड़ रुपये खर्च किये गए. अगले साल 2020-21 में केंद्र ने 170 करोड़ रुपये जारी किए, जबकि 205.75 रुपये खर्च किए गए. 2021-22 में 193.35 करोड़ रुपये जारी किए गए और 151.39 करोड़ रुपये खर्च किए गए. 2018-19 में 132.86 करोड़, 2019-20 में 101.49 करोड़, 2020-21 में 205.75 करोड़ और 2021-22 में 151.39 करोड़ यानी पिछले चार साल में कुल 693 करोड़ रुपए खर्च किये जा चुके हैं. लेकिन जमीनी असर नहीं दिखाई दे रहा है.

वहीं कृषि विशेषज्ञों डॉ.राम कुमार ने पंजाब की तरह हरियाणा में भी घोटाले की आशंका जताई है. उन्होंने कहा कि इससे पहले पंजाब में फसल अवशेष प्रबंधन के लिए सीएचसी को जारी की गई सब्सिडी के नाम पर बड़ा घोटाला सामने आया है. चौंकाने वाली बात यह है कि इन सीएचसी (कस्टम हायरिंग सेंटर) और सब्सिडी का कोई ऑडिट नहीं होता है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पराली जलाना न केवल हरियाणा में बल्कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों के लिए भी चिंता का विषय है.

मोटे अनाज की सरकारी खरीद के पीछे क्या है सरकार की मंशा?

जलवायु परिवर्तन के कारण गेहूं और चावल के उत्पादन में कमी आ रही है, इसलिए मोटे अनाज की खरीद पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए. यह बात किसी जलवायु वैज्ञानिक ने नहीं कही है, बल्कि केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (डीएफपीडी) के सचिव सुधांशु पांडे ने कही है.

इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार को आभास हो चुका है कि आने वाले दिनों में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम) के तहत गरीबों को दिए जाने वाले सस्ते राशन के लिए केवल गेहूं और चावल पर निर्भर नहीं रहा जा सकता और इसका विकल्प तलाशना होगा.

रबी सीजन में गेहूं के उत्पादन में कमी और निर्यात की छूट देने के कारण देश में गेहूं का संकट खड़ा हो गया है. हालांकि 21 अगस्त 2022 को डीएफपीडी की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए देश में गेहूं का पर्याप्त भंडार है.

उधर उधर खाद्य नीति विश्लेषक देविंदर शर्मा का कहना है कि सवाल केवल गेहूं-धान के कम उत्पादन का नहीं है, बल्कि सवाल सस्टनेबल एग्रीकल्चर प्रेक्टिस (सतत कृषि अभ्यास) से जुड़ा है. यह जरूरी हो गया है कि देश सतत कृषि प्रणाली को अपनाए इसके लिए मोटे अनाज को बढ़ावा देना होगा.

खाद्य सचिव ने क्या कहा?

दरअसल, 30 अगस्त 2022 को डीएफपीडी की ओर से आगामी खरीफ विपणन सीजन (केएमएस) 2022-23 की खरीफ फसल के लिए खरीद प्रबंधों पर चर्चा करने के लिए बैठक बुलाई गई थी. इसमें राज्यों के खाद्य सचिव और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अधिकारी उपस्थित थे.

हालांकि बैठक में तय हुआ कि खरीफ मार्केटिंग सीजन 2022-23 के दौरान 518 लाख मीट्रिक टन चावल की खरीद की जाएगी। पिछले खरीफ मार्केटिंग सीजन 2021-22 के दौरान 509.82 लाख मीट्रिक चावल की खरीद की गई थी.

लेकिन यह मुद्दा उठा कि रबी मार्केटिंग सीजन 2022-23 में गेहूं की खरीद तय लक्ष्य से बहुत कम रही थी, इसलिए यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि आगामी खरीफ सीजन में चावल की खरीद पर भी असर पड़ सकता है. कुछ राज्यों ने प्रस्ताव रखा कि आगामी खरीफ मार्केटिंग सीजन में मोटे अनाज की खरीद की जाए.

इसके बाद तय हुआ कि आगामी खरीफ सीजन में 13.70 लाख मीट्रिक टन मोटा अनाज (सुपर फूड) खरीदा जाएगा. जबकि अब तक की कुल खरीद 6.30 लाख मीट्रिक टन है. यानी कि मोटा अनाज की खरीद के लक्ष्य में दोगुना से ज्यादा वृद्धि की गई है.

भारतीय खाद्य निगम के आंकड़ों के मुताबिक 31 जुलाई 2022 तक जिन राज्यों में मोटा अनाज खरीदा है, उनमें सबसे ज्यादा कर्नाटक में है. यहां 5.09 लाख टन मोटा अनाज खरीदा गया, इसके अलावा मध्यप्रदेश में 38 हजार, महाराष्ट्र में 41 हजार, ओडिशा में 32 हजार, गुजरात में आठ हजार और उत्तर प्रदेश में केवल तीन हजार टन मोटे अनाज की सरकारी खरीद हुई. हालांकि राज्यवार मोटे अनाज की खरीद का लक्ष्य क्या होगा, यह बाद में तय होगा.

दरअसल, चालू मानसून सीजन 2022 के दौरान बारिश की घोर अनियमितता ने भी खरीफ सीजन को लेकर सरकार की चिंता बढ़ा दी है. क्योंकि चालू खरीफ सीजन में धान और दालों की बुआई बेहद प्रभावित हुई है.

कृषि मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 26 अगस्त 2022 को समाप्त सप्ताह तक देश में 367.55 लाख हेक्टेयर में बुआई हुई है तो पिछले साल 2021 के मुकाबले 23.45 लाख हेक्टेयर कम है. वहीं इस साल 127.71 लाख हेक्टेयर में दलहन की बुआई हुई है, जबकि पिछले साल 134.37 लाख हेक्टेयर (6.66 लाख हेक्टेयर कम) में दलहन की बुआई हो चुकी थी.

इस साल अब तक तिलहन की बुआई भी थोड़ी कम हुई है, लेकिन मोटे अनाज की बुआई में वृद्धि हुई है. इस साल 176.33 लाख हेक्टेयर में मोटे अनाज की बुआई हुई है, जो पिछले साल 169.39 लाख हेक्टेयर थी। यानी कि मोटे अनाज की 6.94 लाख हेक्टेयर अधिक बुआई हुई है। सबसे अधिक बाजरे का रकबा बढ़ा है.

पिछले साल 63.19 लाख हेक्टेयर में बाजरा लगाया गया था, लेकिन इस बार 70.12 लाख हेक्टेयर में बाजरा लगाया जा चुका है, जबकि बाजरे का सामान्य रकबा 73.43 लाख हेक्टेयर है. मक्के के रकबे में भी थोड़ी बहुत वृद्धि हुई है. पिछले साल 79.06 लाख हेक्टेयर में मक्का लगाया गया था, जबकि इस साल 80.85 लाख हेक्टेयर में मक्का लगाया जा चुका है.

ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में राज्य सरकारें गेहूं-चावल की बजाय सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत मोटे अनाज का वितरण बढ़ाया जा सकता है. जुलाई 2022 में ऐसा एक प्रयास हो भी चुका है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के तहत कर्नाटक को चावल की जगह 1.13 लाख टन मोटे अनाज का आवंटन किया गया है.

इससे पहले कर्नाटक में 67,019 टन और मध्य प्रदेश में 14,500 टन मोटा एनएफएसए के तहत मोटे अनाज का आवंटन किया गया था.

क्या किसानों को होगा फायदा

लेकिन सरकार के इस फैसले से क्या मोटा अनाज उगाने वाले किसानों को फायदा होगा? देविंदर शर्मा कहते हैं कि यह एक बड़ा सवाल है. शर्मा कहते हैं कि सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी राज्यों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर मोटे अनाज की खरीद हो, ताकि मोटा अनाज उगाने वाले किसान को उचित दाम मिल सके.

शर्मा सुझाव देते हैं कि सरकार को फार्मर्स प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन (एफपीओ) के लिए यह अनिवार्य कर देना चाहिए कि वे एमएसपी पर ही खरीददारी करें.

कितना होता है उत्पादन

अभी देश में लगभग 50 मिलियन (500 लाख टन ) मोटे अनाज का उत्पादन होता है. सबसे अधिक मक्का और फिर बाजरे का उत्पादन होता है. केंद्रीय कृषि मंत्रालय का 2012-22 का चौथा अग्रिम अनुमान बताता है कि इस साल 9.62 मिलियन टन बाजरे का उत्पादन हो सकता है, जबकि पिछले साल 10.50 मिलियन टन बाजरे का उत्पादन हुआ था. चालू खरीफ सीजन की बुआई के उत्पादन का अनुमान बाद में आएगा. मक्के के उत्पादन में वृद्धि का अनुमान जताया गया है. पिछले साल 30.90 मिलियन टन मक्के का उत्पादन हुआ था, जबकि चौथे अग्रिम अनुमान में 33.62 मिलियन टन उत्पादन का अनुमान है.

साभार- डाउन-टू-अर्थ

भाव गिरने से घाटे का सौदा साबित हुई टमाटर की खेती!

टमाटर के दामों मे अचानक से भारी गिरावट ने किसानों को परेशान कर दिया है. बुधवार को टमाटर के दाम 4 रुपए से10 रूपए किलो मिले. टमाटर की कीमत गिरने की एक वजह देश की मंडियो मे बंगलूरू और महाराष्ट्र से आ रहे टमाटर को भी माना जा रहा है.
सेब के दाम गिरने से पहले ही हिमाचल और कश्मीर के किसान परेशानी का सामना कर रहे हैं. अब टमाटर के दाम गिरने से किसान और भी हताश नजर आ रहे हैं. किसानों का कहना है कि टमाटर के दाम गिरने से खेती पर किया गया खर्च भी पूरा नहीं हो रहा है. दाम घटने की वजह से टमाटर की खेती अब किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है.

एपीएमसी के सचिव सुशील गुलेरिया ने बताया कि सब्जी मंडी में चार से 10 रुपये प्रतिकिलो के हिसाब से टमाटर बिका है. दक्षिण भारत का टमाटर देश की विभिन्न मंडियों में आने से कीमतों में गिरावट आई है. किसानों ने बताया कि दाम कम मिलने से खेती का खर्च पूरा नहीं हो रहा है. एक बीघा जमीन पर दवाई, खाद, बीज और तार लगाने का खर्च करीब 20 हजार रुपये तक पहुंच जाता है. अगर टमाटर 20 रुपये किलो से कम कीमत पर बिकता है तो खेती का खर्च भी पूरा नहीं हो पाता है. सरकार को टमाटर पर न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करना चाहिए. इससे मंडियों में दाम स्थिर रहेंगे. साथ ही दवाइयों और खाद पर भी सब्सिडी दी जानी चाहिए.

हरियाणा: मंत्रियों के घर के बाहर किसानों का प्रदर्शन!

किसान प्रदेशभर में ‘किसान देह शामलात और जुमला मालकाल भूमि के इंतकाल तोड़ने के आदेश के खिलाफ दो दिवसीय धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं. देह शामलात व जुमला मालकन भूमि किसानों से छीनने के आदेश को वापस करवाने के लिए मंत्रियों के घरों के बाहर किसान पंचायत जारी रहेगी. इस बीच किसान करनाल में मुख्यमंत्री मनोहर लाल के आवास के बाहर प्रदर्शन करने के लिए पहुंच गए. किसानों को सीेएम आवास तक पहुंचने से पहले रोकने के लिए पुलिस द्वारा भारी बैरिकेंडिंग की गई है किसानों ने सीएम आवास के पास धरना दिया है.

किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने पंचायत की सारी व्यवस्था व खाने पीने का सारा इंतजाम मंत्रियों के जिम्मे लगाया था और मंत्रीयों की ओर से ऐसा न करने पर धरना बढ़ाने की भी चेतावनी दी है. ठीक ऐसे ही पंचकूला में हरियाणा विधानसभा स्पीकर ज्ञानचंद गुप्ता के घर के बाहर खुद किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी किसानों के साथ प्रदर्शन करते नजर आये. किसान जब विधानसभा स्पीकर के घर के बाहर प्रदर्शन करने पहुंचे तो स्पीकर किसानों के आने की सूचना मिलते ही बाहर निकल चुके थे.

भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा, “मुख्यमंत्री ने विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान कहा था कि किसानों की जमीन के इंतकाल बदले जाएंगे और मलकियत नहीं बदली जाएगी, लेकिन अगर इंतकाल बदल जाता है तो किसान न तो जमीन को बेच सकता है न ही रहन कर सकता है और न ही बच्चों के नाम ट्रांसफर कर सकता है. उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने बुर्दी बरामदगी की जमीन को लेकर भी किसानों को गुमराह किया है। बुर्दी बरामदगी की जमीन पहले शामलात से बाहर रहती थी, किंतु 2020 में सरकार ने एक्ट में संशोधन कर इस छूट को हटा लिया था और बुर्दी बरामदगी को जमीन को शामलात देह में दर्ज कर दिया था.”